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गुरुवार, 11 नवंबर 2010

नारी की व्यथा ?

जीवन के अतीत में झांकने बैठी मै
पायी वहां दर्दनाक  यादें और रह गयी स्तब्ध मै
समूचा अतीत था घोर निराशा और अवसाद में लींन
कुछ भी न था वहां खुशनुमा बन गई जिंदगी उत्साह हीन
बदरंग हो चुके थे सपने जीवन पथ था शब्दहीन
बच्चे भर रहे थे नए रंग, भबिष्य ने बुने सपने
यादें कर दी धूमिल सजा दिए रंग जीवन में अपने
मै आज तक ढो रहीं थी उन लाशो का गट्ठर
तिल तिल कर जी रही प्रतिदिन मर मरकर
शर्म और हया का उतार फेंका झीना आवरण
बच्चो ने था ठहराया सही यही मेरी तपस्या का है फल
किसी बक्त भी अगर गिर जाती थी मै नजरो में संतान की
जी न पाती उन  लाशों के भी कई गुना बोझ से
आज सर उठा कर जीती हूँ पाती हूँ उस दर्द से मुक्ति
नारीं जीवन की यही त्रासदी, फिर भी है वो दुर्गा शक्ति
पहले कुचली गई अपनों से, फिर सहा संतापं
यहाँ दबकर जमाना भी देता है कभी कभी घातक सा ताप
बरसो से यही है नारी की पीड़ा, भोगा इसको कभी सीता ने
सीता ने दी अग्नि परीक्षा, और अंतिम बेला पाया ढेर तिरस्कार
चली आ रही है यही परीक्षा, तिरस्कार और संताप
पाई न इससे कभी मुक्ति नारी हो तुम कैसी शक्ति
पूजी जाती अम्बा, दुर्गा और कहलाती पूर्ण शक्ति
कयूं नहीं मिलता नारी को सम्मान कियूं होता हर पथ पर तिरस्कार ??????????

13 टिप्‍पणियां:

हरीश{'' हिमांशु ''} बिष्ट ने कहा…

bahut achi rachan i like it Roshi aunti..

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

hamari soch milti hai .... aap bahut achchha likhti hai . aapko badhai..

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आपने....

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

आम आदमी के हित में आपका योगदान
महत्वपूर्ण है। नारी जीवन की विडंबनाओं
को उकेरने वाली भावपूर्ण रचना के लिए
बधाई।
=========================
निज व्यथा को मौन में अनुवाद करके देखिए।
कभी अपने आप से संवाद करके देखिए।।


जब कभी सारे सहारे आपको देदें दग़ा-
मन ही मन माता-पिता को याद करके देखिए।।


दूसरों के काम पर आलोचना के पेशतर-
आप वे दायित्व खु़द पर लाद करके देखिए।।

सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

Lata ने कहा…

good rachna.

Lata ने कहा…

good rachna.

Lata ने कहा…

good rachna.

Lata ने कहा…

good rachna.

Minakshi Pant ने कहा…

bahut sundar rachna
bdhai dost

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीया रोशी अग्रवाल जी
सादर नमस्कार !

नारी की व्यथा में आपने निराशा और अवसाद व्यक्त करते हुए भी घर परिवार बच्चों के महत्व को स्वीकार किया है ।
अपने दुःख भूलने का सबसे अच्छा रास्ता यही है कि औरों को सुख देना प्रारंभ करदें ।

…और अब तो परिस्थितियां बदली भी हैं ।

गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.....
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यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 29/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक प्रश्न उठाती अच्छी रचना