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गुरुवार, 19 मई 2016

लक्ष्मनरेखा

आखिर क्योँ लांघ जाती हैं घर की देहलीज़ यह मासूम बेटियां रहती हैं अंजान हरदुश्वारीसेयह मासूमकलियाँ
छदिक् मोह,प्यार,औरउन्मादमेंकरबैठतीं हैंयहभयानकगलतियाँ
अपनापरिवार, परिवेश,गलियां,सहेलियांसबछोड़बैठतीहैं,सबएकपलमें
मायेकाऔरससुराल कहींभीनाजगह मिलती ,नामिलतासुकूं दोपल
भूलजातीहैंवोकि सीतानेजोकीथीभयानकभूल
मात्रएकलक्ष्मणरेखालांघनेकी......
परसाथउसकाभीकहाँदेपाएथेमर्यादापुरषोत्तम
बनकररहगएथेवोभीएकसाधारणपुरुष
विवाहोपरांतनाकरपाएसीताकीअस्मिताकीरक्षा
अपनीसीमा,लक्ष्मनरेखाखुदपहचानो
अगरलाँघोतोखुदजीनाभीसीखो

3 टिप्‍पणियां:

राकेश कौशिक ने कहा…

प्रेरक

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (21-05-2016) को "अगर तू है, तो कहाँ है" (चर्चा अंक-2349) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ajay yadav ने कहा…

nice