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गुरुवार, 19 जनवरी 2017

अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल में पड़ते थे उनको लेने छोड़ने जाना होता था तो वो जो पीड़ा होती थी उसका दर्द बहुत महसूस होता है आजतक .......मन किया कुछ लिखूं


वही थी राह ,वही था समां ,और थी वही मंजिल
दिल की धड़कन भी थी सही ,बाहर मौसम भी था खुशगवार
लुफ्त उठा रहे थे नजारों का ,आकाश और हिम आच्छादित पर्वत
दे रहे थे मन को सुकूं और मन भी था आल्हादित
सफ़र पर जाने से मन था पूर्णतया रोमांचित
यादें रह -रह कर ले जा रही थीं भूतकाल में बरबस
बड़ा ही मुश्किल ,नीरस ,अकल्पनीय ,सफ़र था तय किया मैंने
जब जाती थी इन राहों पर अपने नौनिहालों को सिसकते -बिलखते लेकर
हॉस्टल में भेजना शायद तब थी मेरी मजबूरी और जरूरत
वक़्त के मरहूम ने भर दिए थे सारे जख्म ,,,,गुजरे जब उन राहों से
बरबस पीड़ा दे गयीं वो यादें और लिकने बैठ गए हम

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