नवागत के आगमन पर उमंगें है उल्लास है
नव जीवन के आगमन पर होने वाली असहनीय पीड़ा
कैसे सह पायेगी हमारी लाडली वह मर्मान्तक पीड़ा
मन कांप उठता है हृदय घबरा उढ़ता है नींद जाती है उड़
रूह कांप जाती है , माँ की सोचकर गंभीर प्रसव पीड़ा
क्या करे माँ ? गुजरी है माँ भी इसी तकलीफ से
और जन्मी थी यही लाडली उसी शरीर से
प्रकृति का यह नियम चलता रहेगा सालों साल इसी तरह
शाश्वत , सदैव , निरंतर और अनवरत जो रब ने दिया है नारी को प्रेम से .
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