शनिवार, 9 मई 2026

 

मकर संक्रांति के बाद मौसम का परिवर्तन निश्चित है
ग्रहों की दिशा का बदलाव होता है शास्त्रों के अनुसार ,पक्का है
इस बरस शायद कुछ भूल -चूक हो गयी है ईश्वर के खाते में
शीत लहर का प्रकोप कम होता ना दिख रहा इस मौसम में
कोहरा छटने का नाम नहीं ले रहा,कहर बरपा दिया इस मौसम में
त्राहि -त्राहि मच गयी है हाड़ गलाने वाली शीत लहर से सर्वत्र
सृष्टि काँप उठी है इस भयानक त्रासदी से,रहम मांगते हाथ जोड़कर
--रोशी

 


अपने मनमुताबिक चाहते हैं कि बच्चे चलें
उचित है यह, पर उनको अपने डग भरने दो
कब तक पकडे रहोगे डोर अपने हाथ में
खुले आकाश में उनको भी कभी उड़ने दो
तजुर्बा सिखाएगा कितनी और कैसे उड़न भरनी है
गिद्धों ,चीलों से बचना खुद सीखने दो ,पंख पसारना आयेगा
गर चलाते रहे हाथ थामकर तो धरती के शिकारिओं से कौन बचाएगा
--रोशी

 

जिन्दगी के ख्वाब संजोने में नहीं है कोई बहुत अच्छाई
हसीन लम्हों को वर्तमान में जीने में नहीं है कोई भी बुराई
जिन्दगी में हैं ढेरों पेचीदगियां ,जो मन में है कर गुजरो
सांसों का नहीं है कोई भरोसा हर पल अपने वास्ते जी लो
पल में तोला,पल में माशा आधुनिक जीवन की यही है सच्चाई
झट से वारंट मेल कर देता है,रब ने भी सुपर कंप्यूटर की नीति अपनाई
--रोशी

 


माँ,आपको गए पच्चीस बरस हो गए ,हम आपको आज भी महसूस करते हैं
घर के हर कोने में है आपका वजूद ,आपकी खुशबू आज भी महसूस करते हैं
रसोई में ,आँगन में ,फुलवारी में, छत में ,चौबारे में हर कोने में है आपका अस्तित्व
साड़ी में आती है आपकी खुशबू ,कानों में गूंजती है आपकी आवाजें भरपूर
मां के बगैर घर अधूरा लगता है ,मां जैसा लाड़-दुलार दुनिया में कंही ना मिलता है
मां से माएका शब्द उपजा है जीवन के आवागमन का दुःख सबके हिस्से आता है
--रोशी 

 


पिछले बरस का आकलन करें क्या खोया,क्या पाया ?
खुद से बेहतर और कोई ना कर सका तुमने है क्या गंवाया
सीखने को भी बहुत कुछ मिला ,दुनियादारी ने बहुत कुछ सिखाया
जीवन के बीते बरस ने है सबको खट्टे -मीठे अनुभवों से रूबरू कराया
सबको मिले कुछ नए रिश्ते ,कुछ पुराने रिश्तों को भी है सभी ने गंवाया
जीवन चक्र अनवरत है निरंतर चलता ,इसने हमको है बहुत कुछ सिखाया
--रोशी

 


यूं अचानक से सांसे साथ छोड़ रही हैं ,सुनकर दिल घबराता है
अचानक से उपरवाले का वारंट कब किसके लिए कट जाता है
सांसे और घुटने कब साथ छोड़ दें ,अनजान हैं सब पता नहीं किसी को
अशक्त शरीर ,बेजान पैर ,सिलसिला हो गया है यह आम हर किसी को
दिनचर्या में बदलाव ,खानपान ,जीने का नज़रिया बदल गया है सभी कुछ
उपरवाले ने भी अपने वारंट भेजने के तरीके में फेरबदल कर दी सब कुछ
--रोशी 

 

घर के बुजुर्गों को जीते जी इज्ज़त और औलाद का कीमती वक़्त चाहिए
एक कमरा और दो वक़्त की रोटी ,दवा और नाममात्र का सामान चाहिए
उम्र बदने के साथ रुपया -पैसा ,ज़मीन जायदाद उनको कुछ भी ना चाहिए
फलता फूलता परिवार,नाती -पोतों की आँगन में किलकारी बस जीने को चाहिए
बेशुमार व्यंजन ,बेशकीमती लिबास ,उम्र के साथ इच्छाएं भी अब हो जाती हैं कम
उनको क्या चाहिए नज़र उठाकर कभी देखते भी नहीं उनकी जिन्दगी में हम
श्राद्ध में मनपसंद व्यंजन ,वस्त्र बांटे, जीते जी उनको अपनी पसंद परोसते रहे
माता पिता क्या पहनेगें ?बस सदेव हम उन पर अपनी ही पसंद थोपते रहे
जीते जी बुजुर्गों को इज्ज़त अपना कीमती वक़्त गर दिया होता हमने कभी
रूह से निकलती दुआओं का जखीरा भरपूर होता आज हम सबके पास अभी
--रोशी 

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