शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

माँ का दर्द - पीढ़ी दर पीढ़ी

माँ का लाडला, आँखों का तारा  उसका अपना कोख जाया
रात्रि को जब ज्वर की मर्मात्मक पीडा से है  छटपटाया
सरदर्द, बदनदर्द और थीं  तकलीफें अनेकों उसको 
 ज्वर की मर्मान्तक पीड़ा  से तो लाडला था परेशा, बेचैन और हैरान
 डाक्टर ने बताया की हुआ है  डेंगू जो करेगा परेशान      
घूम गया था मस्तिक, रुक गई थी धड़कन और दिल था  परेशान
क्यूँ  ना हो गया डेंगू माँ को ,डेंगू क्यूँ  किया लाडले को परेशान
 काश मिल जाता वो मच्छर तो पूछती वो छटपटती माँ
तुझको ही क्यूँ  मिला था मेरा वो लाडला , छोटा बच्चा हैरान परेशान है माँ 
मै भी तो थी साथ लाडले के क्यूँ  मुझको तूने छोड़ दिया शैतान      
असहनीय पीड़ा, दुःख, तकलीफ, क्यूँ  दी मेरे नौनिहाल को 
 अपने हिस्से का हर  दुःख प्राणी को झेलना ही पड़ता है  उम्र सारी                                                                 
माँ को याद आया वो लम्हा जब पड़ी थी उसपर विपदा भारी
 छटपटाई थी उसकी भी माँ और यही कष्ट हुआ था तब उसको
आज  समझ पाई थी बेटी उस तड़प, दर्द  एहसास को माँ के 
आज यह बताने को नहीं है उसकी माँ उसके पास
शायद यही दर्द, पीड़ा , अहसास चलता रहेगा हर माँ के साथ
 और वो वयां ना कर सकेंगी  अपना दुःख, लाडले के साथ ... .....

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...