बुधवार, 25 मई 2011

क्या उम्मीदें होंगी पूरी

आँचल में सारा प्यार भरकर उडेलना चाहती है माँ 
पर कुछ बन्धनों की  बेडिओं में भी जकड़ी है वो माँ 
चाह कर भी कभी कुछ ना कर पाने का मलाल करती है माँ 
सर्वस्व न्योछाबर करने को हरदम तैयार रहती है माँ 
बिना कभी भी यह जाने की औलाद किया करेगी ना सोचती है माँ 
जब आंखे होंगी कमजोर तो क्या  सहारा बनेंगी औलाद ?
जब शरीर थकेगा तो क्या उसका  हाथ पकड़ेगी औलाद सोचती है हरदम माँ ?
जब होगी वृद्ध , असहाय तो किया बोझ उठाएगी औलाद ?

जिन्दगी

जिन्दगी ने दी ढेरों  खुशियों और नवाजा अनेको सुखो से 
दुखों के तानों-बानों में ही रहे उलझे, सामना ना हुआ सुखों से 
हम क्यूँ ना देख पाते हैं वो खुशियाँ, सपने और उल्लास 
रह जाते हैं यूँ ही मसरूफ अपने दुखो, तकलीफों में ही हर साँस 
विधाता ने तो दिया ऐसा सुन्दर मानव जीवन  हमको 
ग़मों और तकलीफों के साथ खुदा  ने अनेकों इनायतों से नवाज़ा हमको   
कभी स्याह कभी सफ़ेद दिखा दिए सब सपने हमको 
अगर रहता सिर्फ स्याह  रंग से सरोवर जीवन हमारा 
तो सफ़ेद रंग का ना देख पाते  हम अदभुत नज़ारा 
जो भी ख़ुशी मिले जियो सदैव हंस के मेरे दोस्तों 
और मिले जो कभी गम तो उसे भी लगा तो गले दोस्तों ......

नारी जीवन एक प्रश्न

बरसो बाद आज मिली वो मुझको जो थी भुला दी मैंने  
बीमार, असहाय , मानसिक अवसाद से त्रस्त थी वो जो देखा  जाना आज मैंने 
हँसना, मुस्काना, खिलखिलाना गई थी वह सब कुछ भूल लगभग 
बुत सरीखी प्रतिमा लग रही थी वो मुझको, जान थी थोड़ी बची शरीर में लगभग
स्वर्थी, शराबी, पति को गई थी वो व्याह जानते बूझते गरीब माँ बाप ने  
बच्चो का जीवन संवारने में ही जिंदगी गुजार दी थी पूरी उसने अब मुझको  
किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में संकोच होता था उसको 
नारी जाति पर हो रहे अत्याचारों  का साक्षात् नमूना थी देखकर काँप गयी थी उसको  
जी रही थी बगैर साँस के , चल रही थी बगैर आस के बेखबर, बेध्यान 
घर, परिवार की इज्जत की खातिर कर दी है जीते जी जिंदगी उसने अपनी कुर्बान..... 

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...