कितना आसान लगता है, हमारे नौजवानों को
उपर बैठे उनके आका, पथ-भ्रष्ट करते इंसानों को
कितनी मांगें होती हैं सूनी, कितनी कोखें हैं उजड़ती
ये रत्ती भर भी न होता है, महसूस उन आतंकियों को
रोते- कलपते अनाथ बच्चे, अपनों को खोने का गम परिवारों का
हिला भी न पाता है, आत्मा और जमीर हैवानो का
कभी भी न सोच पाते, ना ही सोच पाएंगे ये बेदर्द दरिन्दे
इन्सान कहना भी इंसानियत की बेइज्जती करना है, यह है खुदा के नेक बन्दे
इन खूनी आतंकिओं की ना है कोई ,जात ना है बिरादरी
ना है कोई अपना, ना है खानदान , ना ही है कोई रिश्तेदार
रोशी अग्रवाल
