बढ़ गया है युवा पीढ़ी में कुछ ज्यादा ही इसका क्रेज
युवा, बच्चे सभी मनाना चाहते हैं इसको देकर तोहफे अच्छे- अच्छे
कुछ दिल से ,कुछ दूसरो को देखकर दौड रहे है इसके पीछे
संत वैलेंनटाइन को भी ना एहसास होगा कि आयेगा दुनिया में यह फेज
कुछ दिल से ,कुछ दूसरो को देखकर दौड रहे है इसके पीछे
वैलेंनटाइन-डे का जरा भी ज्ञान ना था हमको
तब क्या प्यार , मोहब्बत का नाम ? ज्ञात नहीं था हम सबको
लेकिन अब तो पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं देखकर सबको
किसी भी तरह से आधुनिक दिखाई दें वही भा रहा है हम सबको
श्रवण कुमार का माता- पिता से स्नेह और भरत का भात्र प्रेम
सावित्री का पति- प्रेम , शबरी का प्रभु-प्रेम क्या यह सब कम थे ?
हमारा इतिहास , हमारी परम्पराएं , हमारे आदर्श तो सब छिप गए हैं
नव आधुनिक समाज से , नई सभ्यता से , नई परम्पराओं से गर्त में जा रहे हैं
पर समय चक्र तो यूं ही चलता रहेगा और जरूर आएंगा बदलाव
हमारे बीच भी होंगे भरत , श्रवण कुमार , शबरी और सावित्री जैसे पात्र
भारतीय सभ्यता में तो प्रेम की परिभाषा ही अनोखी अद्भुत और दूजी है
हर रिश्ते,हर घर के प्रेम, मोहब्बत का रंग बिखरा पड़ा है जो विश्व से अनोखी है
रोशी अग्रवाल