माँ के आने का कर रही थी मैं बेसब्री से इंतजारमन में था आनंद और उनके लिए प्रतीक्षा बेचैनी से
सुबह ही माँ से हुई थी फ़ोन पर बातचीत , चित-परिचित हंसी थी जैसी होती हर बार
जल्दी आओ , मन नहीं लग रहा आपके बगैर ,कहा था हमने बार- बार
पता नहीं क्यों मन में थे अनेको विचार ?
नव वर्ष पर भी मन था उदास ,और परेशान, कोई ना था उत्साह इस बार
बताया था यह भी माँ उनको, कि मन नहीं लग रहा है बार- बार
सारे अशुभ संकेत ,लक्षण हो रहे थे लगातार- लगातार
माँ , पिता, और बच्चे गए थे सुनने भागवत कथा गुजरात
सबको विदा कर रह गए हम अकेले,परेशान और बेचैन
कुदरत दे रही थी अनहोनी का संकेत बार बार
क्यों नहीं हम समझे ? और मन को थे हम रहे समझाते
माँ ने बच्चों को हॉस्टल छोड़ा, और वापिस घर को रुख मोड़ा
जहाँ था काल कर रहा, उनका इंतजार
आया , झपटा और ले गया माँ को अपने साथ
अरे ,,,,,, अभी तो हुई थी टेलीफ़ोन पर उनसे बात
मन तो मानता ही नहीं था पर होनी को था यही स्वीकार
चील जैसे झपट्टा मारती वैसे था काल ने मारा
माँ क्या गयी जैसे जिन्दगी हमारी सबकी रह गयी ठहर
पर समय तो सारे घाव भरता है
जिन्दगी चल पड़ी फिर उसी राह पर
एक मित्र को भी इसी तरह एक्सीडेंट में खोने पर
पुराने जख्मों ने दी टीस, फिर घाव हरा हो गया
उसके भी नवजात बच्चों ने अपनी माँ को खो दिया
जख्म उनके भी भरेंगे ,जिन्दगी फिर चलेगी
पर माँ जो उनकी और मेरी चली गयी फिर कभी ना मिलेगी ,कभी ना मिलेगी...
नोट : (सच्ची घटना पर आधारित) लेखिका की माँ की अक्सिमक एक्सीडेंट में हुई मृत्य पर समर्पित भाव...