शुक्रवार, 20 मई 2011

अर्धविझिप्त माँ


देखी आज एक अर्धविझिप्त माँ 
बच्चो को दुलारती- पुचकारती माँ 
दिमागी रूप से अविकसित पगली थी वो माँ 
ममता, प्यार दुलार में किसी से भी कम ना थी वो 
बच्चो की तरफ जैसे ही झपटा एक आवारा कुत्तों का झुंड 
चंडी सा रूप धारण किया  और भिड गई कुत्तो से वो माँ 
हो चाहें स्वस्थ या पगली जैसी भी हो माँ  
 ईश्वर भर देता है कूट-कूटकर मातृत्व और साहस चाहें जैसी भी हो माँ 
 

इंतजार

परिजनों के आने की ख़ुशी भी ना दे पाती है उतना दिल को सुकून 
उनके वापिस जाने की वेदना जितना कर देती है बेचैन 
जब तक कही  दिल की बात और अपनों ने समझा हाले-दिल हमारा  
तब तक वापसी का दिन आ गया और छूटा साथ हमारा  
दिल में बहुत कुछ रह गया था बताने को पर अपने तो चले गए  
करती रहती हूँ इंतजार महीना दर महीना वापिसी का जो है परदेश गए 
समेटती, सहेजती रहती हूँ ढेरों बातें, किस्से  बताने को हर बार उनके  
इंतजार रहता है उस पल का जो गुजारने साथ आना है उनको 

दरकते रिश्ते











डर लगता है अपने अनमोल रिश्तों को  खोने का
क्यूंकि गवां  चुकी हूँ ठेरों रिश्ते मिले ना वापिस जिनको  
पहले खोया माँ को न पा सकी दुबारा उनको 
फिर टूटा घर परिवार  जिन पर था नाज़ मुझको 
माँ क्या गईं, सारे रिश्ते भी उनके साथ बिखर गए
सगे, सम्बन्धी और रिश्तेदार सबके रंग ही बदल गए
ना रहा कोई रिश्ता- नाता पक्का और मजबूत सब सरक गए 
सारे के सारे चेहरों के परदे खुद व खुद उतर गए
हमने तो बहुत चाहा निभाना पर हम थे बहुत  मजबूर
बदलते रंग, दरकते रिश्ते दिल हुआ चूर - चूर 

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...