सब कहते हैं कि इंसान वक़्त के साथ बदल जाया करते हैं
तजुर्बे ,उम्र ,रिश्तों की खातिर कुछ इंसान बदल ही जाते हैं
पर पाषाण- ह्रदय जो जन्मते हैं इस जग में कुछ भीं ना कर पाते हैं
वक़्त,हालत चाहे दे उनको कितनी भी चोटे वे जस के तस रह जाते हैं
क्या देखा है कभी किसी शिला को टूटते समंदर की लहरों से ??
ना बदला दुर्योधन और ना ही बदल सका खुद को पापी कंस अपनी प्रवृति से
ना ही बदली कुटिल चाले शकुनी मामा की और ना ही बदल दुष्ट रावण
शायद ईश्वर प्रदत्त गुणों या नियति का खेल होता है जन्म से
रोशी अग्रवाल