रविवार, 25 मार्च 2012

माँ के भक्त

माँ के भक्त बने वो घंटो मंदिर में कीर्तन किया करते हैं
घर आकर पत्नी और बेटी पर सितम धाय करते हैं 
नवरात्री में सिर्फ फलाहार  का सेवन किया करते हैं 
बेटी और माँ भूखे पेट ही सो जाया करते हैं 
दक्षिणा में मिले रूपए मदिरालय में जाया करते हैं 
माँ -बेटी फूटी कौड़ी को भी तरस जाया करते हैं 
रखते तो माँ के व्रत हैं पर हर स्त्री पर कामुक नज़र रखते हैं 
माँ -बेटी को दरिंदगी की हदों से भी बदतर रखते हैं 
मंदिर में माँ की महिमा का बखान करते हैं 
घर पर लात घूंसे से ही बात आरम्भ करते हैं 
इतना बदसूरत विरोधाभास  हम अक्सर अपने आसपास देखा करते हैं 

3 टिप्‍पणियां:

ऋता शेखर 'मधु' ने कहा…

विरोधाभास को बताने में सफल है यह रचना...

रविकर ने कहा…

बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति ।
प्राय: दुहरे चरित्र दिख रहे हैं ।
बधाई ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

समाज का विचित्र स्वरूप।

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