शनिवार, 30 अप्रैल 2011

इंसानी रंग



देखे है हमने इस जहाँ में इंसानी फितरत के ढेरो रंग 
हर लम्हा,हर पल  इन्सान की फितरत के बदलते ढंग 
काश हम देख पाते झांककर दिल के अंदर 
क्यूंकि बहां  दिखते ढेरों  उल्हाने और शिकायतों का समन्दर 
जीना हो जाता मुहाल और सामाजिक ढांचा हो जाता भंग 
भाई- भाई न रहता ना , पति- पत्नी और बच्चों का संग
प्रेम वात्सल्य, दोस्ती केऔर भी  दिखते अदभुत रंग-ढंग 
अच्छा ही हुआ जो इस दिल को ढक दिया इश्वेर ने 
खुद ईश्वर भी रह जाता है दंग देख कर इंसानों के रंग
इंसानी फितरत के बदलते हर पल नए रंग ढंग


होली की यादें





होली के अद्भुत रंग हैं चहु ओर छाई, आई फागुन है आई 
सजन को सजनी से, मिलने की साथ में है आस बंधाई 
ब्रज में भयो शोर, गलियन में चहूँ ओर है रंग बिखराई 
बरसाने की ग्वालिन ने फिर से है लट्ठो पर है तेल फिराई 
ब्रज में बरसाने में गलियों में, नगरो में सर्वत्र उल्लास छाई 
हर छोरा कान्हा और चोरी राधा का जैसे है रूप पाई 
दोस्त- दुश्मन, नर- नारी सब आपस में गले मिल है रंग लगाई 
धरती और अम्बर सभी नर नारी गुलाल उड़ाई  
देखो आई होली आई ..................आई आई |

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