नजर लग जाती है फ़ौरन ख़ुशी में हर पल
जब कभी पंख लगाकर उड़ना चाहा हमने
आसमा में ढेरो गिद्द-बाज मडराते नजर आये
फ़ौरन उड़ना भूल घोसले में बसेरा कर लिया
जब कभी चाहा आसमां में उड़ना और स्वच्छंद चह-चाहना
गंदे- भद्दे अनर्गल भाषण सुने कि जिव्हा भूल गयी बोलना
जब कभी चाहा स्वच्छंद विचरण करना यहाँ और वहां
इतनी बंदिशे, इतनी यंत्रनाये मिलीं कि चलना भूल गए
जब चाहा खुल कर हँसना, बोलना बतियाना, तानों में उलझ गए
बंद कर दी गई, जुबान कि शब्दों का अर्थ भूल गए....
आखिर लड़की जात को ही इतनी बंदिश क्यूँ है ?
क्यूँ आज भी समाज उनकी खुशियों पर अंकुश रखता है
रोशी अग्रवाल
