भिगो जाती हैं सर्वस्व तन- मन तृप्त कर जाती हैं धरती की प्यास
और पपीहे की धड़कन बढ़ा जाती हैं मिलन को सजनी की आस
प्यासे खेत में टपकती बूंदों को देख लरजता है किसान का मन
सावन के अंधे को हरा ही दिखता है ,चरितार्थ करता है यह सावन
गाँव में झूले, भरते ताल तलैया हुलस-हुलस उठता है मन
नीम और अमुआ पर पड़े झूले उमंग से भर देते हैं बालको का मन
पशु -पक्षी , नर नारी सम्पूर्ण धरा भी नाच उठती
है पाकर सावन का संग, पशु- पक्षियों का भी हुलास उठता मन .......
और पपीहे की धड़कन बढ़ा जाती हैं मिलन को सजनी की आस
प्यासे खेत में टपकती बूंदों को देख लरजता है किसान का मन
सावन के अंधे को हरा ही दिखता है ,चरितार्थ करता है यह सावन
गाँव में झूले, भरते ताल तलैया हुलस-हुलस उठता है मन
नीम और अमुआ पर पड़े झूले उमंग से भर देते हैं बालको का मन
पशु -पक्षी , नर नारी सम्पूर्ण धरा भी नाच उठती
है पाकर सावन का संग, पशु- पक्षियों का भी हुलास उठता मन .......
रोशी अग्रवाल
