शनिवार, 21 जनवरी 2012

मकर संक्रांति


आज थी मकर संक्रांति और था मांगने वालों का रेला
तभी नज़र पड़ी  कोने में खड़ा  था एक वृद्ध अकेला
पास बुलाया और पूछा बाबा क्या चाहिये आपको  ?
बोला कुछ नहीं बस दुआएं दिए जा रहा था हमको 
वृद्ध काया ,पोपला मुंह,शीतल वायु थी फटे वस्त्र उड़ाए जा रही थी
धीमे -धीमे रेंगते रेंगते सड़क पर बस वह घिसटे  जा रहा था
कहा हमने बाबा घर से ना  निकला करो सड़क पर गिर जाओगे, वह बातें नहीं था सुनता 
बोला हम कहाँ निकलना चाहते है बेटा ,कमबक्त ये पेट नहीं मानता
न पत्नी ,न परिवार  न ही औलाद है हमारे पास है निपट अकेले 
पर क्या करे बेटी घर पर नहीं वैठकर भरता है पेट, चाहिए  इसको दो निवाले 
 निशब्द रह गए थे हम उसका सुंदर जबाब सुनकर
सब कुछ छीनकर भी प्रभु ने दिया उसको सबका प्यार

                                                       रोशी अग्रवाल 

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

पूस की रात


सर्दी का मौसम अमीरों को ही है भाया,बेचारे गरीब की तो वैसे ही लाचार है काया
गर्मी की मार तो वो झेल ही जाता है ,गिरते छप्पर और टूटी झोपडी में बेजान है उसकी काया 
दीवारों के सूराखों से घुसती प्रचंड शीत लहर  हिला जाती है गरीब की सम्पूर्ण काया
नश्तरों  की चुभन से भी ज्यादा घायल कर जाती गरीब का तन और काया 
बिना बिछावन,बिना रजाई इस शीतल पूस की रात्रि में मां गुदड़ी में छुपता अपनी काया 
हाड कपाँ देने वाली ठण्ड में भी कैसे जीवित रहा जाता है इन गरीबो से कोई सीखे
बदन पर तार-तार हुए वस्त्र ,नश्तर  चुभाती शीत लहर नामुमकिन है आकर जरा देखे 
हाड़ गला जाती हैं यह वयार एहसास ना उनको जो हीटर में गुजारते है पूस की रात 
लाचारी में खुद परिवार समेत काटते हैं महसूस करें और देखें  कैसे पूस की रात ?
                                                                                रोशी अग्रवाल 

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

जिन्दगी का फलसफा


सब कहते हैं की बीति बातें बिसार दो ,और आगे की सुध लो
पर भूलना क्या होता है इतना आसा ? जो आगे की सोचो 
जिनको था दिल और दिमाग ने इतना चाहा, मोहब्बत थी लुटाई 
एक ही झटके में टूटा पूरा का पूरा भरम का जाल,दुनिया लुटती नज़र आई 
खुल गयी आंखें ,मिला जिन्दगी का  सबक .और नए तज़ुर्बे  
पर किससे  कहें ? क्या कहें ,बचा न था कुछ भी बाकी बस रह गयीं यादें 
सिर्फ  स्वंयं पर ही करो भरोसा यह ही है जिन्दगी का फलसफा
माँ -बाप तो हमेशा ही रहे थे सुनाते जिन्दगी के बड़े बड़े धोखों के किस्से 
पर हम मूर्ख समझते रहे की घुमा देंगे हम  जादू की छड़ी
बना देंगे रिश्तों और जिन्दगी सब को आसां झट मिनटों में 
पर अब जाकर पता चला की हो गए थे हम पूर्णतया  फेल
हमारी किस्मत में न था समझ पाना इन रिश्तों का फलसफा जरा  सा 
कई लोग तो बिना कुछ करे धरे भी पा जाते हैं सभी का प्यार
पर हम सब कुछ कर के भी ना पा सके मर्जी से जीने का अधिकार




शनिवार, 3 दिसंबर 2011

भ्रम जाल




अवसाद गहन अवसाद में घिर गए थे हम
अपनों  ने ना  दिया होता सहारा तो मर ही गए थे हम
अपनों ने ही धकेला था हमें अवसाद की थी गहरी खाई 
और अपनों ने ही निकाला,और नेक सलाह हमको  सुझाई
मानसिक संतुलन था गड़बड़ाया और था दिल हमारा  घबराया
अँधेरा ही अँधेर चरों ओर  देता था न कुछ हमको  दिखाई
रिश्तों की गुत्थी उलझी इतनी की सिरा भी न आता था पकडाई
 क्या करते जीकर भी इस मकडजाल में  थी आत्मा घबरायी
हम खुद ही इसके जिम्मेदार हैं बात यह ही अब समझ थी आई
न करते हम अपने आसपास इतनी गंदगी इकठ्ठा करते रहते हम सफाई
सच्चे दोस्त,सगे ,सम्बन्धी और अपनों की इसी अवसाद ने थी हमको पहचान कराई
अब न घिरेंगे इस भंवर में जीने की है हमने अब  कसम खाई
पर किनारे तक आते -आते पिछली सारी तकलीफें भूली बिसराई
फिर तैयारी कर ली थी हमने रिश्तों के जाल में उलझनें की 
दावानल में घिरने की ,अब फिर से है हमारी अगली ज़िन्दगी में  बारी आई
कोई न है विकल्प इस माया जल का बहु भांति है हम अजमाई
                                                            रोशी अग्रवाल 

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

नकली रिश्ते

जिन्दगी ने बहुत कुछ था हमको सिखाया 
ना थे हम  ज्ञानी ,ध्यानी और ना ही किया बहुत चिंतन
धोखे ,विश्वासघात और खंजर क्या- क्या ना पाई तडपन
अब जाकर समझ आई हमको  इन्सान की असली पहचान
जब कीड़े ,मकोड़े ना बदल सकते कुदरतन अपना स्वभाव
चोट पहुचना ,डंक मारना उनका इश्वर प्रदत्त है स्वभाव
हम इन्सान होकर क्योँ भूल जाते है सबका विचित्र स्वभाव
सारी  जिन्दगी उसको अनुकूल  बनाने में ही लगा देते हैं
 परेशां ,दुखी ,अवसादग्रस्त और बेचैन फिर हम होते हैं 
क्योँ ना रहे दूर  और ना लाये होते  उसको दिल के करीब
विष वमन,कपट ,छल,द्वेष ,और जलन शायद यह ही था उसके करीब 
 समझाया था दिल को हमने कि शायद वक़्त ने बदल दिया  हो उसका व्यव्हार
पर व्यर्थ ,निरर्थक थी हमारी सोच जो ना देख सकी दिल के आर पार
                                                                रोशी अग्रवाल 

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

करवा चौथ







आया था करवा चौथ का पावन त्यौहार 
काम बाली-बाई को देख चौक गए थे उसका श्रंगार 
पिछले कई महीनो से मारपीट, चल रही थी उसके पति से लगातार 
चार दिन पहले ही थाना-कचहरी की हुई थी दरकार 
न आने का कारन पूछा तो बोली, जाना था कोतवाली रोज लगातार 
जुल्मी, शराबी को मैंने करवा दिया है बंद अब न आयेगा वो बाहर 
पर उस रोज सब भूल गई उसके जुल्म, सितम और अत्याचार 
पूरा साज श्रृंगार , पीछे तक भरी मांग भरा पूरा था उसका श्रृंगार 
कितना मासूम और कोमल बनाया है विधाता ने नारी का दिल बेचारा 
झट से भूल जाती हैं सभी अत्याचार और पति का हिंसक व्यव्हार 
यही तो है हमारी भारतीय परंपरा, मान्यता और हमारे अदभुत संस्कार... 
                                                               रोशी अग्रवाल 
   

त्योंहरो का मौसम आया

त्योंहरो का मौसम, अदभुत भर देता है रोमांच
घर परिवार, वातावरण-सभी जगह होता है आनन्द ही आनन्द
 गर्मी से जब होती मुक्ति, शरीर, मस्तिस्क सभी होता है प्रफुल्लित 
साफ़ सफाई, साज श्रृंगार , नवीन वस्त्र  सभी करते आनंदित 
शादी, लग्न , उत्सवो की भी लग जाती है जैसे झड़ी  रोज घर बाहर 
सभी कर रहे थे इंतजार इस मौसम और आन्नद का हर बार  
दीपकों की अदभुत छठा, बिजली की लड़ी,पटाखों का शोर 
दिवाली के बाद घर आंगन करता बेटिओं का इंतजार 
जो आती होंगी दूर देश से समेट ह्रदय में भाइयों  का प्यार 
माँ बाप भी तक रहें है द्वार कि कब आएगी लाडली पूरण करने  त्योंहार.... 
                                                        रोशी अग्रवाल 



  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...