बुधवार, 25 दिसंबर 2013

merry- chrismas

क्रिसमस पर कहते हैं कि सांता  आता है ढेरो सौगाते लेकर
छोटे -बड़े सबको बांटे है वो दिल के द्वार खोलकर
गरीब -अमीर सब को देता है भेद -भाव भूलकर
तोहफे तो सबको ईश्वर भिजवाता है अपना दूत भेजकर
पर हम तो यूँ ही रोते रहतें हैं अपनी बदकिस्मती पर
कभी ,कुछ चड सोच कर देखे उस रहनुमा की गुरवत पर
पर ना ........उसकी हर कदम बरसती रेह्नुमाएं
 हमको ना दिखती दिन में एक भी बार
सौ दरवाज़े बंद ,पर खुला दरवाज़ा ना दीखता एक भी बार
कितनी मेहर बरसाता है रब हम पर हर बार
संता का रूप तो वो धरता है साल में एक ही बार
पर उस फरिस्ते का नूर तो बरसता ,साल के हर दिवस बार बार .............
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शनिवार, 21 दिसंबर 2013




जब बच्चा हो बीमार ,माँ का दिल रोये बार -बार
पर करे वो क्या मचा ना सकती हाहाकार
दिल में होती चुभन ,दिमाग होता शून्य बारबार
अपने हिस्से का दर्द झेलना ही होता है हर किसी को
बरना माँ बच्चों की सारी तकलीफें समेट लेती दामन में अपने हर बार
कोई शै भी कदाचित ना चुभा सके दर्द का काँटा उसके नौनिहालों को
मां का दिल रब से दुआएं यह ही मांगे बार -बार ,हर बार ..............

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

भाग्य -सुख

हर कोई चाहता है आसमान से तारे तोड़ लायूं
पर विधाता ने यह सुख सबको नहीं है बांटा
कहीं अगर जाता विधाता इस बटवारे को करना भूल
तो यकीनन हम कर बैठते गगन को तारों से हीन समूल
बिरलों को ही दिया है उसने यह अधिकार अपने कर से
कुछ तो साथ देता है ईश प्रदत्त वरदान और कुछ संवारती है उसकी मेहनत
कुछ बदा होता है उसकी नियति में  और शायद कुछ उसके कर्मफल
शायद पिछले जन्म के पुण्य और पाप भी तय करते हैं उसका इस जन्म का लेखा -जोखा
अब अगर सब सितारें बैठें आपकी भाग्य -कुंडली में सही ठिकानो पर
तभी मिलता है सुख आपको आसमान से तारे तोड़ने का ,भाग्य चमकाने का

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

नौकर पुराण




अलसाई.शिथिल .सपनों में रहती अक्सर वो खोई
अभी -अभी ही तो वो देख रही थी सुंदर सपना
लगातार बजती दरवाजे की घंटी ने था तोडा सपना
बाई का था मरद खड़ा दरवाजे पर यमदूत सा
लाल पान -मसाले से रंगे दांत ,मुख से आती मदिरा की गंध
साहब -मेमसाहब के उड़ गए होश देख उस दानव को
आज हम दोनों ना आ सकेंगे काम पर बताने को था आया
बर्तन का ढेर रसोई में ,बच्चों का स्कूल ,आफिस की फाइलों का अम्बार
 ,नौकरों पर बढती निर्भरता ने बना दिया है पंगु हमारी सबकी जिंदगी को
प्रातः उठते ही ना ज्ञान , ना भगवान बस रहता है सिर्फ बाई का ध्यान
हिन्दुस्तानी औरत तो बस डूबी रहती है सारी जिंदगी इस  नौकर पुराण में        .........

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

मनवा की गति है न्यारी .............



हमारा मन समुंदर की मानिद ही है शायद
समेटे है मन ,समुंदर भांति अतुल गहराई
लहरों सम आते ढेरों उतार -चडाव
पा ना सका कोई इस मनवा की गहराई
सागर है समेटे ढेरों अदुलित राशि अपने दामन में
मिनटों में ज्वार -भाटा ,तत्काल गज़ब का ठहराव
अद्भुत शांति ,दिखे ऊपर से ना पाए कोई अंदर का उतार -चडाव
ना जाने कोई मन का गम -और देखे उसका दर्द
क्या सागर की लहरें गिन पाया है कोई ?
कदापि नहीं ,,,इस मनवा की भी गति है न्यारी
पल में है शांत .और पल में ही है दुश्वारी 

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

बेटियां .




कितनी बदरंग ,और बदसूरत जिंदगी पाती हैं यह बेटियां .
कोख में आते ही माँ को रुलाती हैं यह बेटियां


जीवन मिल जाये तो खुद गहरे जख्म पाती हैं यह बेटियां
जवान हुई नहीं कि शोहदो कि छेड-चाड झेलती हैं यह बेटियां
माँ -बाप के ताने ,घर -भीतर की मार झेलती हैं बेटियां
सप्तपदी होते ही एकायक समझदार हो जाती बेटियां
पीहर और ससुराल के बीच अपना घर दूंद्ती रह जाती बेटियां
माँ कहे ससुराल तेरा घर ,सास सुनाये तेरा मायेका ही तेरा घर
चक्की के पाट की मानिद पिसती हैं यह बेटियां
पीहर और ससुराल दोनों की इज्जत का बोझ ढोतीहैं बेटियां
ना माँ के काँधे सर रख व्यथा कहे न ससुराल बताती हैं यह बेटियां
दोनों घरों की लाज बचाने को खूबसूरती से झूट बोलती हैं बेटियां
बूडे माँ -बाप की जिंदगी की खातिर भाई से भी भिड़ती हैं यह बेटियां
इतनी खूबियौं के बाबजूद भी कोई ना चाहे जनम ले अंगने बेटियां ..........

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

,बढती उम्र





सब कहते हैं कि बढती उम्र  है देती बुडा इंसान को
नहीं ......कदापि नहीं ,सिर्फ दो चार अपवादों को छोडकर
आम इंसान तो रोटी कीजुगत में ही हो जाता है बुडा
परिवार के वास्ते छप्पर ,लिंटल डलवाते सरक जाती है आधी उम्र
रही- सही  कसर पूरी कर देती है ,उसकी घर बैठी जवान बेटी
खेत में बढती है नित चार अंगुल ककड़ी पाती हैं सीरत वैसी यह जवान बेटियां
बढता दहेज का दावानल ,सड़क पर बड़ते शोहदे बस काफी हैं बुडा देने के लिए
बच्चों के भविष्य के सपनो का नित टूटना -बिखरना ,फिर रोज नए खाव्ब
असमय ही दे जाते हैं ढेरों झुर्री ,सलवटें और निस्तेज काया .......
आम आदमी तो यूँ ही असमय पहुँच जाता है जिंदगी के आधे सोपान पर
उच्च- बर्ग जैसे अपनी मुट्ठी में जकड लेता है बुढापा
मेकअप की परतों के नीचे ,शानोशौकत के आवरण में छिपा लेता है बुडापा
भरा पेट ,बदन पर कीमती लिबास सब कुछ छिपा लेते हैं बुडापा
न कल की फ़िक्र ,ना भविष्य का अन्धकार .कोसो दूर रहता इनसे बुडापा

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...