शनिवार, 18 जनवरी 2014

बेटियां और धान का पौधा

बेटियां और धान का पौधा ,पाते हैं दोनों एक सी किस्मत
बोई जाती हैं कहीं ,रोपी जाती हैं रही और कंहीं ....
किस्मत होती अच्छी ,मिलती पौधे को उपजाऊ जमीं
खिल उठता ,फल -फूल जाता पाकर उचित देखभाल
बेटियां भी अगर पाती संस्कारी परिवार ,तो दमक उठता उनका रूप
बरना तो कम पानी ,बंजर जमी में जैसे तोड़ देता दम पौधा
बेटियां भी तिल -तिल रोज मरती हैं नए परिवेश में
करनी होती है दिल से दोनों की देखभाल नए माहौल में
थोड़ी सा भी ध्यान दिया नहीं की खिलखिला उठते हैं दोनों
अच्छी फसल धान की भरती है जैसे घर किसान का
वैसे ही भर देती हैं बेटियां ससुराल का आँगन ढेर सी खुशिओं से ......

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

लक्ष्मण रेखा .......




क्यों कर हम बचपन से सदेव लड़किओं को ही देते रहे हैं उपदेश 
हमारी माँ ने हमको समझाया बाल्यकाल से ही हमारी मर्यादा की सीमायें 
जो हम सुनते आये थे उन्ही परम्पराओं की डोरी से बाँधा अपनी बच्यौं को 
अब जब हमारी बच्ची बन गयी है खुद मां तो कहते सुना उसको सब यथावत 
चार पीड़ी से चल रही हैं लड्कियुं के लिए सब कुछ वैसे का वैसा ........
ना समाज में ,ना घर में ,ना देश में बदला है कुछ स्त्रियुं के वास्ते
ना सतयुग ,ना त्रेता युग और ना ही कलयुग ला पाया तनिक सा भी बदलाव
जो लक्ष्मण रेखाएं खिचीं थी सतयुग में ,बरक़रार है आज भी उन रेखाओं का वजूद
प्रताडना ,नित नए जुल्म,जलाना,बलात्कार , मानसिक शोषण बरक़रार हैं यूँ ही
कभी किसी राम ,कृष्ण के लिए नहीं खींची कोई रेखा ना हम आज भी सिखा रहे
कोई मर्यादा का पाठ अपने लडको को की रहें वो भीतर अपनी लक्ष्मण रेखा के
संयम का पाठ पढाना जरूरी है उनको भी बालपन से ही लड्कियुं के साथ -साथ .....

बुधवार, 15 जनवरी 2014

शरद ऋतू

शरद ऋतू में कभी बंद दरवाजे की झिरी के पास तनिक बैठ के देखो
मिनटों में एहसास हो जायेगा उस बेदर्द सर्द हवा का जो गलाती है हड्डी
रोज उन गरीबो की जिन्होंने कदाचित कभी कपडा ही ना डाला हो जिस्म पर अपने
कभी गुजारकर देखो एक रात बिना किसी छप्पर के ,छत के सिर्फ एक रात
तड़प -तड़प जायेगा वजूद ,सिहर जायेगी आत्मा बगेर किसी आसरे के
होगा शायद थोडा चड भर का एहसास उन बेघरों का जो सिर्फ मिटटी में ही
पैदा होते और वहीँ मर मिट जाते ,बगेर किसी घर -द्वार के
सोने को बिस्तर ,तन पर कपडे ,थाली में भर पेट भोजन
अंग -हीन काया देख करो अदा शुक्रानाउस परवरदिगार का
जो बक्शी है सुंदर काया उसने तुमको और बरसाई हैं ढेरों नेमते तुम पर
रात -दिन मे एक प्रहर सो कर देखो कभी भूखे पेट कुलबुलाती अंतडियो
से होगा महसूस उस भूख का जो कभी ना होने दी महसूस उस विधाता ने तुमको
सिर्फ एक चड का शुकराना ही काफी है उस ईश्वर के वास्ते ,सिर्फ एक चड का
कितनी रहमतें है बरसाईं उसने हम पर,पर हम रहे उसके नाशुक्रे ही ताजिंदगी
ना खुद को रख पाए कभी खुश ,ना सजदा किया दिल से उस उपरवाले का
अब भी है जिंदगी में काफी वक्त उसका शुक्रिया अदा करने का ,सजदा करने का ........... 

रविवार, 5 जनवरी 2014

माँ की तेहरवीं पुण्य तिथि पर



आप चली गयीं उस जहाँ में जहाँ ना कोई आपसे मिल सकता
लगता है हर पल आप यहीं हैं ,हर पल यहीं हैं ........
घर ,आँगन में है हर पल आपका प्यार -दुलार है बरसता
देहरी जोहती है बाट आपकी ,करके गयीं थीं उससे वापिस आने का वायदा
हर पल मन दूंद्ता है आपको ,पर है ना कोई फायदा .......
पता नहीं कि हमारी तकलीफ  का अंदाज़ हो रहा होगा आपको कितना
बस दिल से सभी करतें है यह ही दूया आप जहाँ हो खुश रहो
क्योंकि अब धीरे -धीरे डाल ली है आदत जीने कि आपके बिना ...........

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नव- वर्ष की शुभ कामनाएं ....


नव- वर्ष  की सभी मित्रों को ढेर सी शुभ कामनाएं ....
नए वर्ष में लें कुछ नया संकल्प .......
कर गुजरें कुछ ऐसा जो बना दे जीवन अपना और सबका सुंदर
निर्मल बने तन और मन ,नेक बने विचार ,स्वभाव
कर गुजरने का परायों के वास्ते उपजे जज्वा ,ऐसा बने मन
घर -भीतर गर फैला सकें शांति और सुकून का परचम
तो बनेगा यह समाज सुंदर और होगा यह देश उत्तम
ईमानदारी ,दया ,नेक -दृष्टि का पाठ पढाएं गर नौनिहालों को
तो शायद कुछ दामिनी जैसा नर्क भोगने से बच सके हमारी नस्ल
बच जाएँ कुछ आसाराम ,तेजपाल सरीखे भेदियें बनने से हमारे पुत्र
बदलना होगा हमको अपना रहन-सहन का तरीका और सोचना होगा कुछ नया
सिखाना होगा अपने नौनिहालों को और ढालना होगा खुद जीवन में
शायद नए साल के लिए कुछ तो विचारणीय प्रश्न हैं सुरसा की मानिद मुख खोले
चेतों मित्रों ,चेतो इस नव- वर्ष में कुछ कर गुजरने का संकल्प लो ...........

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

शीत लहर






क्या लिखें ? कैसे लिखें ?शीत लहर ने किया सब शून्य
दिल ,दिमाग सब शून्य ,लेखनी से निकले शब्द भी शून्य
शीतलहर ने अभी शुरू ही किया है दिखाना अपना प्रकोप
छाया चहुँ और गहन कुहासा ,खिले गुलाब ,देहलिया सब ओर
बगियें हुईं सुवासित ,फूलों की अद्भुत छठा बिखेरे सुगंदसब ओर
कांपते गरीब ,नौनिहाल ,वृद्ध दशा उनकी शोचनीय ,अत्यंत मार्मिक
तो कहीं बढती शीत लहर ने बदला जीने का ढंग
 दारू ,मुर्गा .मौज मस्ती का है उनके वास्ते यह मौसम
तो कहीं चित्डा गुदरी में है लुका -छिपी खेलता बदहाल परिवार
इंतज़ार में हैं सूरज की एक किरण की रौशनी का उसको
शायद कर दे कुछ गर्म उसकी कांपती हडियों को थोड़ी ही देर के लिए
फिर रात्रि में शीत लहर में तडपना तो अब हो गया उसकी आदत में शुमार

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

merry- chrismas

क्रिसमस पर कहते हैं कि सांता  आता है ढेरो सौगाते लेकर
छोटे -बड़े सबको बांटे है वो दिल के द्वार खोलकर
गरीब -अमीर सब को देता है भेद -भाव भूलकर
तोहफे तो सबको ईश्वर भिजवाता है अपना दूत भेजकर
पर हम तो यूँ ही रोते रहतें हैं अपनी बदकिस्मती पर
कभी ,कुछ चड सोच कर देखे उस रहनुमा की गुरवत पर
पर ना ........उसकी हर कदम बरसती रेह्नुमाएं
 हमको ना दिखती दिन में एक भी बार
सौ दरवाज़े बंद ,पर खुला दरवाज़ा ना दीखता एक भी बार
कितनी मेहर बरसाता है रब हम पर हर बार
संता का रूप तो वो धरता है साल में एक ही बार
पर उस फरिस्ते का नूर तो बरसता ,साल के हर दिवस बार बार .............
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  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...