शनिवार, 15 अगस्त 2015

मेरा भारत महान

                                           स्वतंत्रता दिवस 
स्वतंत्रता दिवस तो मना रहे हैं पर खुद को
बेडिओं से जकडा पा रहे हैं
खुद कि अस्मिता बचाना है मुश्किल
रोज बेतियौं को लुटता पा रहे है
जब होगी नारी सुरक्षित,राष्ट्र का होगा नव निर्माण
फलेगा- फूलेगा देश हमारा ,बनेगा मेरा भारत महान 
                                                         ROSHI....

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

धर्मगुरुओं का चुनाव

                           धर्मगुरुओं का चुनाव



बाजार से सामान खरीदते वक्त ,या हो और कोई सौदा सुलफ
रिश्ता जोड़ते वक्त , या दोस्ती करते वक्त हम बरतते हैं पूरी एहतियात
पर ना जाने क्योँ भयंकर चूक कर जाते हैं अपने धर्मगुरु चुनते वक्त
आसाराम ,भोले बाबा ,राधेमां जैसे ढेर से नाराधमी,धोंगियौं को
सौंप देतें हैं अपने जीवन की बागडोर ,उन अधमियौं के हाथ
अपना परिवार ,अपने नौनिहाल ,अपनी स्त्री और पति भी
मुड कर ना देखते उनका अतीत ,वर्तमान उनकी तिलस्मी दुनिया
भेड-चाल में अनुसरण किये चले जाते हैं हम ,मूर्खों की मानिद
यह भी तो बाजार है ,दुकानें हैं इन गुरुओं की जो हमको बेचते हैं
लुभाते हैं अपनी चालों से ,और हम हैं कि बिना जानकारी
बन जाते हैं उनके भक्त ,लुट्वातेहैं अपनी अस्मिता ,अपना बजूद
अपना सब कुछ पर ना कभी छोड़ते उनके हाथों लुटना
यह सिलसिला तो यूं ही चलता रहेगा ना कभी थमा है ना थमेगा
गलत वो नहीं गलत हैं हम जो सदियौं से यूं ही पाप के रहे हैं भागीदार
क्यूंकि गलत धर्मगुरुओं का चुनाव था हमको स्वीकार 
                                                                                               ROSHI

सोमवार, 10 अगस्त 2015

नेक सलाह

                           कुछ देर चुप रहना
दिल ने कहा हमसे कुछ देर चुप रहना सीखो
बोलो कम और दुनिया को परखना सीखो
लगा बड़ा नेक मशवरा ,लगे हाथ अजमाया
इस सौदे में नुकसान कम मुनाफा ज्यादा कमाया
अपनी गुफ्तगू में कभी चेहरों पर पड़े नकाबों से ना हुये थे बाबस्ता कभी
नेक सलाह ने इनसानियत के रंगों से रूबरू करवाया
दिल में कुछ ,जबां पर कुछ और दिमाग में कुछ
जिंदगी के बहुतेरे रंगों का आईना दिखाया 
                                                                       ROSHI

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

माए से उपजा मायका

                                    लाडली 
माई यानि माँ से ही उपजा शब्द मायका
माँ ही चिडया कि मानिद समेट लेती है अपने बच्चे
अपने लाडलों के साथ ही जीती और मरती है
बेटियों में बसती है उसकी जान , जीती है उनमें अपना आधा -अधूरा बचपन
स्वेटर की तरह ही तो रोज बुनती और उधेरती है नित नए सपने
व्याह दी जाएँ जब उसकी बेटियां तो सिर्फ आवाज़ से समझ जाती है
अपनी शहजादियों का दावानल ,उनकी पीड़ा और अब बदल जाते उसके स्वप्न
अब दूंदने में लग जाती माँ एक अदद अलादीन का चिराग
मिलते ही जिन्न से मांगे वो सिर्फ और सिर्फ अपनी लाडली का सुखमय जीवन
तभी तो माँ से ही होता मायेका और माँ से ही जीवन 

शनिवार, 4 जुलाई 2015

दिल


दिल जैसी बड़ी अजीब शै है खुदा ने खूब बनाई
जिस्म ,रूह सभी पर है इसका बखूबी कब्ज़ा भाई
यह खुश तो सभी अंगों पर रहती है बाहर खूब छाई
दुखी दिल तो सारी कायनात के सुकूं भी निराधार हैं भाई
आँखों को भी यह कमबख्त वही है दिखता जो खुद देखना चाहें है भाई 
तन के घावों का उपचार तो हकीम -वैध कर देवे
पर दिल की चोटों का नहीं है धरा पर कोई इलाज है भाई
बड़ी कीमती ,बेमिसाल सौगात बक्शी है ईश्वर ने हमको
इस दिल की मुकम्मल देखभाल करो मेरे भाई

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

जख्म माँ के ..



गहरी निद्रा के आगोश में सोये मासूम नौनिहालों को डांट-डपटकर
झटपट माँ ने किया होगा तैयार ,लंच -बॉक्स को वक्त पर खाने की नसीहतें
भी दी होंगी हज़ार ,मुस्कराता वो चेहरा ,बाय-बाय करती वो गूँज आज करती
दिल की किरचें हज़ार ,वो लख्तेजिगर जो गया था अभी विद्यालय जाने को बाहर
उन आततायियों का कलेजा ना पसीजा एक बार भी उन मासूम फूलों को देख
खिलने से पहले ही रौंद डाला उन जल्लादों ने ,इंसानियत को किया शर्मसार
क्या गुजरी होगी उस माँ पर जो खाने की थाली संजोये तक रही थी राह अपने लाडले की
पर ना आया वो मासूम आई थी उसकी छत -बिचत देह जो काफी थी चीरने को कलेजा बाप का ,क्यूंकि अब ना था वो मासूम अपनी जिद्देँ पूरी करवाने को अपने बाप से
रीता कर दिया था घर आँगन उन जेहादियों ने कितने ही घर परिवारों का
एक पल ना सोचा कि मारा तो उन्होंने दोनों तरफ माओं को
एक तरफ मरी बेमौत उन मासूमों की माएं ताउम्र

और दूसरी तरफ उन जेहादियौं की अपनी माएं क्यूंकि इंतज़ार तो वो भी
कर रही थी अपने बच्चों का ,जना तो उन्होंने अपनी कोख से सिर्फ बच्चा ही था
ज़माने ने उनको बनाया था जेहादी ,किया था जिन्होंने कोख को शर्मसार
एक तरफ थे मारनेवाले बच्चे और एक तरफ मरने वाले बच्चे
जख्म तो खाए दोनों तरफ सिर्फ और सिर्फ माँ ने ,सिर्फ माँ ने

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

परिवर्तन

बिदाई की बेला में जानकी को दीं थीं ढेरों नसीहतें माँ और तात ने
वास्ता दिया था निभाने को दोनों कुल की मर्यादा और पति का साथ
निभाया भी था जानकी ने ,कर गईं वनगमन बिना वाद्प्रतिवाद के
युवराज को तनिक भी एहसास ना हुआ उस नव्व्याही वधु के सपनों ,अरमानों का
माँ के वचनों की शायद ज्यादा एहमियत लगी थी सुकुमार को
पर उन वचनों का क्या ?जो वेदी पर लिए थे अग्नि को साक्षी मानकर
वन में ना बचा पाए  कुंवर निज सुता का अस्तित्व
बाँध गए मात्र एक सूक्ष्म सी लक्ष्मणरेखा के दायरे में
क्या -क्या ना वरपा उस मासूम पर उस दारुण वन में
कैसे की होगी अपने सतीत्व की रक्षा ,उन अमानुषों में
कल्पना मात्र से ही सिहर उठता है तन और मन
क्या किस्मत लिखवा कर लायी थी जनकसुता
अभी देखने थे और दारुण दुःख उस सुकुमारी को
निभाए जा रही थी जो मैथिली और अयोध्या की परम्पराओं को
तनिक भी हठ ना किया और निभाती रहीं पत्नीधर्म
यूं ही किसी के कहने मात्र से कर दी गयी वो बेघर
ना जाने से होता उनके पति की मर्यादा का हनन ,निशब्द त्याग दिया घर -आँगन
उस प्रसूता को घर से निकाल निभाई कौन सी मर्यादा यह ना जान सके हम
पर अब सीता ने भी जीना सीख लिया है ,उस लक्ष्मण -रेखा को लांघना भी लिया है सीख
अपनी सफाई में कहने को हैं आज उसके पास कुछ सबूत ,बरसों झेला है उसने वनवास
बेबजह झेली है रुसवाई उसने क्यूंकर ओढ़े रहे मायूसी का दामन
और क्योँ दे वो निरपराध अग्निपरीक्षा या समा जाये वेवजह धरती में
मु श्किलों ने कर दिया है अब उसका हौसला बुलंद ,.......
जमीं और आसमां दोनों  हैं अब उसकी मुट्ठी में ,ना कि उसमें समां जाने को ..........

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...