मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

Roshi: शिकायतें ,रिवायतें ,निभाते चले गए रस्मों ,रिवाजों ...


                                                                  

 
 शिकायतें ,रिवायतें ,निभाते चले गए  रस्मों ,
रिवाजों के मकड़जाल को सुलझाते चले गए  
ना कुछ हासिल कर सके ,
ना ही कुछ बदल सके  हम सब ही ढोल चाहे आ...
                                                                 साम्राज्य


कितने चतुर ,और कितने काबिल 
उम्दा वीर और महान बलशाली 
देखे और सुने हैं धराशायी होते हमने 
आँखों से भरभराते साम्राज्य को देहते हमने 
और जब चला ऊपरवाले का रहमोकरम 
चींटी को भी तमाम कायनात सम्हाले देखा हमने
                                                                          .....रोशी
आध्याए



मदद करो और भूल जाओ सिखाया था माँ ने हमको 
इससे आगे का पाठ ना पदाया था माँ ने हमको 
राहे जिन्दगी ने सिखाया नया आध्याए हमको 
अपनी खुशियाँ ,उसूल ,जिन्दगी को दरकिनार कर 
ना करो मदद दोस्तों तजुर्बे ने सिखाया हमको
रोशी...

शनिवार, 28 जनवरी 2017

व्यथा




आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा
चौदह वर्ष कैसे गुजारे होंगे सती ने उन पिशाचों के बीच
ना कोई ख़त न था कोई सन्देश परस्पर पति -पत्नी के बीच
इंतजार भी खतम हुआ उस निर्मोही का ,भेज दिए थे जिसने दूत
छुद्र मानसिकता का जिसने दिया था अपना सबूत
वनगमन को जाते ना सोचा कदापि उस नववधु उर्मिला के वास्ते
कर दिया उसके सपनों पर तुषारापात ,अँधेरे कर दिए थे उसके दिन और रात
काश दिखाया होता बद्दप्पन ,ना छुड़ाया होता उर्मिला से लच्छमन का साथ
उसकी पीड़ा का नहीं है कंही इतिहास में कोई पन्ना
नामुमकिन है उर्मिला सरीखा जीवन जीना
काश राजा राम ने दिखाया होता थोडा सा भी बद्दप्पन
निज आदर्शों को त्याग कुछ सोच होता उपर उठकर
तो दोनों बहनों की ताक़त ,त्याग ,को जमाना देखता कुछ हटकर

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

                               नन्हे  मेहमान 
ओ  नन्हे  मेहनान ,तेरे  वास्ते है हम सब परेशान 
तेरी सलामती  और सेहत के लिए मन है  परेशा ,
बेचैन  हर  घड़ी  हर पल हैं नई आशाए ,नये सपने 
नये  रिश्ते  की ,सुगब गाहट ,नई  धड़कने 
 बढ़ती  है  धड़कन  दिल  की  मन  होता  है बेचैन  
हर दम  सोचती  हूँ  उस वेदना को और भर आते नैन   आंखों में आ  जाती  है सूरत  उस  नन्ही सी जान की  

             आन्या  के  जन्म  से  पहले
                       (धेवती )
                      ...... नारी की व्यथा .......
जीवन के अतीत में झांकने बैठी मैं पायी वहां दर्दनाक यादें 
और रह गयी स्तब्ध मैं ..समूचा अतीत था,  घोर निराशा और अबसाद में  लीन 
 कुछ भी ना था वहां खुशनुमा ........थी बस जिंदगी बदरंग और उत्साहहीन

 सपनो ने भरे  नये  रंग  भविष्य ने बुने सपने यादें कर घूमिल सजा लिए रंग जीवन में अपने..................
आज तक ढो रही थी जिन  लाशों का गठ्ठर तिल - तिल कर जी रही ,प्रतिदिन मर मरकर  शर्म और हया का उतार फेंका झीना आवरण जो था  वर्षो का बोझ सर पर 
बच्चों ने था ठहराया सही यही मेरी तपस्या का है..फल ☺☺
दफ़न कर गहरे में उस गठ्ठर को निज जीवन किया सफल 
जमाना भी देता  है नारी को घातक ताप
 वर्षो से यही हैं नारी की पीड़ा,भोगा हैं नारी जात ने इसका संताप 




गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

पापी पेट की खातिर


सर्दी


हाड गला देने वाली सर्दी में ,जब हम गर्म कपड़ों में भी रहे थे ठिठुर
देखा जो नज़ारा ,हड्डियाँ भी हो गयीं सुन्न,मानवीयता होती देखी निष्ठुर
चार अधनंगे बालक मात्र कुछ मछलियों के लिए जाल डाले थे एक गंदेपोखर में
कुछ बालक उस सर्दी में दूंढ़ रहे थे सिंघाड़े की बेल से कुछ सिंघाड़े उस पोखर में
...शीतल जल का सिर्फ एहसास ही कर देता है रोम रोम में सिरहन
गरीबी से लाचार, कुछ सिक्कों की खतिर,या भूख से हो कर बेचैन
थे मजबूर इस पूस माह में, तालाब में भी जाने को पेट की खातिर
चाहें मच्छी,सिंघाड़े खाने हों,या हों वो बेचने को पापी पेट की खातिर
ROSHI....

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...