गुरुवार, 27 अगस्त 2020
काया बना ली कोरी अपनी पर आत्मा और दिल ना बदल पाया कोई
आतंक,दहशत ,जुल्म ,झूठ ,फरेब के पक्के रंगों से आत्मा है सरोवार
काश हम देख पाते झांक कर अंतस में अपने ,काया को निर्मल किया होता एकबार
खुद भी मनाते पावन त्योहार ,दुनिया को प्यार के रंग से करते सरोबार
बुधवार, 26 अगस्त 2020
गर्भ से लेकर जीवन पर्यत बालक को अपना सर्वस्व देती है
बालक मुसकाए तो माँ खिलखिलाए, कदाचित रोए तो खून के आंसू रोती है
बालक पर सर्वस्व न्यौछावर और उसके इर्द गिर्द ही अपनी दुनिया बुन लेती है
नित नूतन सपनो का जाल, माँ शिशु के वास्ते बुन लेती है
बालक की आँखो से ही माँ सारे ब्रह्माण्ड है देखती
माँ को करते नमन देवता और दुनिया भी सलाम करती है
रविवार, 19 अप्रैल 2020
बुजुर्ग जिनकी आँखें थी पथराई तक्ते थे जो बेटा- बहू का पाने को साथ
अंदर -बाहर की आपाधापी में भागा पड़ा था पूरा परिवार
सिमटते ,पारिवारिक मूल्यों ने पाया पुनर्जीवन ,जी उठे परिवार
माँ-बाप जो थे तरसते दो मीठे बोलों को, अपनी वीरान कोठरी में
कम से कम अब सुनते हैं बच्चों, बेटा बहू की खिलखिलाहट अपने अंगने में
कुक जो खिलाता था बेस्वाद खाना, आश्रित था परिवार उसके रहमोकरम पर
बच्चे ,बुजुर्ग सब हैं आनंदित हैं रोज नया फ्राई
जो कभी ख्वाब में भी ना था सोचा ,कोरोना ने हमारे परिवारों को दिखाया दिया वो मौका
पहचानने को अपने परिवार की एहमियत ,बुजुर्ग माँ बाप का प्यार
महसूस करने को बच्चों का मासूम बचपन और समझने को अपना घर संसार
मंगलवार, 14 अप्रैल 2020
जिनकी रसोई से उठती सुवासित पकवानों की खुशबू
जो हो गयी थी गुम कंही,विदेशी अधकचरे ,अधपके व्यंजनों में
आँगन जो रहते थे सूने,हो गए गुलजार ,मानो लगे हैं खिलखिलाने
घर के मर्द जो सिर्फ थे सीमित ऑफिस और व्यवसाए में
दिखने लगी है अब शायद उनको भी स्त्री की एहमियत
खटती रही जो ज़िंदगी भर घर और भीतर समेटने में
नौनिहाल ,बालक, वृद्ध हैं खिल उठे सबके मुखमंडल
मानो छाया है कुछ जादू सम्पूर्ण वायमंडल में
ने ने ने टूटते परिवारों ,रिश्तों ने पाया है कहीं नवजीवन
हमारे पास जो ना था वक़्त कुदरत ने उसको वापिस है लौटाया
बैठो ,समझो ,देखो पहचानो हेर रिश्ते की एहमियत
हमारा घर ,आँगन ,भी कहता है हुमसे बहुत कुछ
कुछ उसको भी सुनने की जरूरत है ,....जागो अब सब
शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019
राम सीता
संसारिक
मर्यादा का तो बखूबी पालन किया मर्यादा पुरषोत्तम ने
पित्रधर्म
,माँ का सम्मान बखूबी निभाया था, हर आज्ञा को राम ने
सौतेली
माँ की आज्ञा को कर शिरोधार्य वन गमन का निर्ड्य लिया था राम ने
पिता का
मान रखना तो पुत्र धर्म है ,पर पत्नी का ना धरा ध्यान राम ने
रावण से
युद्ध तो नियत विदित था पर उसमें था क्या सीता का दोष ?
बलशाली
रावण के द्वारा छल से ले जायी गयी श्रीलंका वो निर्दोष
एक -एक
पल कैसे काटा है वो पीड़ा भी है करती मन में असंतोष
गयी वो
पुनः त्याग ,पाया संवासित जीवन अबला ने दो पल में
सुना दिया
था निर्ड्य वन गमन का उस मर्यादा पुरषोतम ने
गर्भावस्था
में ही गयी वो त्यागी आसन्नप्रसवा
पतिधर्म की मर्यादा का पालन क्यौ ना कर सके तुम राम ?
हर युग
में अनुत्तरित रह जाएंगे कुछ प्रश्न तुमसे राम
कभी भी
न दे सकोगे उन प्रश्नों का जवाब समुचित तुम मर्यादा पुरषोत्तम राम
मंगलवार, 17 सितंबर 2019
माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...
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रात का सन्नाटा था पसरा हुआ चाँद भी था अपने पुरे शबाब पर समुद्र की लहरें करती थी अठखेलियाँ पर मन पर न था उसका कुछ बस यादें अच्छी बुरी न ल...
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देखी आज एक अर्धविझिप्त माँ बच्चो को दुलारती- पुचकारती माँ दिमागी रूप से अविकसित पगली थी वो माँ ममता, प्यार दुलार में किसी से भी कम ना थी ...
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15th June आज है बेटे का जन्म दिन प्रफुल्लित है, आह्वावादित है तनमन जन्म दिन के साथ ही याद आता है मासूम क्रदन प्रथम स्पर्श,उस मासूम का क...





