शनिवार, 8 जनवरी 2022



बहुत चाहा ढाकने अपने जख्म पर यह तो रोज़ अपना अक्स दिखा जाते है 
ढका भी इनकी गरीब की फटी चादर मानिद आवरण से पर यह तो चादर में सिमट ही ना पाते है 
या तो उस चीर में ताकत ही ना रही है उनको ढकने की 
                                                                              होली 



होली आई जीवन में सतरंग  लाई 
लाल ,पीला ,हरा ,नीला ,काला ,और खेत 
सभी रंग फिजाओ में ,तन मन में और हवाओ में 
नर नारी ,बूढ़े-बालक ,युवा तनमन सभी है मदमस्त त्यौहार में 
तन का रंग तो सबने रगड डाला पर देख ना पाया ह्रदय में
राग द्वेष ,कलह जलन और वैर -भाव का रंग तो चढ़ा था पक्का
काश धो पाते ,मिटा सकते उसके भी सब रंग तो और भी सुन्दर होती होली ,इठलाते हम भी सबके संग .........................


भरम


भरम में थी आई जीती अब तक 
एक ढेला फेंका और भरम का जाल टूटा
समेट रखा था जो अब तक दामन में था छूटा 
ना रहा कुछ भी बाकी सभी अपनों का सब झूठा
मस्तिक शून्य,सवेदना शून्य हुआ 
शरीर और दिल भी टूटा
सभी जगत में था मिथ्या,कौन अपना ? कौन पराया ?
जिसको भी की ना ,उसने था फ़ौरन जबाब पलटा
अपना तो कुछ बाकी ना रहा सभी था उल्टा पुल्टा |

अबोध


आना उसका जिंदगी में ,हवा के झोके की माफिक 
झिंझोड कर चले जाना सर्वस्व उसके वजूद को अपने मुतबिक
भोजन ,भजन और खानपान रहा ना कुछ भी उसके हाथ 
खो ही गया था उसका अपना अस्तित्व मजबूर दिल के साथ
माँ ,बाप ,भाई ,बहन कुछ भी ना उसका अपना 
बस दिल तो वो हार बैठी थी अपना उसके हाथ ,
क्या सखी ,क्या सहेली ,क्या रिश्ते ,क्या नाते ना थे उसको कुछ भी याद 
जब दिमाग वहां से हटता तभी तो उसको रहता कुछ भी याद
आग लगी थी दोनों तरफ दिख रहा था उसका प्रबल प्रवाह 
ना थी ज़माने की खबर ,ना डर था घर परिवार की इज्ज़त का 
मिलने को आतुर थे वो दोनों बेखौंफ,निडर उसका दिमाग था 
पर कहाँ छोडा था उसको इस समाज के भेडियो ने 
सफ़ेदपोंशों ने खत्म करके ही छोड़ा उस मासूम जोड़ी को 
ईश्वर दे सुकून उनकी रूहों को ,वहां मिला दे दो अबोध बच्चो को....................
जिंदगी


सब कहते है कि बीती ताहि  बिसार दो और आगे की सुध लो
पर भूलना क्या होता है इतना आसा?
जिनको था दिल और दिमाग ने इतना चाहा 
एक ही झटके में टूटा पूरा का पूरा भरम का जाल 
खुल गयी आखें ,मिला जिंदगी का सबक और नए ख्याल 
पर किससे कहे ? क्या कहें? बचा ना था कुछ भी बाकी
स्वयं पर ही करो भरोसा यही था जिंदगी का फलसफा 
माँ बाप तो हमेशा ही रहे थे सुनाते जिंदगी के खास धोखे
पर हम मुर्ख समझते रहे कि घुमा देंगे जादू की छड़ी
बना ही देंगे जिंदगी , रिश्तो को सब कुछ आसां
पर अब पता चला कि हो गए थे हम फेल 
हमारी भी किस्मत में ना था समझ पाना यह रिश्तो का फलसफा
कई लोग तो बिना कुछ करे धरे भी पा जाते है सभी का प्यार
हम तो सब कुछ कर के भी ना पा सके मर्ज़ी से जीने का अधिकार

उम्मीद


लुटा दिया था उसने अपना सुखचैन उन पर 
पर ना कर पाई कभी भी खुश उनको सब कुछ लूटकार 
हर लम्हा वो खोजते ही रहे कुछ ना कुछ गलतियाँ
सामने ओढे रहे नकाब शराफत का पर खोदते ही ,
जड़े हमारे वजूद की
और जड़े हिल भी गयी थी काफी हद तक अगर जिंदगी में 
ना होती जगह उनकी 
प्यार से सींचा,सहारा दिया और नई कोंपल चमकी
ये प्यार ही तो है जिसने हरा कर दिया सूखे ठह को
वरना हम तो छोड़ बैठें थे उम्मीद फिर से उठने की
संतुलन


अबसाद ,गहन अबसाद में घिर गए थे हम 
अपनों ने ना दिया होता सहारा तो भर ही गए थे हम
अपनों ने ही धकेला था हमे अवसाद की गहरी खाई में
और अपनों ने ही निकला,और नेक सलाह सुझाई 
मानसिक संतुलन था गड़बढ़ाया और दिल था बहुत घबराया 
अंधेरा ही अंधेरा था और देता था कुछ दिखाई 
रिश्तो की गुत्थी उलझ गई थी इतनी कि सिरा भी ना आता पकड़ाई
पर क्या करे जीना भी तो यहीं हैं इस मकडजाल में आत्मा भी घबराई 
हम खुद ही इस सबके जिम्मेदार यही बस अब समझ आई 
ना करते हम अपने आसपास इतनी गंदगी करते ,
करते रहते हमेशा सफाई
सच्चे मित्र,सगे सबंधी और अपनों की इसी अवसाद ने पहचान कराई
अब ना घिरेंगे इस भंवर में जीने की है कसम खाई
पर किनारे तक आते आते पिछली सारी भूली बिसराई
फिर तैयारी कर ली थी हमने रिश्तो में उलझने की
दावानल में घिरने की अब फिर से बारी आई 
कोई ना है विकल्प इस मायाजाल का बहुभान्ति है अजमाई 


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