बुधवार, 16 नवंबर 2022

 यह दुनिया भी अजीब शै है दोस्तों

बड़ी जल्दी आपको भूल जाती है या ,भुला देती है
गर इसकी रफ़्तार से ना चलो ,आपको गुमा देती है
सच बोलो गुस्सा करती है, ना बोलो तो मगरूर बताती है
ज्यादा मेल -मिलाप करो तो घर से फारिग बताती है
संकोची प्रवृति रखो तो घमंडी का तमगा पहना देती है
जिनका भला सोचो तो बेबकूफ हमको वही जनता बनाती है
गैरों का सोचा बहुत दोस्तों पर दिल ने अब ह़ार मान ली है
ठीक है इस ऊम्र तक आते- आते अब दुनिया पहचान ली है
--रोशी
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मंगलवार, 15 नवंबर 2022

 शरद ऋतू है आई ,वातावरण में है शीतल वयार छाई

तन को दे ठंडक का एहसास ,मन भीतर नव उजास छाई
शादी ,व्याह ,,दावतों के दौर भी दे रहे अनुकूल मौसम का संकेत
बेहतरीन मौसम का लुफ्त उठा रहें हैं सब ,तगड़ी है इसकी गिरफ्त
सुस्वाद व्यंजनों का स्वाद तो आता ही इस मौसम में ,होता सब हज़म
सिल्क की चमक मखमली एहसास तो महसूस करते सिर्फ शरद ऋतू में
पश्मीना,जामावार का सुखद एहसास तो करते हैं हम सब शीतकाल में
गज़क ,रेवड़ी भी आती हैं परदे से बाहर सिर्फ थोड़े वक़्त के लिए इस मौसम में
आइसक्रीम जो राज करती है दिलों पर उसको भी जाना होता है अज्ञातवास में
इस सर्वसुख के साथ एक मार्मिक तस्वीर भी है इस अद्भुत मौसम की
बेघर ,गरीब के लिए बहुत दर्दनाक रातें होती हैं इस मौसम की
बहुत भयानक पक्ष ,दर्दनाक पहलु है इस खुशगवार मौसम की
यह तो होता हमारा नसीब किसको है क्या मिलता?
--रोशी

सोमवार, 14 नवंबर 2022

 हिंदुस्तान के सभी नौनिहालों ,बच्चों को बाल दिवस की शुभकामनाएं

आइये शपथ ले की हम उन से उनका बचपन ना छीने उनको भरपूर जीने दें
भ्रूण हत्या ना कर बेटियों को जन्मने दें ,बेटों को बेहतर संस्कार दें
स्कूल की हैसियत नहीं तो कम से कम मानवता का पाठ खुद से दें
चोरी ,झूठ , हत्या जैसे व्यसनों से दूर रखें ,माँ -बहनों की इज्ज़त का गुर दें
अपनी इच्छाएं ,अपने सपने बच्चों पर ना लादें,उनको उड़ने के लिए पंख दें
बुजुर्गों की इज्ज़त ,परिवार का साथ जरूरी ना बताया उनको तो नस्लें होंगी बर्बाद
सीखेंगे जो बचपन में तो चलेगा जीवन भर बच्चों के साथ ,हम रहेंगे सदेव आबाद
यह भविष्य हैं इनको सुरक्षित रखना है इनको जरूरी गर दुनिया पर करना है राज़
परचम लहराएगा दुनिया में हमारा ऋषि सुनक ने कर डाली है इसकी शुरुआत .....
--रोशी
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Vinita Agarwal
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रविवार, 13 नवंबर 2022

 जीवन में खुश रहने का है मूल- मन्त्र बहुत ही छोटा तजुर्बे से

अपने गम ,तकलीफों को समझो सदेव कमतर जहाँ भर से

खुशियों को महसूस करो गैरों से सौ गुना ज्यादा दिल से
दुःख कभी ना कष्ट देगा तुमको,सुख हमेशा बरकत का एहसास दिलाएगा
जब रहेगा दिल –दिमाग खुश तो घर –परिवार हंसेगा-खिलखिलायेगा
जीने के नज़रिए को है बस बदलने की जरूरत ,यह कोई और ना बताएगा
सोच अपनी खुद बदलने की है जरूरत ,जीवन खुशहाल हो जायेगा
दूसरों के घरों में नहीं अपने घर का आइना देखो ,सब खुद पता चल जायेगा
अपनी ख़ुशी से कम दूसरों के घर झाँकने में निकल दी फ़क़त जिन्दगी
अब जितनी बची सुधार लो दूजा और मौका फिर ना मिल पायेगा
....रोशी
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मंगलवार, 8 नवंबर 2022

 ऊम्र बिता दी तजुर्बे हासिल करते -करते

हर गुजरता दिन दे जाता है नयी सीख जाते -जाते
इतने संकरे मोड़ों से गुजरी है जिन्दगी अब तक
बहुत कुछ हासिल कर लिया इस ऊम्र तक आते -आते
होती डगर सबकी टेड़ी ही होती है ,आसां नहीं यह सफ़र जिन्दगी का
किताबें तो सिर्फ पढना हैं सिखाती ,हर दिन देता तजुर्बा जीने का
शतरंज की बिसात की मानिद है जिन्दगी,शह-मात का खेल है हर रोज़
तरक्की ,यश -अपयश जन्मते ही विधना लिख देती साथ हमारे
बस कितने इम्तेहान होंगे जिन्दगी भर ये ही ना होता हाथ हमारे
--रोशी

रविवार, 6 नवंबर 2022

 लड़कियां वाकई बहुत जल्दी बड़ी हो जाती हैं

कद से ,अक्ल से ,दिल से जल्दी बड़ी हो जाती हैं
माँ का दिल ,बाप का चेहरा मिनटों में पड़ लेती हैं
मां की जरूरतें ,पिता की जेब सब पलों में जान जाती हैं
ससुराल में पाँव रखते ही उसका मानचित्र समझ लेती हैं
पति ,सास -ससुर सबके दिल -दिमाग पलों में समझ जाती हैं
हों चाहे रईस की बेटी पर पति की औकात से घर चलाना जानती हैं
कोई सिखाता नहीं पर अपनी घर -गृहस्थी चलाना खुद सीख जाती हैं
मां बनते ही बच्चे को बाखूबी सम्हालना खुद- बा खुद जान जाती हैं
बच्चे के इशारे ,जरूरतें खुद पड़ना सीख जाती है ,अद्भुत ही लड़कियां होती हैं
--रोशी
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शनिवार, 5 नवंबर 2022

 औरत ना पहले आजाद थी ,ना अभी स्तर बदला है समाज में उसका

हैसियत अभी भी वही है जो सदियों पहले मापदंड था तय उसका
अखबार ,न्यूज़ -चैनल ,समाज सर्वत्र खबर औरत ही है
दहेज़ ,रेप ,भ्रूर्ण हत्या दरिंदगी सिर्फ नारी के साथ ही है
तलाक जैसी कुप्रथा सिर्फ उसके वास्ते है ,सदियौं से वो सहती आई है
कंधे से कंधा कितना ही मिला ले पर शोषंड का शिकार वही होती आई है
पहुँच गए हैं चाहें चाँद पर पर घर के चाँद को खुला आसमां नसीब नहीं है
खिड़की -दरवाजे सब बंद हैं ,अक्सर उनके वास्ते रोशनदान भी मयस्सर नहीं है
अब नारी अपने हक ,जिम्मेदारी बाखूबी जान गयी है ,पर जुबां उसकी सिल गई है
बदलाव तो हुआ पर बहुत मामूली ,निम्न स्तर पर उसका ओहदा आज भी वहीँ है
--रोशी
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