शनिवार, 28 जनवरी 2023

 कश्मीर की व्यथा

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क्यों आप सबने मुझको अपने वजूद से जुदा कर दिया ?
हिस्सा था में आपका क्यों कर मुझको तनहा कर दिया ?
कभी होते थे मेरे शिकारे भी सैलानियों से गुलज़ार
मेरी घाटी रहती थी सालों -साल टूरिस्टों से आबाद
केसर की लाजबाब खुशबू ,फूलों की वादियाँ थीं पहचान मेरी
चिनार के दरख़्त आज भी ख़ामोशी से राह तकते हैं तेरी
कहवा के प्याले ,रोगनजोश की खुशबू तैरती है आज भी फिजां में मेरी
आतंकवाद,बम ,गोलियां ही बस अब सिर्फ़ रह गई है पहचान मेरी
गुजारिश है आवाम से मिल-जुल कर दो आवाज़ बुलंद मेरे हक की
टूट जाएँ हौसले चीन और पाकिस्तान के जब वो सुने आवाज़ पूरे हिन्द की
रोशी
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 कैसे मां समझ लेती है नवजात के दिल का हाल ,जो समझ से परे है सबके

बालक से बातें करती है ,अपनी बातें नवागत के दिल तक पहुंचाती है हक से
बच्चे की पीड़ा ,ख़ुशी आँखों में झट पड लेती है ,क्या -क्या जादू वो जानती है
गृहस्थी की गुत्थियों को सुलझाना बाएँ हाथ का खेल है,जो बाखूबी वो जानती है
ईश्वर ने बनाया मां को पूरी तवज्जो के साथ कायनात की खूबियाँ दे डालीं उसको
,मेहनती ,नेक,कामयाब इंसान बनाने की क़ाबलियत भी ईश्वर ने है बख्शी उसको
हालात चाहे जैसे हों मां के,अपना सब कुछ औलाद पर वारने को रहती सदा तैयार
एक बार मां से बात कर हम कर लेते हैं अपने कर्तव्यों की इतिश्री हर बार
कभी तीज -त्यौहार पर जाकर पूछ लेते हैं हाल-चाल साल में एक आध बार
मां के लिए वो दिन ही बन जाता त्यौहार जब उसकी औलाद आती उसके घर द्वार
बच्चे दो -चार फरमाइश ही पूरी ना होने पर माँ को देते हैं झट से त्याग
मां ही वो शख्सियत है जो कर देती है सौ गुनाह भी औलाद के दिल से माफ़
रोशी

सोमवार, 23 जनवरी 2023

 एक तो शीत लहर उधर से बारिश का कहर

ईश्वर रहम कर अपने बन्दों पर ,ना झेला जाता अब मौसम का कहर
बिन छत के जो जी रहे हैं उनपर अब थोड़ा रहम कर
एक गुदडी में जो काट रहे हैं रातें कुछ उनका भी ख्याल कर
पूस की मावट ना झेली जाती ,सांसे भी हैं अब भयातुर
बरछी सी अंग पर चुभती हैं बारिश की बूँदें ,कहर सी लगती अब शीत लहर
प्रकृति की रफ़्तार भी अब पड़ गई है सुस्त ,सर्वत्र है छाया शीतलता का कहर
बरसे ना अब जल की बूंदे कर दो अपने बन्दों पर मेहर ..
--रोशी
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शनिवार, 21 जनवरी 2023

 ख़ुशी का पैमाना सबका अलग होता है ,बहुतेरे रंग हैं इसके

जिन्दगी की छोटी -छोटी खुशियाँ भी भिगो जाती हैं तन मन सबके
कर देती हैं आत्मा तृप्त ,नाच उठता है सम्पूर्ण मन जन -जन के
कदापि नहीं होता रोमांच अक्सर बड़ी -बड़ी खुशियों से भी तनिक सा
हम खुद तय करते हैं इसके पैमाने ,खुद ही होते हैं जिम्मेदार हमेशा
गर रहना है हमेशा प्रसन्न और मस्त तो ख्वाहिशों और सपनों को छोटा रखो
जितना आकाश लाँघ सको उतने पंख पसारो,उम्मीदें अपनों से सदेव कम रखो
ख़ुशी के हैं यह नुस्खे बड़े काम के ,बुजुगों ने भी ये ही नुस्खे थे सदेव आजमाए
जितनी हो चादर उतने ही पाँव फैलाओ बचपन से यह ही थे सदा सुनते आये
--रोशी

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2022

 साल ख़त्म होने को आ गया ,सोचा विगत वर्ष में क्या खोया -पाया

सुकून भरी जिन्दगी जी ,खुदा की नेमतों का भरपूर लुत्फ़ उठाया
अपनों के साथ जिए जीवन के बेहतरीन लम्हे और उनका आनंद उठाया
कोरोना से भी जीती जंग ,परिवार संग खुशगवारी से पूरा वर्ष बिताया
जब जोड़ -घटाव किया तो खुद की जिन्दगी को नफे में ही पाया
दोस्तों के साथ गुजारा साल बस चुटकियों में ही झट गुजर गया
हाल पूछते हैं जब वो हमारा ,उनके फ़ोन के इंतजार में दिन झट गुजर गया
छोटी -छोटी खुशियों को समेटते रहे साल कब गुजरा अंदाज़ा भी ना हुआ
है अर्ज़ उपरवाले से गुजार दे बाकी जिन्दगी यूँ ही जैसे पिछला वर्ष गुजर गया
--रोशी
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बुधवार, 28 दिसंबर 2022

 उफ़ क्या हो रहा है ?हमारे समाज को

युवक,युवतियां बेझिझक खुदकशी ,निर्मम हत्या कर रहे हैं
बिन सोचे -विचारे पीछे छूट जाने वाले परिवार को नकार रहे हैं
वृद्ध माता -पिता जिनकी शेष जिन्दगी दोजख के समान बना जाते हैं
आंख मूंद कर मोहब्बत करते हैं ,पल में रिश्ता ख़त्म करते हैं जिन्दगी हार जाते हैं
आत्महत्या कर खुद चले जाते हैं,कदाचित आकर परिवार की जिल्लत देख पाते हैं
युवा पीडी को,ऊँचे उड़ने की चाह,परिवार से विघटन शायद यह दिन दिखा रहे हैं
आधुनिकता का जमा पहने उच्च वर्ग का माहौल पथ भटकाने के वास्ते काफी है
इसकी दलदल में फंसकर अपनी सीमाएं ,माहौल ,संस्कार सब भूलते जा रहे हैं
एक दूजे का अनुसरण आँख बंद कर ,ड्रग्स ,सट्टा जैसी गंद में फंसते जा रहे हैं
परिणाम भी इसका हम सब रोज़ टीवी,अख़बार में रोज़ पड़ते आ रहे हैं
प्रेमियों की आपसी कलह हत्या,खुदकशी सरीखे संगीन परिणाम रोज़ आ रहे हैं
--रोशी
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मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

 जिन्दगी की जरूरतें ,इचछायें जब जितनी चाहे बड़ा-घटा लो

जब चाहो चादर से बाहर पाँव निकालें, बेहतर होगा अन्दर रख लो
बचपन से बच्चों को पैसे की एहमियत सिखाओ ,बचत की उनको आदत डालो
गर सीख गए रूपये की कीमत ,तो जिन्दगी में ना खानी पड़ेगी ठोकर
वक़्त ,जरूरत के हिसाब से पैसा खर्चना भी बचपन से सिखाना होगा
बेहतर संस्कारों से, तरबियत से बच्चों का मुस्तकबिल बेहतर होगा
आज की थोड़ी से मेहनत से ,हमारी उम्दा सोच से बच्चों का कल संवर सकेगा
--रोशी
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