शनिवार, 10 सितंबर 2011

दुखवा मै का से कहूँ ?

किसी भी  ख़ुशी में भी, डर लगा रहता है निरंतर  
नजर लग  जाती है फ़ौरन ख़ुशी में हर पल 
जब कभी पंख लगाकर उड़ना चाहा  हमने 
आसमा में ढेरो गिद्द-बाज मडराते नजर आये 
फ़ौरन उड़ना भूल घोसले में बसेरा कर लिया 
जब कभी चाहा आसमां में उड़ना और स्वच्छंद  चह-चाहना   
गंदे- भद्दे अनर्गल भाषण सुने कि जिव्हा भूल गयी बोलना 
जब कभी चाहा स्वच्छंद विचरण करना यहाँ और वहां 
इतनी बंदिशे, इतनी यंत्रनाये मिलीं कि चलना भूल गए 
जब चाहा खुल कर हँसना, बोलना बतियाना, तानों में उलझ गए 
बंद कर दी गई, जुबान कि शब्दों का अर्थ भूल गए....
आखिर लड़की जात को ही इतनी बंदिश क्यूँ है ? 
क्यूँ  आज भी समाज उनकी खुशियों पर अंकुश रखता है 
                                                रोशी अग्रवाल 

मन की बेचैनी

मन पता नहीं कहाँ रहता है ? 
हर बक्त कुछ दूंडता रहता है 
अबूझे सवाल पूछता रहता है 
हर पल आशंकाओ में घिरा रहता है 
कुछ बुरा न हो इसी दर में जीता रहता है 
क्यूंकि हो चुका है सब कुछ घटित बुरा उसके साथ 
अब और कुछ न हो इसी में डूबा रहता है 
क्या करे वो, कैसे संभाले इस दिल को 
कुछ भी न होता जबाब है उसके पास 
ये तो बस डरता रहता है, परेशा करता रहता है ..


हरियाली तीज

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प्यासी धरती और  झुलसता  तन 
शीतलता देता है बरसता सावन 
हरियाली तीज आने को है सन्देश देता  है यह सावन
दूर देश बैठी बेटी का आने को है बेक़रार मन 
भैया को पीहर जाकर बांधुंगी राखी है यह बेचैन  मन 
जो न जा सकीं पीहर, ससुराल में हैं तड़पता उनका मन 
माँ भी संजोती थी सपने और जोहती थी  राह हर पल  
आती होगी लाडो, झूलेगी झूला, रचेगी मेहंदी घर में होगा हल्ला गुल्ला 
                                                                रोशी अग्रवाल 




























































मंगलवार, 6 सितंबर 2011

जीवन चक्र

जीवन के पचास वर्ष पूरे कर लिए सोंच कर होती है हैरानी 
समय चक्र कितनी तेजी से घूमता है बदल देता है जिन्दगी की रवानी 
जिन्दगी पचास वर्षो में क्या  बदला बयां करनी है अपनी जुवानी 
कब बचपन गुजरा बन गए माँ फिर सास और बन गए अब नानी 
हमारी जिन्दगी में पहले आयीं दो नन्ही परियां, उनको बाखूबी पढ़ाया लिखाया थीं वो घर की रानी 
फिर आया हमारा लाडला राघव, सिखाई जिसने हमको जीने की नई कहानी 
विगत दस- पंद्रह बर्षो में उलट- पलट गई जिन्दगी की सारी रवानी 
माँ को खोया, बीमारी, डिप्रेशन और मुसीबतों ने भुला दी  जिन्दगी की कहानी 
पहले था माँ का साया, तो कभी भी न महसूस होने दी उन्होंने  कभी  कोई परेशानी 
सबको सब सुख होते नहीं नसीब यही है  हमारी जिन्दगी की एक छोटी सी कहानी 
हमारा साथ दिया पापा ने बहन दोस्तों ने और बच्चो ने सुलझाई हर परेशानी 
थाम कर जिनका हाथ कभी भी न रुकी हमारी जिंदगानी 
आगे समंदर था गहरा पर हमारी कश्ती में भी थी पूरी रवानी 
धीरे- धीरे, रफ्ता-रफ्ता किनारे की ओर बढ रही है हमारी जिंदगानी 
                                                                   रोशी अग्रवाल 

मेरे दोस्त तेरे नाम

५० का आंकड़ा कर लिया है तुमने भी पार 
ईश्वर को यूँ ही दया बनी रहे तुम पर अपार 
हम दोनों को शायद इश्वेर ने एक साथ ही दिया होगा आकर 
कई समानताएं कई बातें आती रहीं हैं बार- बार
मै और तुम दोनों यहीं खेले और पले- बढें और सुख पाए 
माँ- पिता की छत्र-छाया और जो सुख चाहा वो सभी थे पाए 
किस्मत में था एक शहर में रहना साथ दोनों का वो भी निभाएं 
हम दोनों ने ही ईश्वर प्रदत्त, एक- एक होनहार पुत्र रत्न पाए 
माँ भी हम दोनों की जो घर से निकली, दुर्घटनावश  लौट ना पायीं 
 आज हम दोनों पर ही ईश्वर ने छोड़ी जिम्मेदारिया- जो हम जा रहें हैं निभाए 
मै पापा के पास और तुम्हारे पास पापा देखो है कितनी समानतायें 
ईश्वर नवाजे तुम्हें ढेर सी खुशियाँ, और दूर करे सारी  विपदाएं  
कुदरत ने दी हैं हम दोनों की जिन्दगी में बहुत सी समानतायें 
इन्सान कुछ भी न कर सकता है मांगते  है हम यही दुआएं 
जैसे अब तक निभाया है यह रिश्ता वैसे आगे भी हम-तुम निभाएं 
जितनी भी जिन्दगी काटी अच्छी कटी और आगे भी सुंदरता से  सजाएँ ...
                                                                   रोशी अग्रवाल 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

रीतिरिवाज

जब हुए विवाह के लायक तो भी रीतिरिवाज न बदले 
क्यूंकि तब सुना था माँ के मुह की लड़की के हालात न बदले
वही दान, वही दहेज़, माँ बाप को चाहिए और लड़के को रंग गोरा 
पहले न था शिक्षा पर इतना जोर पर व्याह पर खर्च था पूरा 
लड़की को दिखाना, उसकी नुमाइस सभी कुछ भी न था बदला 
पसंद आ गई तो रिश्ता पक्का वरना खाया पिया और चले 
लड़की के दिल दिमाग में जरा भी झांक कर न देखा की उस पर किया गुजरी 
बेचारी कितनी तकलीफ मानसिक व्यंग से वह है गुजरी
पर लड़के, उसके सम्बन्धी , माता पिता उनका इससे किया वास्ता 
लड़का तो ऊँचे दाम पर बिक ही जायेगा आज नहीं तो कल कोई दाम
दे ही जायेगा. 
हालात आज भी बही है बिल्कुल भी न बदले
बाप को चाहियें रुपया, बेटे को रंग गोरा और पड़ी लिखी 
नुमाइस पहले भी होती थी आज भी होती है और होती रहेगी 
आए खाया पिया, देखा और चले जरा भी न दिल धड़का 
बेचारी लड़की आज भी बहीं है उसी लीक पर चल रही है
उस मासूम के लिए क्यूँ नहीं दर्द उपजा ? क्यूँ, क्या कभी उपजेगा ? 
नहीं शायद कभी नहीं क्यूंकि वो तो यहीं यातनाये 
कवच झेलने के लिए जन्मी हैं इस संसार में और 
यह समाज न बदला न ही कभी बदलेगा 
क्या नहीं बदल पायेगा ये समाज ?
जो था कल बही है आज क्या इसको कहते है हम समाज


गुरुवार, 1 सितंबर 2011

अर्धशतक किया है आज मैंने पूरा

जीवन का अर्धशतक किया है आज मैंने पूरा 
लगता नहीं है की पचास का आंकड़ा छू लिया है पूरा
पीछे मुड़कर देखा तो पाया, कि अभी तो हम बच्चे थे 
क्यूंकि हर वक्त माँ पिता का वरद हस्त था हम पर पूरा
माँ तो हमेशा बना कर रखती थीं ,अपना बच्चा हमको पूरा
फिर जिन्दगी उलझ गई छोटे- छोटे बच्चों को पालने पोसने में 
उनकी शिक्षा, उनकी जिन्दगी के अहम् फैसलों को किया पूरा
दो बेटिओं के बाद पाया राघव (बेटा) को जिसने जीवन को हमारे संवारा  
फिर खोया माँ को, लगा जिंदगी को खुशिओं का साथ न था गवारा 
जिन्दगी फिर दौड़ाने लगी पटरी पर क्यूंकि जाने बाले के साथ न जाया जाता 
समय चक्र का पहिया दौड़ रहा था और हमको तनिक न पता चला 
जब पता चला तो पाया कि हम आधी से ज्यादा यात्रा कर आये 
अब थोडा जीवन बाकी है आशा है सुख से कट जाये 
हम वो छडं न भूल पाएंगी जब प्रभु ने दिया एक अनुपम उपहार 
आन्या (नातिन) से पाया मैंने नव निर्मल रिश्तो का संसार 
पचासवी तो मना रही हूँ सबके साथ 75 वी0 भी शायद मना ले आप लोगो के साथ
ये सब कुछ है अब परम पूज्य ठाकुर जी के हाथ ....

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...