शनिवार, 7 दिसंबर 2013

,बढती उम्र





सब कहते हैं कि बढती उम्र  है देती बुडा इंसान को
नहीं ......कदापि नहीं ,सिर्फ दो चार अपवादों को छोडकर
आम इंसान तो रोटी कीजुगत में ही हो जाता है बुडा
परिवार के वास्ते छप्पर ,लिंटल डलवाते सरक जाती है आधी उम्र
रही- सही  कसर पूरी कर देती है ,उसकी घर बैठी जवान बेटी
खेत में बढती है नित चार अंगुल ककड़ी पाती हैं सीरत वैसी यह जवान बेटियां
बढता दहेज का दावानल ,सड़क पर बड़ते शोहदे बस काफी हैं बुडा देने के लिए
बच्चों के भविष्य के सपनो का नित टूटना -बिखरना ,फिर रोज नए खाव्ब
असमय ही दे जाते हैं ढेरों झुर्री ,सलवटें और निस्तेज काया .......
आम आदमी तो यूँ ही असमय पहुँच जाता है जिंदगी के आधे सोपान पर
उच्च- बर्ग जैसे अपनी मुट्ठी में जकड लेता है बुढापा
मेकअप की परतों के नीचे ,शानोशौकत के आवरण में छिपा लेता है बुडापा
भरा पेट ,बदन पर कीमती लिबास सब कुछ छिपा लेते हैं बुडापा
न कल की फ़िक्र ,ना भविष्य का अन्धकार .कोसो दूर रहता इनसे बुडापा

मंगलवार, 12 मार्च 2013



गए थे पिछले पखवारे सैर करने को बैंकाक ,पटाया 
मन था उत्साह से लबरेज़ ,विदेश यात्रा ने था मन को लुभाया 
ढेरों ख्वाब ,अनगिनत सपने थे मन में संजोये ,मन खूब था हर्षाया 
थोड़ी हकीकत ,और आधी अधूरी जानकारी भी थी उस देश की 
पर जाकर जो देखा उस से मन और आत्मा दोनों का वजूद थर्राया 
क्या स्त्री सिर्फ भोग्या है ,सिर्फ इस्तेमाल के वास्ते ही है बस उसका वजूद 
कैसे कोई देश सिर्फ अपनी तरक्की का रास्ता औरत को बनाकर हथियार 
खोज सकता है ,सोच सकता है और मिटा सकता है उसका अस्तित्व 
ढेरो देखे पुरुष जो बन रहे हैं स्त्री कमाने को ढेरों पैसा और दूंढ रहे हैं ख़ुशी 
ओढ़ कर नकली मुखोटा ,जी रहे हैं नकली स्त्री बनकर ,............
लड़की जो जन्मते ही मान ली जाती है माँ-बाप की आमदनी का जरिया 
कैसे कोई माँ-बाप धकेल सकते हैं उसको जिस्मफरोशी की गहरी खाई में ?
नजर डाली अपने ऊपर तो पाया हम भी कुछ कम नहीं उन विदेशियों से 
वो जन्मने के बाद लड़की की आत्मा का हनन कर रहे हैं और हम ??
हम तो गर्भ में ही उसकी आत्मा और उसका वजूद मिटा डालते हैं 
पर दोष तो दूसरों का ही दीखता है ,ऐसा ही सदेव होता है 
इतना व्यभिचार ,ताज़े गोश्त की मंडी ,कलेजा था हलकान 
सुनने और देखने में है बहुत फर्क यह मन आज था जान पाया 
औरत तो बस दिख रही थी हर मोड़ पर बिकती भेड़ -बकरी की  मानिद 
और बाज़ार सजा था बहुतरे काले ,गोरे ,बूड़े और नौजवान खरीदारों से 
औरत का यह रूप था हमारे लिए अनजाना जो खुद को रही थी परोस 
हर किसीको  सर्फ और सिर्फ कुछ चमकते सिक्के और डॉलर के वास्ते 
पैसा बहुत जरूरी है जीने और जिन्दगी के वास्ते 
पर यूँ और इस रूप को न मन था आखिर तक स्वीकार पाया ...........

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013



कब आया मधुमास और कब बीता मधुमास ?
ना दीखी फूलती सरसों ,ना भ्रमर की फूल को थी आस 
ना पीत बसन में थी कोई ,गोरी ना पिया मिलन की आस 
भोजन थाल में भी ना थी पीले ,केसरिया चावल की सुवास
ना फूलता दीखा उपवन में कहीं अमलतास ,सोया था जैसे मधुमास
धरा सूनी ,नभ भी था सूना क्यूंकि बसंत तो बस सिमट रहा है साल दर साल
वन ,उपवन ,बाग़ -बगीचे तो हमने सब समेटकर बना लिए बोन्साई
धरा से आकाश तक सब मानुस ने लिए समेट अपने भीतर अपने साथ
कहीं सिमट ना जाएँ यह त्यौहार भी किताबों और कहानियों की मानिद हमारे साथ
ना पतंगों का जोश दीखता नौजवानों में ,ना बच्चों में उमग पतंग काटने और लूटने की
 कुछ ने तो ओड़ लिया जामा आधुनिकता का ,कुछ पर हावी है परीक्षा का हौवा 
बदल गए हैसब माएने  त्यौहार होने और मनाने के ,बदल गया है नजरिया सबका
भविष्य में किताबों में पड़ा करेंगे की होता था बसंत नाम का भी  त्यौहार 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013



क्या बोलें  ,?क्या लिखें समझ से है सब परे 
दिल और जज्बातों के पन्ने हैं सब के सब कोरे 
विष की चाशनी में लपेटकर शब्दों को परोसने की कला 
न सीख सके और रहे जिन्दगी की कक्षा में नाकामयाब 
बहु -भांति चाहा सीखना पर न हो सके कभी कामयाब 
जीने के लिए जो है बहुत जरूरी फलसफा हो गए उसमें फेल 
समेटना चाहा इस जहाँ को मुट्ठी में अपनी पर बची थी कुछ ही रेत 
सोचा बहुत ,मंथन किया पर मिला न कोई ओर और छोर  

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

उत्पीडन

ना कोई शब्द .ना कोई अलफ़ाज़ बचे हैं आज हमारे पास
सब कुछ चिंदी -चिंदी उड़ गए ,बह गए समूचे दर्द के दरिया में 
थोडा -थोडा तो हम रोज़ मरती ही थी कुदरतन इस समाज में 
क्यूंकि हम लड़की जो जन्मी थी माँ के गर्भ से ,इस दुनिया में 
कभी राह चलते शोहदों  ने किया था दुश्वार ,और छीन लिए एहसास 
 सारे गिद्ध रोज़ ताकते ताज़ा मांस अपनी अपनी मंडी का 
किसको और कैसे मिलता जरा भी ना भान रहता अपनी अपनी बेटी का 
क्यूंकि हम लड़की जो जन्मी थी माँ के गर्भ से ,इस दुनिया में 
बहुत हो चुका अब अत्याचार मासूमों पर ,अब तो उठो और चेतो 
घर में ही सिमट जाएगी जिन्दगी अब बेटी की 
देश के नेता तो कुछ कर ना सकेंगे ,खुद हैं जो खुनी और बलात्कारी 
आवाम को ही करना , बेटिओं को खुद लड़ना होगा 

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

प्यारी बिटिया

सावन की बद्री में
झूलो की बद्री में
तुम याद बहुत आओगी
                    बारिश की फुहारों में
                     तृप्त करती  बौछरो में
                     तुम याद बहुत आओगी
मेहंदी के बूंदों में
रंग बिरंगे सूटों में
तुम याद बहुत आओगी
                    रंग बिरंगी चुनर में
                    लहंगे की घुमर में        
                    याद बहुत आओगी
मेघो की घन घन में
पायल की छन छन में
तुम याद बहुत आओगी
                            चमकती बिंदिया से
                             छनकति पायलिया में
                            तुम याद बहुत आओगी
                                              

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

बरसता सावन

टिप -टिप गिरती बूंदों की आवाज़
कर रही थी यूँ रात्रि की निस्तब्धता भंग
दूर कही कोई छेड़ रहा हो जलतरंग 
झींगुरों की सरसराहट भी बना देती है अद्भुत समां 
कोई है मदमस्त सावन की रूमानियत में 
किसी का होश है हुआ इस सावन में गुमां 
नन्हे बालक ले रहे पूरा आनंद उस घुमड़ते सावन का 
अब कहाँ रहे वो भीगते प्रेमी युगल इस मद मस्त सावन में
हो गयी हैं अब यह किताबी बातें सिर्फ इस जहाँ में 
बदल लिया है अब शायद प्रकृति ने भी अपना स्वरुप 
ना वो रहे काले घुमड़ते ,लरजते ,बरसते मेघ 
न रहा वो सावन में भीगने ,लुत्फ़ उठाने का आनंद  

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...