शनिवार, 28 जनवरी 2017

व्यथा




आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा
चौदह वर्ष कैसे गुजारे होंगे सती ने उन पिशाचों के बीच
ना कोई ख़त न था कोई सन्देश परस्पर पति -पत्नी के बीच
इंतजार भी खतम हुआ उस निर्मोही का ,भेज दिए थे जिसने दूत
छुद्र मानसिकता का जिसने दिया था अपना सबूत
वनगमन को जाते ना सोचा कदापि उस नववधु उर्मिला के वास्ते
कर दिया उसके सपनों पर तुषारापात ,अँधेरे कर दिए थे उसके दिन और रात
काश दिखाया होता बद्दप्पन ,ना छुड़ाया होता उर्मिला से लच्छमन का साथ
उसकी पीड़ा का नहीं है कंही इतिहास में कोई पन्ना
नामुमकिन है उर्मिला सरीखा जीवन जीना
काश राजा राम ने दिखाया होता थोडा सा भी बद्दप्पन
निज आदर्शों को त्याग कुछ सोच होता उपर उठकर
तो दोनों बहनों की ताक़त ,त्याग ,को जमाना देखता कुछ हटकर

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

                               नन्हे  मेहमान 
ओ  नन्हे  मेहनान ,तेरे  वास्ते है हम सब परेशान 
तेरी सलामती  और सेहत के लिए मन है  परेशा ,
बेचैन  हर  घड़ी  हर पल हैं नई आशाए ,नये सपने 
नये  रिश्ते  की ,सुगब गाहट ,नई  धड़कने 
 बढ़ती  है  धड़कन  दिल  की  मन  होता  है बेचैन  
हर दम  सोचती  हूँ  उस वेदना को और भर आते नैन   आंखों में आ  जाती  है सूरत  उस  नन्ही सी जान की  

             आन्या  के  जन्म  से  पहले
                       (धेवती )
                      ...... नारी की व्यथा .......
जीवन के अतीत में झांकने बैठी मैं पायी वहां दर्दनाक यादें 
और रह गयी स्तब्ध मैं ..समूचा अतीत था,  घोर निराशा और अबसाद में  लीन 
 कुछ भी ना था वहां खुशनुमा ........थी बस जिंदगी बदरंग और उत्साहहीन

 सपनो ने भरे  नये  रंग  भविष्य ने बुने सपने यादें कर घूमिल सजा लिए रंग जीवन में अपने..................
आज तक ढो रही थी जिन  लाशों का गठ्ठर तिल - तिल कर जी रही ,प्रतिदिन मर मरकर  शर्म और हया का उतार फेंका झीना आवरण जो था  वर्षो का बोझ सर पर 
बच्चों ने था ठहराया सही यही मेरी तपस्या का है..फल ☺☺
दफ़न कर गहरे में उस गठ्ठर को निज जीवन किया सफल 
जमाना भी देता  है नारी को घातक ताप
 वर्षो से यही हैं नारी की पीड़ा,भोगा हैं नारी जात ने इसका संताप 




गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

पापी पेट की खातिर


सर्दी


हाड गला देने वाली सर्दी में ,जब हम गर्म कपड़ों में भी रहे थे ठिठुर
देखा जो नज़ारा ,हड्डियाँ भी हो गयीं सुन्न,मानवीयता होती देखी निष्ठुर
चार अधनंगे बालक मात्र कुछ मछलियों के लिए जाल डाले थे एक गंदेपोखर में
कुछ बालक उस सर्दी में दूंढ़ रहे थे सिंघाड़े की बेल से कुछ सिंघाड़े उस पोखर में
...शीतल जल का सिर्फ एहसास ही कर देता है रोम रोम में सिरहन
गरीबी से लाचार, कुछ सिक्कों की खतिर,या भूख से हो कर बेचैन
थे मजबूर इस पूस माह में, तालाब में भी जाने को पेट की खातिर
चाहें मच्छी,सिंघाड़े खाने हों,या हों वो बेचने को पापी पेट की खातिर
ROSHI....

बुधवार, 19 अगस्त 2015

हिना

     
  आधुनिकता का ऐसा रंग कुछ यूं चड़ा  मेहँदी पर कि अब हथेलियौं पर ताज़ी पिसी हिना से  बने चाँद सितारे पूरी तरह गायब हो गए ,बरसों हो गए किसी महिला के हाथ  पर सिलबट्टे की पिसी मेहँदी से बने चाँद -सितारे देखे हुए
बचपन में जब मेहँदी के कोन नहीं मिलते थे तो हर त्यौहार पर माँ ताज़े हरे मेहँदी के पत्ते पिसवा कर हाथों पर तीली से चाँद -सितारे बनाती थी और कई बार मेहँदी का लड्डू बना कर मुट्ठी भींचने को कहती थीं ......उस मेहँदी का क्या रंग ,क्या खुशबू होती थी नयी पीड़ी को तो पता ही नहीं होगा अब तो हर हाथ पर सुंदर डिजाईन होते हैं पर ,२ दिन बाद उतरी मेहँदी और हाथ का सत्यानाश कर देती है हाथों से खुशबू की जगह जली हुई सी महक आती है जो आजकल रसायन इसमें गहरा रंग लानेके लिए मिलाया जाता है ..क्या करें हम भी वही इस्तेमाल करते हैं ,पत्तों वाली  ताज़ी हिना तो अब गांव में भी कोई ना लगाताहै ....

शनिवार, 15 अगस्त 2015

मेरा भारत महान

                                           स्वतंत्रता दिवस 
स्वतंत्रता दिवस तो मना रहे हैं पर खुद को
बेडिओं से जकडा पा रहे हैं
खुद कि अस्मिता बचाना है मुश्किल
रोज बेतियौं को लुटता पा रहे है
जब होगी नारी सुरक्षित,राष्ट्र का होगा नव निर्माण
फलेगा- फूलेगा देश हमारा ,बनेगा मेरा भारत महान 
                                                         ROSHI....

मंगलवार, 11 अगस्त 2015

धर्मगुरुओं का चुनाव

                           धर्मगुरुओं का चुनाव



बाजार से सामान खरीदते वक्त ,या हो और कोई सौदा सुलफ
रिश्ता जोड़ते वक्त , या दोस्ती करते वक्त हम बरतते हैं पूरी एहतियात
पर ना जाने क्योँ भयंकर चूक कर जाते हैं अपने धर्मगुरु चुनते वक्त
आसाराम ,भोले बाबा ,राधेमां जैसे ढेर से नाराधमी,धोंगियौं को
सौंप देतें हैं अपने जीवन की बागडोर ,उन अधमियौं के हाथ
अपना परिवार ,अपने नौनिहाल ,अपनी स्त्री और पति भी
मुड कर ना देखते उनका अतीत ,वर्तमान उनकी तिलस्मी दुनिया
भेड-चाल में अनुसरण किये चले जाते हैं हम ,मूर्खों की मानिद
यह भी तो बाजार है ,दुकानें हैं इन गुरुओं की जो हमको बेचते हैं
लुभाते हैं अपनी चालों से ,और हम हैं कि बिना जानकारी
बन जाते हैं उनके भक्त ,लुट्वातेहैं अपनी अस्मिता ,अपना बजूद
अपना सब कुछ पर ना कभी छोड़ते उनके हाथों लुटना
यह सिलसिला तो यूं ही चलता रहेगा ना कभी थमा है ना थमेगा
गलत वो नहीं गलत हैं हम जो सदियौं से यूं ही पाप के रहे हैं भागीदार
क्यूंकि गलत धर्मगुरुओं का चुनाव था हमको स्वीकार 
                                                                                               ROSHI

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...