शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

 


बड़ा ही खूबसूरत और बेमिसाल लफ्ज है घर
जहां बसते हैं माँ -बाप ,बच्चे और बेइंतेहा प्यार
आपसी सौहाद्र,इज्ज़त होती है जिसकी बुनियाद
बेहतरीन परवरिश पाकर महका देती इसको औलाद
घर की ऊंची दीवारें आगोश में समेत लेतीं सांझे सुख-दुख
हवा का रुख कितना भी बदले ,घर सँजो लेता सारे सुख -दुख
देश -परदेस कंही सैर कर लो भूलती ना कभी इसकी छत
दीवारें भी पुकारती इसकी कहती अब चलो बस अपने घर
कुछ तो होता है जरूर घर की खुशबू ले आती अपनी ओर
बेशक हो चाहे टूटा छप्पर ,मकान या आलीशान बंगला या कुछ और
विधा होती सदेव सबकी एक समान ,हम खुद होते अपने घर के राजा
जहां चलती सिर्फ हमारी हुकूमत ,देखते अपने परिवार को फलता -फूलता
रोशी

सोमवार, 4 अप्रैल 2022

 हमारी ज़िंदगी भी चलती रोज़ एक चलचित्र की मानिद कलाकार होते हैंखुद हम

रोज़ नए किरदार निभाते हैं ,कुछ रंगीन ,कुछ श्वेत -श्याम रूप में होते खुद हम
कुछ अभिनय हमारा बखूबी दिल चुरा जाता सबका ,कुछ में होते हैं फ़ेल हम
प्रीतिदिन नए गैटप,नया रूप ,नई कहानी को गड़ते हैं बेखौफ होकर खुद हम
परिवार , माँ -बाप , बच्चों ,और अक्सर दुनिया से बाखूबी एक्टिंग करते हैं हम
दुनिया में हर इंसान ने लगा रखे हैं अद्भुत मुखौटे ,जिनके मध्य में रहते हैं हम
अपने किरदार बेहतरीन निभाते हैं सब ,कैसा पुरस्कार मिलेगा ना जानते हैं हम
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रोशी -

रविवार, 3 अप्रैल 2022

 ॰देवी को पूजते हैं हम सब ,गर्भ में कन्या का वध करवाते हैं

कभी सोचा नहीं कि हम सब कितना दोगला जीवन जी जाते हैं
स्त्री ही है पालक ,संहारक ,जनमदात्री और ममता की मूरत कोई जान ना पाये
माँ के सारे रूप हैं इसमें भरपूर समाए,परिवार की है इसमें किस्मत समाये
देवी माँ को पूजने के साथ धरा पर कन्या के अस्तित्व को ना नकारो पछताओगे
गर रही ना बेटी तो सृष्टि थम जाएगी ,अपनी नस्ल को आगे कैसे बड़ाओगे
हमको दुर्गा माँ देती संदेश सिर्फ एक दिन ही नहीं रोज़ बेटी को दो भरपूर मान
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता,, ना खुश होगी माँ गर करोगे बेटी का अपमान
रोशी --

शनिवार, 2 अप्रैल 2022

 चैत्र नवरात्री की ढेर सी

बधाई
हर घर में है देवी की स्थापना करवाई
घंटे -घड़ियाल का शंख -नाद है गूँजा
हवन -पूजा से माहौल सुगंध से महका
धूप -कपूर से सुवासित हुये आँगन -चौबारे
पुष्पों से महके घर ,मंदिर ,सारे के सारे
सम्पूर्ण धरा पर माँ रहे रहमत तेरी
सुख -शांति की करना कृपा माँ मेरी
रोशी --

मंगलवार, 29 मार्च 2022

 कब कौन सा हुनर आपको शोहरत दिलवा दे ?

कब वो आपकी किस्मत के पन्ने पलट दे
कहना है मुश्किल ,कब जीवन के रंग बदल दे?
जरूरी नहीं जो विद्या बचपन में की थी हासिल
वही आपको कर दे सफल ,बना दे जीवन में काबिल
अगणित प्रतिभा होती है हर इंसा में जब चाहे करे हासिल
समंदर में ज्यौ छुपे होते अनमोल रत्न गहरे जल के भीतर
गोता तो खुद ही लगाना होता है ,मोती ,रत्न करने को हासिल
प्रोड़ावस्था में या बृद्धावस्था में भी हुए हैं कई अजूबे इस दुनिया के भीतर
जहां चाह वहाँ राह जैसे जुमले को किया सच हमारे कई धुरंधरों ने किस्मत को आज़माकर
जो सोचा ना था ख्वाब में वो भी कर दिखाया इस उम्र में आकर
रोशी --

सोमवार, 28 मार्च 2022

 साठ फीसदी भारतीय इंसान की ज़िंदगी बस स्वप्न देखते गुजरती है

जन्मते ही खाने -पानी की जुगाड़ फिर बीमारी की चिंता सताती है
स्कूल तो बहुत दूर पहले काम -धंधे पर बच्चे को लगाने की चिंता सताती है
सर पर छत ,तन पर कपड़ा सिर्फ इसकी जुगत वक़्त से पहले उसे बूड़ा देती है
बच्चों के मुस्तकबिल का सपना तो उच्च बर्ग ही देख पाता है ,सोच पाता है
आम आदमी समूची ज़िंदगी रोटी ,कपड़ा और मकान से आगे ना जा पाता है
समूची दुनिया चाँद पे कदम रखने के करीब है पर ,बच्चे को चंदा -मामा कह कर बहलाना बस उसका नसीब है
फसल कट कर घर आ जाए ,वर्ष की हाड़ -तोड़ मेहनत का हिस्सा उसको मिल जाए यह भी उसकी किस्मत है
बच्चों को बस अपने पैरों पर खड़ा करने में ही ,दिन -रात की जुगत उसको उलझाए रखती है
दुनियावी ऐशों-आराम तो सिर्फ कुछ ही इन्सानो की किस्मत में है ,बाकी की ज़िंदगी तो हमारी सोच से भी परे है
सिर्फ एक टुकड़ा रोटी का ,दो कतरा पानी ,शरीर ढकने को कपड़ा बस इतना ही मिलना बड़े नसीब की बात होती है
रोशी --
May be an image of 2 people, child and outdoors
Aditi Goel

रविवार, 27 मार्च 2022

 मिलते हैं रोज़ अनेकों बच्चों से ,हर उम्र और वर्ग के हम प्रतिदिन

रह जाती हूँ अचंभित देखकर उन बालकों का देखकर मोबाइल- प्रेम हर दिन
कुछ आधुनिकता का असर ,कुछ माता-पिता की अपनी व्यस्तता निस-दिन
व्यस्त भाग -दौड़ भरी ज़िंदगी ,एकल परिवार भी हैं शायद इसके जिम्मेदार
कुछ तो सोचना ही होगा परिवारों को और निकालना होगा ठोस उपाय जरूर
नानी -दादी ,माता -पिता जब खुद व्यस्त हैं अपने मोबाइल के साथ दिन और रात
लोरियाँ-कहानियाँ सब हो गयी गुजरे जमाने की दास्तां ,अब मोबाइल का चाहिए बच्चों को साथ
नौनिहालों को रोज़ देखती हूँ मोबाइल के लिए रोते -कलपते ,मानो हो वो उनका अलादीन का चिराग
खेल -कूद ,भाग -दौड़ और आपसी गुफ्तगू के बदले सन्नाटे ने घेरा है घर -परिवारों को आज
सब अपने -अपने खोल में बैठे हैं सिमटे बड़े -बूढ़े और आज के नौनिहाल और जवान
अपना धर्म -संस्कृति ,संस्कार और परम्पराएँ तो जानने का किसी को भी ना भान
उस जादुई डिब्बी में है सारी दुनिया की जानकारी यह ही बन गयी हमारी सबसे बड़ी दुश्वारी
वक़्त रहते ना चेते हम तो सबको अदा करनी होगी इसकी बहुत ही कीमत भारी
रोशी --


  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...