शनिवार, 5 नवंबर 2022

 औरत ना पहले आजाद थी ,ना अभी स्तर बदला है समाज में उसका

हैसियत अभी भी वही है जो सदियों पहले मापदंड था तय उसका
अखबार ,न्यूज़ -चैनल ,समाज सर्वत्र खबर औरत ही है
दहेज़ ,रेप ,भ्रूर्ण हत्या दरिंदगी सिर्फ नारी के साथ ही है
तलाक जैसी कुप्रथा सिर्फ उसके वास्ते है ,सदियौं से वो सहती आई है
कंधे से कंधा कितना ही मिला ले पर शोषंड का शिकार वही होती आई है
पहुँच गए हैं चाहें चाँद पर पर घर के चाँद को खुला आसमां नसीब नहीं है
खिड़की -दरवाजे सब बंद हैं ,अक्सर उनके वास्ते रोशनदान भी मयस्सर नहीं है
अब नारी अपने हक ,जिम्मेदारी बाखूबी जान गयी है ,पर जुबां उसकी सिल गई है
बदलाव तो हुआ पर बहुत मामूली ,निम्न स्तर पर उसका ओहदा आज भी वहीँ है
--रोशी
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सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

 विभीषण था भाई रावण का पर स्वभाव साधू सा पाया

दुर्योधन का साथ रहा सदेव पर कुटिलता मृत्यु तक ना त्याग पाया
जन्मजात गुण -अवगुण सदेव रहते साथ जीवन भर कोई ना बदल पाया
सर्प भले ही लिपटे रहें चंदन पर ,जहर उगलना ना त्याग पाया
प्रकृति प्रदत्त स्वभाव कदापि कोई लाख जतन कर ले ना बदल पाया
बचपन के कुचक्र ,अंतर्द्वंद चलते जीवन भर साथ ,कोई कम ना कर पाया
सत्संगति ,संस्कार ना बदल पाए कभी किसी की दुर्बुधि यह इतिहास ने बताया
अहम् ,इर्ष्या,द्वेष,लिखे होते हैं उसकी नियति में ,विधाता ने ऐसा उसको बनाया
प्रेम ,संस्कार ,विद्या कुछ भी ना ला सकते बदलाव ,यह ईश्वर ने है बताया
ह़ार गए कृष्ण ,विभीषण,सरीखे जैसे संत पर कुटिलता कोई ना तज पाया
--रोशी

बुधवार, 26 अक्टूबर 2022

 भाई -दूज का त्यौहार प्रतीक है पवित्र रिश्ते का बहन का भाई से ,

खिल उठता है भाई का मन ,देखकर जब बहन है आई ससुराल से
दोनों होते हैं सदेव जुड़े एक प्रेम की अद्रश्य ,अद्भुत डोरी से
कितने भी रहें दूर एक दूजे से त्यौहार ले आता करीब उनको प्रेम से
हमारे संस्कार ,परम्पराएं ,त्यौहार सब रिश्तों को रखते समेट के
टकटकी लगा देखते हैं दोनों राह परस्पर एक -दूजे की बहुत ही प्रेम से
खिचे चले आते हैं दोनों मिलने को सात समंदर पार से भी
मन रहता है बेचैन दोनों का परस्पर ना मिलने पर भी
--रोशी
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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

 रसोई से आती सुवासित पकवानों की खुशबू

दे जाती है आने वाले त्योहारों की दस्तक घर को
दीपावली का त्यौहार बिखेर देता है खुशियाँ हज़ार
घर लिपे -पुते हैं दिखते,अतिथि के स्वागत को हैं तैयार
बच्चे चेहकते ,घरों में फुदकते ,बिखराएं ख़ुशी अपार
रसोई ,सफाई ,पूजा की सामग्री , सजावट काम हैं अपार
व्यस्त है सब अपनी तरह मनाना है त्यौहार शानदार
कोई रूठे नहीं यह ही कोशिश करते हैं हर वर्ष बारम्बार
--रोशी



गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

 इतिहास गवाह है हम दिए जलाते हैं ,रोशनी करते हैं

राजा राम अयोध्या वापिस आये ,सीता जी के साथ
दीपावली का त्यौहार सदेव हम इसी ख़ुशी में मनाते हैं
कंही भी जिक्र नहीं है उर्मिला और लक्षमन की ख़ुशी का
उन दोनों का भी वनवास ख़त्म हुआ है आज १४ वर्ष का
उर्मिला ने अयोध्या में १४ वर्ष सिर्फ जागते हुए बिताये
वन में लक्ष्मण भी इतने वर्ष कहाँ एक पल भी थे सो पाए ?
तपस्विनी की भांति जीवन था गुजारा उर्मिला ने,तिल-तिल वो रोज़ जली थी
एकटक देखती थी वो उस राह को जो अचानक काँटों से भर गयी थी
इसी राह से गए उसको अकेले ,सुने महल में छोड़ पति भाई-भाभी के साथ वन को
पर इतिहास खामोश रहा सदेव उनकी व्यथा ,गहन पीड़ा ,तकलीफ बताने को
ना बाल्मीकि ने झाँका उनके जीवन में ,जहाँ था गहन अंधकार ,उनके जीवन पर
ना तुलसीदास ने मानस में उनकी व्यथा थी कभी दर्शायी, कुछ उनपर लिख कर
उर्मिला,लक्ष्मण सरीखा उधारण ना है दूजा, है जिसने प्रेम की विधा है सिखाई
भात्र प्रेम ,सातवचनों को था दोनों ने शिद्दत से निभाया पर दुनिया ना जान पाई..
--रोशी

सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

 मात्र एक सप्ताह रह गया है दीपावली में

दिए ,झालरें ,खील -खिलौने दिखने लगे हैं बाज़ारों में
नए वस्त्र ,जूते-चप्पल ,खिलौने लगे हैं सब खरीदने में
हर इन्सान लगा है भागमभाग में ,अफरातफरी में
स्त्रियाँ व्यस्त हैं रसोई में ,बनाने में सुवासित पकवान
घर में फ़ैल रही है बेहतरीन खुशबू ,बच्चे व्यस्त हैं खाने में
घर ,ड्योडी लगे हैं सबकी सफाई में ,धूल-मिटटी ,व्यस्त हैं हटाने में
देवी लक्ष्मी लौट ना जाये घर से व्यस्त हैं सब अपने निवास को चमकाने में
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--रोशी

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

 रूबरू हुए एक नवविवाहिता से ,मांग में सिंदूर ,हाथों मे मेहंदी ,पाँव में था आलता

उस लड़की का चल रहा है तलाक का मुकदमा अदालत में हमको था यह पता
अक्सर जाती थी बकील के पास , थाना जाती थी करने अगली तारीख का पता
पति ने बेघर किया उसको ,इश्क़ फरमाया अन्य विवाहिता से उसको था यह पता
विधवा माँ के साथ एक वर्ष से थी रह रही जहां खाने ,कपड़े का था ना पता
मुश्किल है जिसका घनघोर जीवन ,हमको था यह बहुत अच्छे से पता
उस लड़की ने कल पूरा दिन करवाचौथ का रखा था निर्जला व्रत पूरी श्रद्धा के साथ
शाम को बिधि -विधान से खोला व्रत ,पूरे अपने साजो शृंगार के साथ
ससुराल अय्याश पति के पास नहीं जाना निश्चय कर डाला था केस पति के साथ
एक सवाल जेहन में आ रहा है बारम्बार व्रत ,साजोशृंगार क्या था सब दिखावा ?
बेबकूफी ,मजबूरी ,संस्कार ,या था एक आडंबर जो हमने कल था आँखों से देखा
--रोशी
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इसका जवाब छोड़ते हैं आप सब पर अपनी राय जरूर दें

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