दंश चुभाती शीत लहर ,हाड कंपाती ठंडक

दंश चुभाती शीत लहर ,हाड कंपाती ठंडक

आधुनिकता का जमा पहनाकर टीवी पर नित क्या परोसा जा रहा है
जिन्दगी में बहुत कुछ है हमेशा सीखने -सिखाने को
शादियों का माहौल ,करता है नव -उर्जा का संचार
आँखों पर चश्मा ,झुके कंधे ,सर के सफ़ेद बाल
गरीबी से बड़ा कोई अभिशाप नहीं ,सहस्त्रों कुचल जाते हैं इसके तले
दीन-इमान,मान-प्रतिष्ठा सब रौंद दिए जाते हैं नित -प्रतिदिन इसके तले
मान-सम्मान चकनाचूर हो जाता चढ़ भर में ,होता हैं सर्वनाश
इसकी छाया भी कर जाती सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मिनटों में नाश
अक्ल ,होशियारी सब रह जाती धरी की धरी ,जब होता इसका साथ
चड़ते सूरज को दुनिया जल चडाती,कोई ना देता अस्त होते का साथ
निखरने लगते हैं गुण ,काबिलियत सदेव जब पैसा आता है आपके हाथ
लाख टके की दवा,सलाह दे दे कोई फकीर ,मिला दी जाती है तुरंत खाक में
घटिया ,बेतुकी राय भी लगती बड़ी दमदार गर दी हो किसी रईस ने समाज में
--रोशी
करना चाहते हैं कुछ हो कुछ जाता है

माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...