शनिवार, 17 दिसंबर 2022

 दंश चुभाती शीत लहर ,हाड कंपाती ठंडक

गरीब ,बेघर इंसान पे क़यामत है बरपाती बेधड़क
फूस के छप्पर को चीरकर जब अन्दर है आती शीतल बयार
नाम मात्र की कथरी में छुपा बैठा होता है गरीब का पूरा परिवार
कैसे कटती है रात सोचना भी है बहुत दुश्वार रजाई में दुबके इंसानों को
ईश्वर बस रहम कर इन बेघरों पर अब क़यामत ना बरपा ,ना तडपा इनको
मत ले इनके सब्र का पैमाना ,वैसे ही होते हैं यह बेचारे कुदरत से तडपाये
पेट की भूख इतनी तकलीफ नहीं देती जितने डंक चुभाती है शीतल हवाएं
बड़ा ही कष्टप्रद होता पूस का महीना बेघर ,गरीब बिन वस्त्रों के इंसानों के वास्ते
इंसान के साथ लावारिस जानवरों पर भी है टूटता कहर ,, शब्द ना हैं इसके वास्ते
--रोशी
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

 आधुनिकता का जमा पहनाकर टीवी पर नित क्या परोसा जा रहा है

चरमराती परिवारिक व्यवस्था ,बहकती युवा पीड़ी का बदहाल चित्रण रोज़ दिखाया जा रहा है
किस दिशा में जा रहा है हमारा समाज और ,कितना पतन होना बाकी है समझाया जा रहा है
सौतेले मां -बाप ,सौतेले बच्चे किस तरह से जी रही है आधुनिक पीड़ी, सब को बताया जा रहा है
खोखले रिश्तों में आधुनिकता का रंग चड़ाकर पेश प्रतिदिन किया जा रहा है
आपसी समन्वय ,संस्कारों की धज्जियाँ उड़ा दी गई हैं ,नित प्रतिदिन उनका दोहन किया जा रहा है
पद-प्रतिष्ठा ,धन -दौलत का अँधा-धुंद प्रदर्शन इस व्यवस्था में आग में घी सरीखा काम कर रहा है
बेहूदा कहानियां पेश कर समाज को क्या सन्देश देना है ,,मकसद नहीं समझ आ रहा है
सेंसर जैसी व्यवस्था लागू कर ,इन सीरिअलों पर कुछ विराम लगाना अब जरूरी होता जा रहा है
कुछ अरसे बाद ऐसा ना हो कि टीवी खोलना भी भयंकर त्रासदी का सबब हमारे लिए बनता नज़र आ रहा है
--रोशी

सोमवार, 12 दिसंबर 2022

 जिन्दगी में बहुत कुछ है हमेशा सीखने -सिखाने को

ऊम्र का तकाज़ा सिर्फ भ्रम है ,जिन्दगी में बहुत कुछ है करने को
बस अपनी उम्मीदों ,हौसलों को जिन्दा रखिये ,रास्ता खुद-बा-खुद बन जायेगा
बढती ऊम्र के साथ मिलता है तजुर्बों का साथ ,रास्ता खुद आसां हो जायेगा
हर वक़्त अपनी बढती ऊम्र ,व्यस्तता का रोना रोते हैं ,जो है सरासर गलत
एक बढता कदम हमारा भर देता है रोशनी जीवन में ,कर देता है सबको चकित
देखा है करीब से जिन्होंने बदल डाला है जीने का नजरिया ,, 50 बरस के बाद
बिंदास ,खुशगवार जीवन जी रहें हैं निरंतर जीने के ढंग में बदलाव के बाद
अक्सर जीवन निकल जाता है बस घर-गृहस्थी के झंझटों में व्यस्त रहने के बाद
खुद के शौक तो पूरे करें साथ ही औरों के वास्ते प्रेरणा बनें 50 की ऊम्र क बाद
दुनिया कितनी तेजी से बड रही निरंतर ,खुद को पीछे रखने का क्या मकसद
जो ना कर सके अब तक ,उस ख्वाब को बना लो फ़ौरन अपने जीने का मकसद
--रोशी

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

 शादियों का माहौल ,करता है नव -उर्जा का संचार

किसी उत्सव से कम ना होता है ,लगता है कोई त्यौहार
मेहमानों की गहमा -गहमी ,,नौजवानों का जोश बड़ा देता है रक्तसंचार
बेहतरीन ,सुस्वाद व्यंजन सुवासित कर देते हैं सारी फ़िज़ा को हर बार
सिल्क की साड़ियो,उम्दा सूटों में सजे घराती-बाराती बना देते माहौल रंगीन
परफ्यूम की खुशबू,फूलों की महक बिखरा देती है फिजां में उम्दा किस्म की महक
रिश्तेदारों से अरसे बाद होती मुलाकात भर देती जीवन में उत्साह ,भरपूर चहक
ठहरी जिन्दगी ,अनमने रिश्ते आ जाते हैं करीब ,अजब सी आ जाती है ताजगी
ढर्रे पर फिर चल पड़ती है सबकी जिन्दगी दिल आ जाते हैं सभी के करीब
येही तो ख़ूबसूरती है हमारी परम्पराओं ,रीत-रिवाजों की सबको खींच लाते करीब
--रोशी
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शनिवार, 3 दिसंबर 2022

 आँखों पर चश्मा ,झुके कंधे ,सर के सफ़ेद बाल

आज के युवा की बदलती तस्वीर बयां करती उसका हाल
क्या हाल हुआ है हमारी युवा पीड़ी ,होते जा रहें सभी बेहाल
नौनिहालों को दीखता लगा हुआ चश्मा ,किताबों के बोझ तले कुचलता बचपन
तनाव ,दिमाग पर बोझ ,क्या खुल कर जी सकेंगे जिन्दगी के सुनहरे दिन
प्रतिस्पर्धाओं ने लील लिया है सम्पूर्ण बचपन,जीते-जी बन गए मशीन
ना भोजन ,ना खेल कूद सुबह से रात्रि तक बस दौड़ता दीखता है मासूम बचपन
जवानी रोटी,नौकरी के मकडजाल में ऐसी उलझी है,कंधे तो झुकना ही है हर दिन
कंप्यूटर ने चढ़वा दिया आँखों पर चश्मा ,बच्चों के उलझाया उनको हर दिन
बढता जिम का शौक लील रहा युवाओं को जवानी में ही ,अति हो गयी है हर दिन
विभिन्न जीने के अंदाज ,अपने शौक कोई ना रहे जिन्दगी जीने के पुराने नियम
संयमित जीवन,सात्विक आहार,व्यायाम लुप्त हो रहे,बन रहें जीने के नए नियम
--रोशी
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बुधवार, 30 नवंबर 2022

 गरीबी से बड़ा कोई अभिशाप नहीं ,सहस्त्रों कुचल जाते हैं इसके तले

दीन-इमान,मान-प्रतिष्ठा सब रौंद दिए जाते हैं नित -प्रतिदिन इसके तले 

मान-सम्मान चकनाचूर हो जाता चढ़ भर में ,होता हैं सर्वनाश 

इसकी छाया भी कर जाती सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मिनटों में नाश 

अक्ल ,होशियारी सब रह जाती धरी की धरी ,जब होता इसका साथ 

चड़ते सूरज को दुनिया जल चडाती,कोई ना देता अस्त होते का साथ 

निखरने लगते हैं गुण ,काबिलियत सदेव जब पैसा आता है आपके हाथ

लाख टके की दवा,सलाह दे दे कोई फकीर ,मिला दी जाती है तुरंत खाक में 

घटिया ,बेतुकी राय भी लगती बड़ी दमदार गर दी हो किसी रईस ने समाज में 

                                                                                                 --रोशी


रविवार, 27 नवंबर 2022

 करना चाहते हैं कुछ हो कुछ जाता है

बोलना चाहते हैं कुछ और मुख से निकल कुछ जाता है
वक़्त का तकाज़ा है या ऊम्र का हमको है ना पता
याददाश्त भी छोड़ देती है अक्सर साथ ,यादें धुंधला गयी हैं
पूछा दोस्तों से सभी एक ही राह के रही हैं ,समस्या हरेक के साथ है
सब किसी ना किसी समस्या के मकडजाल में हैं उलझे
कोई बीमारी ,घर -परिवार ,बच्चों या व्यापार में हैं उलझे
एक ऊम्र पर आकर सबकी गपशप ,बातों का होता एक ही आधार
मिलने लगती हैं समस्याएं ,गुफ्तगू ,ख़ुशी या गम होता एक ही आधार
कितनी समानता आ जाती है जिन्दगी में दोस्तों की एक ऊम्र तक आते -आते
इतनी आसानी से दूंढ लेते है मिनटों में हल दोस्त एक दूजे से बातों-बातों में
-- रोशी

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...