रविवार, 9 अक्टूबर 2011

नववर्ष


यूँ तो नववर्ष मनाते आये हैं हम हर बार,
हर साल , नया परिवेश और नए रूप धारण करते हैं हर बार,
खूब धूम धड़ाका, आतिश बाजी, कॉकटेल, पार्टियाँ करते हैं हर साल ,
नए सपने खूबसूरत ख्वाब, नयी खुशियों से लवरेज रहती ज़िन्दगी हर बार,
क्यों न मनाये नव वर्ष एक नव नूतन रूप में इस बार ,
अभी तक तो थी उलझी थी रही ज़िन्दगी सिर्फ मै , परिवार , बच्चे और  घर में ,
कभी भी न सोचा देश, समाज और प्रकृति  के बारे में,
अब जागो, तनिक सोचो जिस देश समाज से हो तुम जाते जाने,
उसकी कभी भी न की महसूस, ज़रा भी जिमेदारी हमने,
तनिक न सोचा अवला, दीन, दुखी और अनाथों के बारे में
"जब जागो तभी सवेरा " देर अभी भी न हुई है जागने में ,
आज ही ले लो कोई प्रण, कसम, इस नव वर्ष पर अभी से
एक भी निस्वार्थ कसम , दया हर लेगी  सारा चिंतन ज़िन्दगी से ,
नव उर्जा, प्रफुल्लित मन भर देगा घर- आँगन खुशियों से
                                                  रोशी अग्रवाल 




6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दया का भाव वृहद संतुष्टि देता है।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

जागरण का गीत.... बढ़िया...
सादर...

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…
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Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…
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Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

shaandar prastuti,,sadar badhayee aaur amantran ke sath

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

shaandar prastuti,,sadar badhayee aaur amantran ke sath

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