शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

माए से उपजा मायका

                                    लाडली 
माई यानि माँ से ही उपजा शब्द मायका
माँ ही चिडया कि मानिद समेट लेती है अपने बच्चे
अपने लाडलों के साथ ही जीती और मरती है
बेटियों में बसती है उसकी जान , जीती है उनमें अपना आधा -अधूरा बचपन
स्वेटर की तरह ही तो रोज बुनती और उधेरती है नित नए सपने
व्याह दी जाएँ जब उसकी बेटियां तो सिर्फ आवाज़ से समझ जाती है
अपनी शहजादियों का दावानल ,उनकी पीड़ा और अब बदल जाते उसके स्वप्न
अब दूंदने में लग जाती माँ एक अदद अलादीन का चिराग
मिलते ही जिन्न से मांगे वो सिर्फ और सिर्फ अपनी लाडली का सुखमय जीवन
तभी तो माँ से ही होता मायेका और माँ से ही जीवन 

शनिवार, 4 जुलाई 2015

दिल


दिल जैसी बड़ी अजीब शै है खुदा ने खूब बनाई
जिस्म ,रूह सभी पर है इसका बखूबी कब्ज़ा भाई
यह खुश तो सभी अंगों पर रहती है बाहर खूब छाई
दुखी दिल तो सारी कायनात के सुकूं भी निराधार हैं भाई
आँखों को भी यह कमबख्त वही है दिखता जो खुद देखना चाहें है भाई 
तन के घावों का उपचार तो हकीम -वैध कर देवे
पर दिल की चोटों का नहीं है धरा पर कोई इलाज है भाई
बड़ी कीमती ,बेमिसाल सौगात बक्शी है ईश्वर ने हमको
इस दिल की मुकम्मल देखभाल करो मेरे भाई

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

जख्म माँ के ..



गहरी निद्रा के आगोश में सोये मासूम नौनिहालों को डांट-डपटकर
झटपट माँ ने किया होगा तैयार ,लंच -बॉक्स को वक्त पर खाने की नसीहतें
भी दी होंगी हज़ार ,मुस्कराता वो चेहरा ,बाय-बाय करती वो गूँज आज करती
दिल की किरचें हज़ार ,वो लख्तेजिगर जो गया था अभी विद्यालय जाने को बाहर
उन आततायियों का कलेजा ना पसीजा एक बार भी उन मासूम फूलों को देख
खिलने से पहले ही रौंद डाला उन जल्लादों ने ,इंसानियत को किया शर्मसार
क्या गुजरी होगी उस माँ पर जो खाने की थाली संजोये तक रही थी राह अपने लाडले की
पर ना आया वो मासूम आई थी उसकी छत -बिचत देह जो काफी थी चीरने को कलेजा बाप का ,क्यूंकि अब ना था वो मासूम अपनी जिद्देँ पूरी करवाने को अपने बाप से
रीता कर दिया था घर आँगन उन जेहादियों ने कितने ही घर परिवारों का
एक पल ना सोचा कि मारा तो उन्होंने दोनों तरफ माओं को
एक तरफ मरी बेमौत उन मासूमों की माएं ताउम्र

और दूसरी तरफ उन जेहादियौं की अपनी माएं क्यूंकि इंतज़ार तो वो भी
कर रही थी अपने बच्चों का ,जना तो उन्होंने अपनी कोख से सिर्फ बच्चा ही था
ज़माने ने उनको बनाया था जेहादी ,किया था जिन्होंने कोख को शर्मसार
एक तरफ थे मारनेवाले बच्चे और एक तरफ मरने वाले बच्चे
जख्म तो खाए दोनों तरफ सिर्फ और सिर्फ माँ ने ,सिर्फ माँ ने

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

परिवर्तन

बिदाई की बेला में जानकी को दीं थीं ढेरों नसीहतें माँ और तात ने
वास्ता दिया था निभाने को दोनों कुल की मर्यादा और पति का साथ
निभाया भी था जानकी ने ,कर गईं वनगमन बिना वाद्प्रतिवाद के
युवराज को तनिक भी एहसास ना हुआ उस नव्व्याही वधु के सपनों ,अरमानों का
माँ के वचनों की शायद ज्यादा एहमियत लगी थी सुकुमार को
पर उन वचनों का क्या ?जो वेदी पर लिए थे अग्नि को साक्षी मानकर
वन में ना बचा पाए  कुंवर निज सुता का अस्तित्व
बाँध गए मात्र एक सूक्ष्म सी लक्ष्मणरेखा के दायरे में
क्या -क्या ना वरपा उस मासूम पर उस दारुण वन में
कैसे की होगी अपने सतीत्व की रक्षा ,उन अमानुषों में
कल्पना मात्र से ही सिहर उठता है तन और मन
क्या किस्मत लिखवा कर लायी थी जनकसुता
अभी देखने थे और दारुण दुःख उस सुकुमारी को
निभाए जा रही थी जो मैथिली और अयोध्या की परम्पराओं को
तनिक भी हठ ना किया और निभाती रहीं पत्नीधर्म
यूं ही किसी के कहने मात्र से कर दी गयी वो बेघर
ना जाने से होता उनके पति की मर्यादा का हनन ,निशब्द त्याग दिया घर -आँगन
उस प्रसूता को घर से निकाल निभाई कौन सी मर्यादा यह ना जान सके हम
पर अब सीता ने भी जीना सीख लिया है ,उस लक्ष्मण -रेखा को लांघना भी लिया है सीख
अपनी सफाई में कहने को हैं आज उसके पास कुछ सबूत ,बरसों झेला है उसने वनवास
बेबजह झेली है रुसवाई उसने क्यूंकर ओढ़े रहे मायूसी का दामन
और क्योँ दे वो निरपराध अग्निपरीक्षा या समा जाये वेवजह धरती में
मु श्किलों ने कर दिया है अब उसका हौसला बुलंद ,.......
जमीं और आसमां दोनों  हैं अब उसकी मुट्ठी में ,ना कि उसमें समां जाने को ..........

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

आधुनिकता का कहर

इस ज़माने में कई चीज़े हैं जो मिलनी नामुमकिन सी हो गयी हैं .......
पार्टीस में हाय- हेल्लो करने वालों की दुनिया में भरमार मिलेगी
पर आपके दुःख को समझने वाली दोस्तों की कमी मिलेगी
माता -पिता तो आपको समाज में ढेरों मिलेंगे
पर बच्चों के साथ वक्त गुजारनेवाले शायद दो चार मिलेंगे
हर इंसा की जिंदगी में मसरूफियत इतनी बड गयी है
कि सच्चे रिश्तेदार भी दो चार मिलेंगे
घर -व्यापार के लिए कर्मचारी तो सैंकडो मिलेंगे
पर काम को अपना समझने वाल्व ना मिलेंगे
दुःख -दर्द बांटने को सारा समाज इकठा होगा
पर दर्द समजने वाले एक दो भी ना होंगे
अस्पताल में फोन तो मिजाजपुर्सी वास्ते ढेरों आएंगे
पर वहां रहने वाले हरगिज़ ना मिलेंगे
दुःख तकलीफ में राय देने वाले ढेरों हमदर्द मिलेंगे
पर सही मशवरा देने वाले दूंदे ना मिलेंगे
सच कहूँ तो आस -पास बच्चे तो ढेरों मिलेंगे
पर माँ -बाप के लिए फ़र्ज़ पूरा करने वाले दो चार ही मिलेंगे ...........




छुट्टी वाले दिन अचानक दो- चार दिन पहले जी टीवी का जिंदगी चैनल देखा ,बहुतअच्छे लगे उसके प्रोग्राम .....अब जिसको भी बता रहे हैं सभी कह रहे हैं हम भी देख रहे हैं लगता है हम सभी सोनी ,कलर्स ,स्टार आदि सभी चैनलों के फूहड़ ,भद्दे प्रोग्राम्स से ऊब चुके हैं ..लिपा-पुता चेहरा ,भारी लहंगे ,साडी ,ढेरसे विलेन,बनावटीपन आखिर हमारे चैनल वाले कुब तक हम सबको बेबकूफ बनाते संयुक्त परिवारों की धज्जी जिस तरह यह उड़ाते हैं वो नाकाबिले वर्दाश्त होता जा रहा है .......एक हफ्ते में ही जिंदगी चैनल के हमको ढेरों प्रशंसक मिल गए ...जागो चैनल वालों जागो

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014


महाभारत सीरियल देखकर उधृत कुछ भाव.
काश महाराजा ने वृद्धावस्था में अपने पाडिग्रहण की .अपेक्षा
पुत्र भीष्म का .पाडिग्रहण संस्कार किया होता तब शायद कुरुवंश की बुनियाद सुद्रण होती
पितृ- प्रेम से लबरेज भीष्म ने को अपनेकाश आजीवन अविवाहित जीवन का संकल्प ना किया होता तो विमाता ने इतना अनर्थ ना कुरुवंश पर अपनाया होता ...
युधिष्टर को बचपन से ही इतना निरंकुश ना बनाया होता
काश उसके विवाह की बुनियाद धोखे की नीव पर कुरुवंश ने ना रखी होती
तो गांधारी के भ्राता को इतनी कुटिल चालों का दामन ना थामना पड़ता
बहिन के उज्जवल  भविष्य की कामना हर भ्राता का होता है सपना
काश गांधारी ने पति -प्रेम में नेत्रों पर ना बंधी होती पट्टी ....
और देख पाती अपने नौनिहालों को ,दे पाती उनको उच्च संस्कार
दुशासन ,दुर्योधन जैसे वीर पुत्रों के बल ,विद्या का कर पाती सदुपयोग
कुरु -वंश का परचम समस्त धरा पर फैराने में ,ना की यूं जमीदोज होने में
काश कुंती ने विवाहोपरांत पति को कर्ण  के जीवन का सत्य बताया होता
तो बेचारा अबोध बालक इतनी भर्त्स्याना,विष का गरल जीवन भर ना पीता
पग -पग पर मिली सामाजिक प्रतारणा उस निश्पापी को दुर्योधन जैसे पापी
का दोस्त बनने को कदापि ना प्रेरित करता ,ना ही कुटिल शकुनी के हाथो कठपुतली बनता
कदापि द्रुपद कन्या ने स्वयंवर में सूत-पुत्र कह कर्ण का भरी सभा में उपहास ना उड़ायाहोता
 काश कुंती ने पुत्रों की विवाहोपरांत वधु आगमन पर सारी बात  ध्यान से सुनी होती
तो कुंती ने अपना समस्त वैवाहिक जीवन यूं पांच पतियौं  के बीच ना गुजारा होता
दुर्योधन को अन्ध्पुत्र कह उसका अपमान कर पांचाली ने किया जो बड़बोलेपन का अनर्थ
उन व्यंगोक्तियौं ने दी भरपूर हवा शकुनी ,और दुर्योधन की कुटिल चालों को
काश शकुनी ने वक्त रहते सोचा होता अपने घर परिवार के वास्ते एक घडी भी
ना बने होते इतने निरंकुश उसके भगिनी -पुत्र  ,ना भगनी होती यूं निरवंशी
गर भीष्म पितामह ,द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य ,सबने वक्त रहते युधिस्टर ,दुर्योधन को
यूं निरंकुशता पूर्ण शासन ,और आदेश ना माने होते तो शायद महाभारत युद्ध ताल जाता
पर होनी तो हो के रहती है और सार यह है की अति सर्वथा वर्ज्येते .........

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...