शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

 रूबरू हुए एक नवविवाहिता से ,मांग में सिंदूर ,हाथों मे मेहंदी ,पाँव में था आलता

उस लड़की का चल रहा है तलाक का मुकदमा अदालत में हमको था यह पता
अक्सर जाती थी बकील के पास , थाना जाती थी करने अगली तारीख का पता
पति ने बेघर किया उसको ,इश्क़ फरमाया अन्य विवाहिता से उसको था यह पता
विधवा माँ के साथ एक वर्ष से थी रह रही जहां खाने ,कपड़े का था ना पता
मुश्किल है जिसका घनघोर जीवन ,हमको था यह बहुत अच्छे से पता
उस लड़की ने कल पूरा दिन करवाचौथ का रखा था निर्जला व्रत पूरी श्रद्धा के साथ
शाम को बिधि -विधान से खोला व्रत ,पूरे अपने साजो शृंगार के साथ
ससुराल अय्याश पति के पास नहीं जाना निश्चय कर डाला था केस पति के साथ
एक सवाल जेहन में आ रहा है बारम्बार व्रत ,साजोशृंगार क्या था सब दिखावा ?
बेबकूफी ,मजबूरी ,संस्कार ,या था एक आडंबर जो हमने कल था आँखों से देखा
--रोशी
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इसका जवाब छोड़ते हैं आप सब पर अपनी राय जरूर दें

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रविवार, 9 अक्टूबर 2022

 सुनो इन्द्र देवता अब आपातकाल स्थिति आन पड़ी है भारी

रोक लो अब मेघों का कहर ,बिपदा आन पड़ी है अत्यंत भारी
गाँव ,देहात में छाया विकट कहर ,खेत ,खलिहान सब जलमग्न
घर -छप्पर गिर रहे टूटकर ,मजबूर हुए सब गरीब इंसान
खाने के पड़ गए लाले ,बह गया गृहस्थी का सब सामान
बीमारियो ने है पाँव पसारे ,हर जन है हैरान -परेशान
तकलीफ में है हमारा अन्नदाता ,जीवन उसका हुआ गमगीन
गुजर जाएगा है तकलीफ देह वक़्त पर छोड़ जाएगा गहरे जख्म
जीवन में जब आ जाती है अचानक आपदा ,समझा जाती जीने का मर्म
--रोशी

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

 मौसम की अतिवृष्टि ने त्योहारों का मज़ा फीका कर दिया था जिसका पूरे वर्ष शिद्दत से इंतज़ार

किसान जो अपनी गन्ने ,धान की फसल और कमाई का कर रहा था इंतज़ार
सारे ख्वाब हूए चकनाचूर उसके ,खाने को दाना नहीं ,जेब में पैसा नहीं सब बह गया पानी में
कुम्हार जिसने महीनो जतन से बनाए थे दीपक ,खिलौने सब के सब घुल गए पानी में
सारा परिश्रम गया व्यर्थ ,बच्चों के सुनहले सपने सभी बह गए इस बेमौसमी बरसात में
जब हमारे अन्नदाता ,मजदूर बर्ग बेहाल तो बताओ कैसे मनेगा दीवाली का त्योहार ?
पटाखे ,झालरें ,दीपक बनाने वालों पर टूटा है बारिश का कहर ,खुशी से ना मनेगा सबका त्योहार
श्रमिक वर्ग बैठा घर पर खाली ,पानी ने मचा दी चहुं ओर तबाही वो खाली हुआ बेरोजगार
बाज़ार हूए खाली ,छाई है बे-रौनकी हर ओर बस दिखता है पानी ही पानी चहुं ओर
यही करते है अर्ज़ रब से कि रोक दो अति व्रष्टि , बरसाना बंद कर दो अब पानी
जरूरत है ना अब इसकी, त्रस्त हुए जन- मानस बस रोक लो अब बरसाना पानी
--रोशी
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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

 बाज़ारों के रौनक दे रही संकेत दीपावली के आगमन का

हर तरफ है अफरा -तफरी फैली सफाई घर -दुकान सजाने का
व्यस्त है हर कोई खुद को बेहतर दिखाने में ,खुद को सजाने में
महिलाएं हैं मशरूफ़ खुद को निखारने में ,पुरुष हुए मस्त जुएखाने में
हो गए हैं शुरू दावतों के दौर ,व्यस्त हुये सब खाने और पीने -पिलाने में
लगा रहे हैसियत से बड़कर ताश की बाज़ी ,तनिक भी ना है ध्यान परिवार में
त्योहार की खुमारी छाई सब पर ,व्यस्त हैं सभी अपने -अपने तरीकों में
तरीके हैं मनाने के अलग -अलग पर सराबोर हैं सभी खुशियों के रंग में
--रोशी
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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2022

 राम और कृष्ण ईश्वरीय अवतार थे ,संसार में अधर्म का नाश था जरूरी

विश्व को बड़ते पाप पर संयम ,धर्म ,सदाचार का पाठ पड़ाना था जरूरी
क्या राम को ना पता था माता सीता का ठिकाना? ,पर वन में पूछना था जरूरी
कृष्ण कंस का वध करने में थे पूर्ण सक्षम ,पर सही वक़्त की प्रतीक्षा करना था उनको जरूरी
14 वर्ष का वनवास ,सीता का हरण ,वन में ढेरों कष्ट ,जगत को बोध कराना था जरूरी
महाभारत को रोकने में सक्षम थे पूड़तया माधव पर, गीता का ज्ञान विश्व को देना था बहुत जरूरी
सही वक़्त पर सही फैसला बदल देता है जीवन की दिशा ,गर की होती जल्दबाज़ी राम और कृष्ण ने निज जीवन में
वंचित रह जाती दुनिया राम चरित मानस और गीता के ज्ञान से ,ना होते कोई आदर्श हमारे पास जीवन में
--रोशी

रविवार, 2 अक्टूबर 2022

 गरबे का खुमार और संगीत का बुखार छाया हुआ है फिजा में

स्त्रियाँ लहंगा -चोली में ,पुरुष हैं दिखते पारंपरिक परिधानों में
डांडिया का है शोर विभिन्न वस्त्रों के प्रदर्शन पर है पूरा ज़ोर
अपनी डांस प्रतिभा को आजमाने का है मचा जबर्दस्त शोर
अपनी -अपनी श्रेस्ठ्ता,प्रतिभा को लगे है सब प्रदर्शित करने में
सास -बहू भी ना रहती पीछे एक दूजे को डांडिया में नीचा दिखाने में
गरबा तो बनता जा रहा है एक राष्ट्रीय पर्व सम्पूर्ण राष्ट्र में चहुं ओर
इंतज़ार रहता सांझ का ,बस गूँजता पंडाल ढ़ोल -नगाड़े से हर ओर
होता था पहले सिर्फ गुजरात में गरबा अब जड़ें फ़ैल गईं हैं इसकी सर्वत्र
युवा पीड़ी थिरके इसके मधुर संगीत पर ,बच्चे ,बूड़े सभी नाचें हो के मदमस्त
--रोशी
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शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

 ज़िंदगी का हर गुजरता लम्हा ,वापस नहीं आता उसका आनंद उठाओ

जैसे जीना चाहो खुल के जियो ,जितनी साँसे है उनका पूरा लुफ्त उठाओ
मन का खाओ-पीयो,जो दिल चाहे पहनो ,खुद के लिए भी जीना सीख जाओ
देश -विदेश की सैर करो ,बड्ते कदमों को ना रोको ,सारा जग घूम डालो
ज़िंदगी और सेहत मिली है बेशकीमती जी भरकर उसका लुफ्त उठा डालो
हर गुजरता लम्हा है नए दौर में मुश्किल खुद का जीवन आसान बना लो
परिवार के साथ गुफ्तगू ,दोस्तों से जी भर दिल्लगी आज ही कर डालो
जो ठाना हो करने का आज से ही मकसद को अंजाम तक पहुंचा डालो
दिल ,दिमाग जो कहे करने को नेक विचार पर अमल आज ही कर डालो
जीवन की घड़ियाँ रेत की मानिद फिसल रहीं हर घड़ी जो जी चाहे कर डालो
ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा ,कथन को दिल ,दिमाग में बैठा डालो ,बैठा डालो
--रोशी
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  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...