रविवार, 20 फ़रवरी 2022

 नारी की सुबह होती ही है हँसते -मुस्कराते चाहे सारी रात गुजरी हो करहाते

शक -शुबहा भी ना होने देती हाले -दिल का ,उसमे सब समेत जाती है
महिलाएं तो प्रातः कल से ही अपने मन माफिक हाव -भाव बदलती हैं
शायद यह उनकी मजबूरी ,आदत है ईश्वर प्रदत्त गुण को खूब भुनाती हैं
कभी बच्चों की खातिर ,कभी घर-परिवार के वास्ते नारी मुस्कराती है
मन में हो गहन विषाद ,तड़प पर मजाल है किसी को भनक ना लगने देती है
यह कला बस खुदा ने नारी को ही बक्शी है ,इसमें उसको ईश्वर ने पारंगत बनाया है
अपनी पीड़ा भीतर समेटना ,उपर से ज़ोर -ज़ोर से हसना अद्भुत है यह कलाकारी
बेजोड़ कला पायी है नारी ने मन में हो उसके चाहे कितनी भी दुश्वारि
रोशी --

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

 पुरानी यादों का बक्सा तो सबके पास होगा

सभी ने उसको अब तक सहेज कर रख छोड़ा होगा
गाहे -बगाहे उसमें रखे यादों के पन्ने तो जरूर सरसराये होंगे
कुछ पुरानी यादों ने अलबत्ता आँखों के कोर जरूर भिगोये होंगे
कुछ सखियों के साथ की चुहल-बाज़ियाँ ने मन को बरसों पीछे खींचा होगा
कभी छोटे से टुकड़े पर की कढ़ाई जो आज भी बक्से में नीचे अहतियात से सँजो रखी होगी
कितनी बेशकीमती यादें उस बक्से में आज तक रख छोड़ी हैं ,शायद ज़िंदगी भर
कभी न कभी हम एक छोटी सी दुनिया में ,पूरे जहां की खुशियाँ समेट लेते हैं उम्र भर
अखबार की कतरनें ,लतीफों का खजाना ,कुछ पुरानी तस्वीरें बस फालतू सी चीज़ें कब बन जाती हैं जान से भी ज्यादा प्यारी समेटते रहे जो बचपन भर
कभी -कभी खोल कर हवा लगा देते हैं उन बेमतलब चीजों को समेट कर
हिम्मत बटोरते हैं फैकने की उनको ,पर हाथ बेसाख्ता रुक जाते हैं हर बार
रोशी-

सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

 सिर्फ एक दिन प्रेम -दिवस के लिए क्यौ ?

प्रेम का एहसास बाकी 364 दिन भी क्यौ नहीं ?
पत्नी ,प्रेमिका तक ही क्यों सीमित रखे इस जज्बे को
माँ ,बेटी -बहन ,अनगिनत रूप हें हमारे आस -पास इसके
बस दिल से ,नज़र से देखने की देर है हमको ,उन तक पाहुचाने की इसको
देर किस बात की है ,क्यौ ना आज से ही शुरुआत कर दे इसकी
और प्रेम रंग से सरोबार कर दें काया अपने प्रिए की
बड़ा ही गहरा रंग होता है प्रेम का ,जो भिगोता है दोनों को
देने वाला भी भीग जाता है प्रेमरस में ,पाने वाला भी मदमस्त हो जाता है
रोशी--

सोमवार, 31 जनवरी 2022

 चंद्र ,सूर्य सम गृह चाहे कोशिश कर लें जितना

राहू ,केतू भी अपना स्थान परिवर्तन कर लें कितना
पर दीन -हीन की दशा ना बदल सकाहै कभी भी विधना
शायद ये गृह दशा ,सितारे भी अपना प्रभाव दिखाते हैं उतना
जब ईश्वर की मार से लाचार मानुष भी भूल बैठता है जीने का सपना
दारिद्र्य ,रोग ,विपन्नता जैसे गृह आ बैठते हैं कुंडली में समझ कर उसकी घर अपना
पीढ़ी -दर पीढ़ी चलती रह जाती ज़िंदगी बिना बदले निज स्वरूप अपना
वेद ,पुराण क्या उनकी कुंडली का कोई उपाए ना बूझ सके अंगुल जितना
कोई टोटका ,कर्म -कांड ,कभी ना फल दे सका बदल ना सका दुर्बल का जीने का सपना
समस्त राशि- फल उपाए ,,सदियो से बस बदलते रहे हैं सबल के संग स्वरूप अपना
रोशी --
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 जगविदित है की गम हो तो बाँट लो ,कम हो जाता है

हम मानते हैं खुशी भी बाँट लो दुगनी हो जाती है
फर्क सिर्फ इतना है कि अपना दिल किधर खोलते हैं
हमारे जज़्बात किसके दिल को छूते हैं ,तड़पाते हैं
वक़्त , मौका दोनों का सही होना भी बहुत जरूरी है
पर -पीड़ा ,दूजे का सुख दोनों को जज़्ब करना मुश्किल होता है
सही फैसला करना ,अक्सर दोस्तों बड़ा ही टेड़ी खीर होता है
तो दोस्तों सुख -दुख का पिटारा सदेव देख कर ही खोलो
वरना हो जाओ तैयार और उसका दंश ज़िंदगी भर झेलो
रोशी --
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 प्रचड़ शीत लहर का हुआ है भीषण प्रकोप

शायद इसी कारण शब्द ,विचार सब शून्य
ना कोई एहसास ,ना कोई शब्दों का पास
सोचते बस गुजरता है दिन कैसे कटता होगा दिन -रात
बिन कथरी ,बिन बिछावन कुछ ना होगा जिनके पास
ईश्वर का वरद हस्त ही होता है जिनके साथ
प्रकर्तिक प्रकोप भी ना डिगा पाता जिनके जीवन की जिजीविषा
देखना है तो देखो कण -कण में है बिखरा पड़ा ईश्वर का वास

रविवार, 23 जनवरी 2022

 रुई के फाये सी मुलायम और भोर की ओस सी निर्मल होती हैं बेटियाँ

घर –चौबारे की धड़कन ,बाप की पगड़ी की शान होती है बेटियाँ
ईश्वर प्रदत्त अनगढ़ मिट्टी का बेमोल प्रसाद होती है बेटियाँ
जिस साँचे में ढालो झट से आकार ले लेती हैं बेटियाँ
कभी इमली सी खट्टी कभी मिश्री की डली होती हैं बेटियाँ
अनकही बातों का पिटारा ,चुट्कलों और गप्पों की खान होती हैं बेटियाँ
माँ की पीड़ा ,दिल का दर्द पड़ने में माहिर होती हैं बेटियाँ
धान के बिरवे सी किस्मत पाकर सदेव जन्मती हैं यह बेटियाँ
पीहर में अपना बचपन गुजार अंजान राहों पर निकल पड़ती हैं बेटियाँ
माएके का मान और अपनी ससुराल की शान होती हैं बेटियाँ
चंद लम्हे पीहर में गुजार वर्षों की खुशियाँ गठरी में सँजो ले जाती हैं बेटियाँ
मेरा गौरव और मेरा सम्मान दोनों ही है मेरी बेटियाँ
रोशी --

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...