सुबह से मन है व्याकुल और परेशां
कहाँ गम हो गया दिल और दिमाग ना थी कोई पेरशानी ना था कोई व्यवधान
मन ही था निरंतर विचलित तीव्र गतिमान
सुबह से कौन था किधर ना ही था ध्यान
शायद यह था मौसम और प्रकृति का तापमान
किया था जिसने हमको निरंतर परेशान
घर-भीतर बाहर अन्दर था मन चलायमान
बढती गर्मी उमस वातावारण का था निरंतर व्यवधान
निरंतर सूर्यदेव उगल रहे थे आग और शोले
ना ही था इसका किसी के भी पास कोई समाधान
इश्वेर ही अब दे सकता हैशीतल तापमान
पशु पक्षी नर नारी सभी व्याकुल हैं चलायमान
हे प्रभु कर दो दया, भर दो सागर नदी और आसमान
बरसा दो नेह अमृत धरा पर मेघ बरसें घम घमासान .............
2 टिप्पणियां:
ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.
बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.
SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
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