तिल-तिल कर कैसे जिया जाता है जानती है बो सब बाखूबी
जिया जो हूँ उसने सूनी आंखों से ताकते विस्तृत आकाश को
खोजा है उससे कोई अपना पर गुजर गईं साडी रात दिखा ना कोई उसको ,
रात्रि का गहन अंधकार था फ़ैला चहुँ ओर और ना था कोई चाँद अपनी ,
प्रियतमा के साथ मधुर अठखेलिया करता हुआ
तारे भी जैसे लील गया था रात्रि का गहन अंधेरा
ठीक वैसे ही लग रहा था उसको अपना जीवन ना कोई खुशियों का सवेरा,
ना था भोर का उजाला ************************************
पर हां ऐसे भी जिया जा सकता है जानती है बो बाखूबी
ऋतु बदली ,माह बदला पर ना बदला उसका जीवन
सब कहते है दिन बुहरते हैसबके पर यह अंधकार बन गया उसका जीवन.....




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