इनर -व्हील क्लब में मात्र -दिवस पर प्रस्तुत कुछ उद्गार

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माँ शब्द है छोटा सा पर सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड है इसमें समाया
नर -नारी ,देवजन कोई भी ना इसके मर्म कोहाई जान पाया
माँ का स्पर्श भर देता है भरपूर अनूठा जज्बा हम सब में
जब होता हाथ में माँ का आंचल,तो लगती है दुनिया मुट्ठी में
माँ की अंगुली पकड़कर सीखा चलना और लांघ लिए पर्वत सारे
ना महसूस हुआ कदापि गिरने का डरक्यौंकी माँ थी सदेव साथ हमारे
कोई भी विपदा ना लगती थी बड़ी क्यौंकी माँ तो थी सदेव पीछे खड़ी
जब से छूटा माँ का साथ हमसे लगता है मानो जग में हूँ में अकेली खड़ी
चेहरा और आँखों से ही बालक की खुशी और गम जान जाती है सदेव माँ
दिल- दिमाग बदस्तूर बालक का बयां कर सकतीहै सिर्फ माँ
गर माँ है तो ईंट -गारे की चहरदीवारी,आँगन ,चौबारा एहसास दिलाता है घर का
बरना तो ज़िंदगी कटती है बालक की जैसे पेड़ हो बाग में खड़ा बिना जड़ का
हर उम्र में होती है जरूरत सबको माँ के बजूद की ,उसके लाड़ -प्यार की
क्यौंकी एक वही तो है जो वयस्क बालक को सदेव समझती है नौनिहाल आज भी
रोशी ----

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