शनिवार, 4 जनवरी 2025


नकली हंसी ,झूठा मुखौटा,ऊपरी दिखावा 
यह सब ना देखा था ना सीखा था कभी हमने
पर क्या करे इस दुनिया की रबायत को 
जहाँ उसकी इज्ज़त होती है सबसे ज्यादा
जो इंसा जितना ज्यादा झूठा मक्कार और फरेवी 
मीठी बातें,चाटुकारी,में भी है जो जितना ज्यादा माहिर 
कुछ वक्त के लिए ही सही पर समाज में बढती ही है प्रतिष्ठा उसकी 
पर कलई भी जब उतरती है तो समाज भी दिखाता जाता है
रास्ता उसको .....
बहकाबे

केकई कैसे फंसी मंथरा के मकड़ जाल में और विसरा दिया 
समान्त पुत्र प्रेम 
एक पल में ही धाराशाही हो गया वो स्नेह और संतान प्रेम 
बचा ना था आज कोई प्रीत के धागों का कतरा 
 मान भी राम से ले रही थी वो सारी पिछली ममता नेह का हिसाब भी
हाँ ! यही तो पढ़ा था बालपन से किताबों में हमने 
सोचते रहे ताउम्र कि कैसे भूला देता है वो अपने 
पल भर में ही निर्मोही ,निष्ठुर वक्त का झंझावत
ही बना देता है
अब दुनिया परखी और समझ आया कि हाँ सब 
कुछ हो सकता है कभी भी
टूट जाते है पलमान में नेह के अटूट और अनूठे बंधन 
बहकाबे की व्यार पल में उड़ा सकती है बरसों का बंधन 




     
              तिल तिल जीना                
तिल तिल कर कैसे जीया जाता है जानती है वो सब वाखूवी ..............................................................
जिया जो है उसने सूनी आंखो से तकते,विस्तृत आकाश को , ढूंढा  है उसमे कोई अपना?
पर गुजर गई सारी रात तकते आसमान को 
रात्रि का गहन था अंधकार 
फैला  था जो चहु ओर 
नजर आया ना कोई चाँद ,करता अठखेलिया प्रियतमा के साथ उस ओर 
तारे भी जैसे लील गया था रात्रि का गहन अंधकार ठीक वैसे ही लग रहा था उसको अपना जीवन संसार ना कही था कोई खुशियों  का सवेरा ना थी भोर की कोई उजास पर हाँ अंधरे में भी जिया जा सकता है जानती है वो 
बाखूवी निशिदिन 
ऋतु बदली,माह बदला पर ना बदला उसका अपना जीवन 
सब कहते है दिन बहुरते है सबके पर यह अंधकार ही बन गया है अब उसका जीवन .....     
इन्सान 

उनका ना कोई ईमान है ना धर्म है 
ना तो वो हिन्द है ना ही वो पूरा मुसलमान है 
ना ही है वो इंसान,बो तो पूरा का पूरा हैवान है 
दया ममता इंसनियत उसने इसका मर्म ना जाना 
दरिन्दगी हेवनियत के साथ उसका स्वभाव है वहीशियाना 
अरे कभी तो उस आतंकी ने झाँका होता दिल के अन्दर 
तो ना होता वो इतना दरिंदा और रहता इन्सान ,इन्सान और सिर्फ इन्सान 




बस दिल से उन गरीबों का ना जाता ख्याल ,इस शीत ने ना जाने किया होगा उनका हाल जिनका ना कोई रैन-बसेरा ,उन गरीबों को कुदरत ने है मारा हाड़ गलाती है शीत बयार ,गर्म रजाई और स्वेटर भी ना हैं गर्माते बार -बार उन बदनसीबों का आता है ख्याल ,रूह भी जिनकी होती है बेज़ार पशु ,पक्षी ,इंसान सब पर है शीत ऋतु का कहर बरपाया ,खून भी है शरीर में शीत ने जमायाकुदरत के आगे है सदेव इंसा हुआ मजबूर ,झेलता आया है बरसों से उसका कहर उसकी मर्ज़ी के आगे ना किसी की है चलती जिस हाल में रखे यह है उस रब की मर्ज़ी




    शनिवार, 3 अगस्त 2024

                                      दिनचर्या 
    सुबह उठकर ना जल्दी स्नान
    ना ही पूजा,व्यायाम और ना ही ध्यान 
    सुबह से मन है व्याकुल और परेशान 
    ना थी कोई परेशानी,ना था कोई व्यव्धान 
    मन था निरंतर ,विचलित तीव्र गतिमान 
    सुबह से था कौन किधर ,क्या कर रहा ,ना था ध्यान ...........
    शायद यह था मौसम और प्रक्रति का तापमान 
    किया था जिसने हमको निरंतर परेशान
    घर ,भीतर ,बाहर ,अंदर था मन चलायमान 
    बढ़ती गर्मी ,उमस वातावरण का था शायद व्यव्धान .........................
    निरंतर आग उगलते शोले था ना कोई नहीं समाधान 
    ईश्वर ही दे सकता है अब शीतलता का तापमान 
    पशु-पक्षी ,नर-नारी सभी व्याकुल चलायमान 
    हे!प्रभु कर दो दया भर दो सागर नदी और आसमान 
    बरसा दो नेह ,अमृत ,धरा पर घम घमासान |       

    सप्तरंग

     होली लाई फिजाओ में सप्तरंग है और बागो में भी कोयल है चहकाई ,कही बालको की टोली मारती है पिचकारी और कही भांग है घुत्वाई
    रंग ,गुलाल इन की खुशबु ने की है अद्भुत छटा बिखराई 
    सभी सखियों गयी राधा और सखाऔ ने जैसे कान्हा रूप है आज पाई
    जीजा साली देवर भाभी सभी रिश्तो ने दी है होली की दुहाई 
    लाल पीले हरे नीले जैसे ढेरो रंगों में रंगकर हमने सबने खूब है होली मनाई 
    खूब है होली मनाई ......

      माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...