शनिवार, 4 जनवरी 2025






 माँ रेशमी साड़ी को तरसती गुजर गई
सारी जिन्दगी और बचत बेटे पर खर्च करती रही
पिता उम्र से पहले ही बूड़े हो गए ,कंधे झुक गए
बच्चों की खातिर निवाले और छत की जुगत ही बैठाते रह गए
जवानी कष्टों ,तकलीफों में गुजार चेहरे पर एक शिकन तक ना महसूस होने दिया
बुडापे में बेटों ने जन्मदाता को परस्पर सहूलियत से दरकिनार कर दिया
श्राद्ध पर दिल खोलकर भोजन ,वस्त्र बांटकर समाज में परचम फैला दिया
भरपेट भोजन ,फल मिष्ठान को जो तरसे जिन्दगी भर उसको बंटवा दिया
बुजुर्गों की सेवा ,इज्ज़त जीतेजी कर लो ,आत्मा पर शदीद बोझ कम हो जाएगा
सिवाए यादों के बरना हमारे पास जन्मदाता की और कुछ ना रह जाएगा
--रोशी



छोटी छोटी खुशियाँ ही बहुत काफी होती है जीवन में भरने को रंग
जरुरी नहीं होता हम इंतज़ार में यूँ ही गुजार दें बड़ी खुशियों का संग
अद्भुत ताजगी से भर देते हैं जीवन के कुछ पल कुछ अपनों का संग
परिवार,दोस्त ,गैर ,जरिया कोई भी बन सकता है ख़ुशी का आपके संग
कब ?कौन सा लम्हा छू जाए दिल को ,भर दे सुकून के खुबसूरत रंग
दिल भी क्या चीज़ बनायीं रब ने ?लाखों को ठुकरा खुश हो जाता टके के संग
--रोशी

 






शरदकालीन नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं...
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देवताओं ने दानवों के संहार के लिए माँ की संरचना की
समस्त शक्तियां अपनी ,मां में समाहित कर संसार की रक्षा की
मां ने विभिन्न रूप धारण कर धरती को पापियों से मुक्त किया
अब देखो मां कलयुग में दानवों ने खुल कर है तांडव किया
नारी जाति का है पग -पग पर शोषण और अपमान किया
नित्यप्रति कितनी बेटियां अपनी अस्मिता खो बैठती हैं
बस बचा लो इज्ज़त इनकी खुद नारी होने पर यह लज्जित हैं
कोई कोना न रहा सुरक्षित इनके वास्ते वेश बदल सर्वत्र असुर बैठे हैं
बेटी को बचाना अब हुआ मुश्किल मां सभी चमत्कार की आस लगाये बैठे हैं
--रोशी 


विवाह के लायक


जब तक हुए विवाह के लायक तो भी रीती रिवाज़ ना बदले 
क्यूंकि तब सुना था माँ के मुहँ कि लड़की और हालात ना बदले 
वही दान वही दहेज़ माँ बाप को चाहिए और लड़के को रंग गोरा 
पहले ना था शिक्षा पर इतना शोर पर व्याह पर खर्च था पूरा जोर
लड़की को दिखाना,उसकी नमाइश सभी कुछ था जरा भी ना बदला 
पसंद आ गयी तो रिश्ता पक्का वरना खाया पिया और चले 
लड़की के दिल दिमाग में जरा भी झांक कर ना देखा की उसपर क्या गुजरी 
बेचारी,कितनी तकलीफ,मानसिक यातना से वह है गुजरी पर लड़के,उसके संबंधी माता पिता उनका इससे क्या वास्ता  लड़का तो ऊँचे दाम पर बिक ही जायेगा,आज नही तो कल 
हालात आज  भी वही है बिल्कुल भी ना बदले 
बाप को चाहिए रूपया ,बेटे को रंग गोरा और पढ़ी लिखी लड़की
नुमाइश पहले भी होती थी आज भी होती है और होती ही रहेगी 
बेचारी लड़की आज भी वही है उसी लीक पर चल रही है 
उस मासूम के लिए क्यों नही दर्द उपजा?क्यों? क्या कभी उपजेगा ?
शायद नही कभी नही क्यूंकि वो तो यही यातना कवट झेलने के लिए जन्मी है इस संसार में
और यह समाज ना बदला ना ही कभी बदलेगा 


जंजीर

हर वक्त चाहा जंजीर को तोड़ना 
पर जंजीर थी शरीर के इर्द गिर्द 
हमारे सपने,हमारी खुशियाँ सब थी इनमे सिमटी 
बस में ना था इनसे बाहर निकलना 
जब भी जोर लगा कर चाहा तोडना 
तब और भी मजबूती से देखा उनको लिपटे हुए 
कोई कैसा ,चाह कर भी इनको कैसे तोड़े 
ना समझ पाई अब तक,रहे उत्तर अबूझे 
कभी परिवार कभी समाज कभी मेरे अपने समझाते बहलाते ,
डराते रहे ना करना तोड़ने की जरूरत 
हम भी यूँ ही बहकावे,झांसे में शिददत से उनकी आते रहे 
पर जिसने भी तोडा,कालजयी बना और समाज को हिलाया .............
होली के  RANG


होली आई फिजाओ में मस्ती और बूढ़े-बालक ,नर नारी युवातन मन सभी पर है मस्ती छाई 
कही चढ़ा है भंग का रंग तो कही बिखरा है अबीर गुलाल कही छाई है अपनों से मिलने की खुमारी तो
कही उनसे ना मिलने का रंज रंग गुलाल ,गुझिया और कही है मन में अजीब सी उमंग....

नकली हंसी ,झूठा मुखौटा,ऊपरी दिखावा 
यह सब ना देखा था ना सीखा था कभी हमने
पर क्या करे इस दुनिया की रबायत को 
जहाँ उसकी इज्ज़त होती है सबसे ज्यादा
जो इंसा जितना ज्यादा झूठा मक्कार और फरेवी 
मीठी बातें,चाटुकारी,में भी है जो जितना ज्यादा माहिर 
कुछ वक्त के लिए ही सही पर समाज में बढती ही है प्रतिष्ठा उसकी 
पर कलई भी जब उतरती है तो समाज भी दिखाता जाता है
रास्ता उसको .....

  माँ के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए,दुनिया को दिखाने के लिए सिर्फ एक दिन गर्भ में बच्चे के पोषण- विकास से लेकर इन्सान बनाने में अनगिन...