गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

प्यारी बिटिया

सावन की बद्री में
झूलो की बद्री में
तुम याद बहुत आओगी
                    बारिश की फुहारों में
                     तृप्त करती  बौछरो में
                     तुम याद बहुत आओगी
मेहंदी के बूंदों में
रंग बिरंगे सूटों में
तुम याद बहुत आओगी
                    रंग बिरंगी चुनर में
                    लहंगे की घुमर में        
                    याद बहुत आओगी
मेघो की घन घन में
पायल की छन छन में
तुम याद बहुत आओगी
                            चमकती बिंदिया से
                             छनकति पायलिया में
                            तुम याद बहुत आओगी
                                              

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

बरसता सावन

टिप -टिप गिरती बूंदों की आवाज़
कर रही थी यूँ रात्रि की निस्तब्धता भंग
दूर कही कोई छेड़ रहा हो जलतरंग 
झींगुरों की सरसराहट भी बना देती है अद्भुत समां 
कोई है मदमस्त सावन की रूमानियत में 
किसी का होश है हुआ इस सावन में गुमां 
नन्हे बालक ले रहे पूरा आनंद उस घुमड़ते सावन का 
अब कहाँ रहे वो भीगते प्रेमी युगल इस मद मस्त सावन में
हो गयी हैं अब यह किताबी बातें सिर्फ इस जहाँ में 
बदल लिया है अब शायद प्रकृति ने भी अपना स्वरुप 
ना वो रहे काले घुमड़ते ,लरजते ,बरसते मेघ 
न रहा वो सावन में भीगने ,लुत्फ़ उठाने का आनंद  

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

झूट और फरेब


कितने झूठ ,कितने फरेब  कोई कब तक कर सकता है ?
शायद उम्र भर ......और अब उसको भी लगने लगा है 
की शायद वो है ही गुनाहगार  इन सब हालातों की वो है 
मुजरिम ,या शायद वक़्त खेल रहा है कोई खेल उसके साथ 
पर जब कोई बात बार -बार दोहराइ जाती है लगातार 
तब पत्थर पर भी पड़ जाती है दरार ,.........
स्याह को सफ़ेद और सफ़ेद को स्याह तो दिखा ही देती है यह दुनिया 
जब राम को दिखाया दुनिया ने आइना सीता के दुश्चरित्र का 
तो वो भी ना देख पाए सीता के सतीत्व को ,उसके प्रताप को 
 कब तक ? आखिर कब तक चलता रहेगा यह अत्याचार ?????????

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

आज़ादी

आज़ादी के इतने बरस गए बीत और हुए क्या हम सच में आज़ाद
यह ना सोचा तनिक भी और ना ही हुए हम परेशां 
क्यूंकि जन्मते ही हम जकड़े रहे ताउम्र भाँति -भाँति की जंजीरों में 
और उन बेड़ियों का बंधन तो हमको लगने लगा अपना 
ना मुह से निकलती कोई आह ,,,ना लगता कोई बंधन 
भ्रष्टाचार ,आतंक ,हैवानियत ,जुल्म सहना तो अब बन गयी है हमारी गिज़ा 
न कोई खिलाफत ना ही कोई आवाज़ सब कुछ दब गयी है इस आत्मा में
कब तक ?आखिर कब तक हम सहेंगे यह अत्याचार और देंगे सब कुछ यह विरासत में
वक़्त रहते अब क्यूँ नहीं आता कोई कृष्ण अपना सुदर्शन चक्र लेकर
सब ना सही लेकिन करता कुछ तो पापियौं का अंत इस समाज से
ना हम सोच रहे हैं उन नौनिहालों की जो कल गिरेंगे इस से भी ज्यादा गर्त में
पूछा आज स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कुछ बालको से बताने को कुछ शहीदों के नाम
बता ना सके वे 4 भी सेनानियौं के नाम सिर्फ एक गाँधी को छोड़कर किसी दूजे के भी
शर्म से झुख गया सर ,जुवां भी हो गयी स्थिर ना बता सका कोई बालक देश भक्ति -गान
बताने को सब तत्पर कटरीना कौन और कौन सलमान और शहरुख्खन
ना ही पता हमारा कौन सा है राष्ट्रीय खेल और कौन है रचयिता हमारे राष्ट्रीय गान का
अभी भी ना चेते तो हो जाएगी बहुत देर और तब ना भेद पायेगा कोई अभिमन्यु इस पाप का चक्रव्यूह
अब तो सुन लो पुकार दीना नाथ ,दीनबंधु और घुमा दो कोई जादू की छड़ी
कुछ ढीले हो अब हमारे बंधन और सीखें हम खुल के सांस लेना
नया परिवेश ,नयी स्वच्छ आत्मा ,नयी दुनिया बसा ले हम

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

सावन की मस्ती

कब आया सावन ,कब बीता सावन जरा भी ना हुआ इसका गुमां
कहीं भी ना दिखी नवयौवना बढाती झूले की पींगे ,गाती कजरी बनती अद्भुत समां 
बरसते ,लरजते कारे -कारे बदरा भी जैसे भुला ही बैठे मदमस्त आसमां 
दीखे ना कोई प्रेमी युगल बतियाते ,भीगते इस मधुर सावन में 
सब कुछ हो गयी बिसरी बातें ,सावन रह गया कवियौं की कल्पना में 
हरियाला सावन था सिमट गया बस कुछ पन्नो में और रह गया था अतीत की कथाओं में 
अब न सुनाई पड़ती कजरी ,ना सावन के गीत ,ना सुनती पपीहे की आर्तनाद 
क्यूंकि अब हमने ना बचाए पेड़ -पौधे ,ना बाग़, ना बची वो हरितमा 
बना दिया है कंक्रीट का जंगल चहुँ ओर  व्यथित और परेशा नर -नारी  
ना दिखते छप -छप करते बालक ना सावन का आनंद लेते नर -नारी 

बुधवार, 25 जुलाई 2012

आइना

कितने झूठ ,कितने फरेब  कोई कब तक कर सकता है ?
शायद उम्र भर ......और अब उसको भी लगने लगा है 
की शायद वो है ही गुनेह्गर इन सब हालातों की वो है 
मुजरिम ,या शायद वक़्त खेल रहा है कोई खेल उसके साथ 
पर जब कोई बात बार -बार दोहराइ जाती है लगातार 
तब पत्थर पर भी पड़ जाती है दरार ,.........
स्याह को सफ़ेद और सफ़ेद को स्याह तो दिखा ही देती है यह दुनिया 
जब राम को दिखाया दुनिया ने आइना सीता के दुश्चरित का 
तो वो भी ना देख पाए सीता के सतीत्व को ,उसके प्रताप को 
कुब तक ? आखिर कब तक चलता रहेगा यह अत्याचार ?????????

























































































सोमवार, 23 जुलाई 2012

मेरे जिगर के टुकड़े





बच्चे कितनी जल्दी बड़े हो जाते हैं यह आज समझ आया
जब हमारे बच्चे ने हमको नेतिकता का पाठ पड़ाया 
वो सारी बातें जो हम थे रहे सिखाते उसको जिन्दगी भर 
एक पल में ही उसने उनको अमल में लाकर कर दिखाया 
फख्र है हमको तुम परअब जाकर महसूस हुआ बच्चों  
हमने यूँ ही नहीं अपना जीवन व्यर्थ है गंवाया 
  

  हम स्वतंत्रता दिवस पूरे जोशो खरोश से मना रहे हैं बेशक हम अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो गए हैं धर्म ,जाति की जंजीरों में हम बुरी तरह जक...