सोमवार, 9 जुलाई 2012

बदलती वयार

बिसरा दिया है मेघों ने भी सावन में बरसना
सावन के झूले भी अमुआ की डार पर ना दिखते हैं अब 
बच्चियो की मस्ती ,मेहँदी के पत्तों पर आपसी खटपट 
सब हो गयी हैं शायद गुजरे ज़माने की बातें  अब 
ना कानों में पड़ती है किसी भी गलियारे से चूडियो की खनखनाहट 
वो मेहँदी से रची हथेलियाँ अब ना दिखती हैं गावं ,कस्बो में 
शायद बढता स्कुल ,आफिस का दबाब दबा रहा है पुरानी परम्पराएं 
सुहागिनों का नैहर भी छूट रहा है त्यौहार पर जाने से 
परंपरा अनुसार तीज पर बाबुल घर लाये और भाई राखी बंधवा कर ससुराल पहुचाये 
 बदल गए हैं सब मायने वक़्त ,सहूलियत के अनुसार त्यौहार मनाने के 
अब कौनसा नया परिवेश बदल देगा सारे के सारे ख़ुशियों के पैमाने 

रविवार, 8 जुलाई 2012

वैदेही की व्यथा

आज दिव्या शुक्ल जी का लेख देखा उसी लेख पर वैदेही के लिए कुछ भाव .............
 वैदेही का तो हर युग मैं जनम ही हुआ है नारी जीवन का संताप भोगने वास्ते 
कभी जन्मी वो जनकसुता बनकर और पाए घोर कष्ट भार्या राम की बनकर 
जन्मी थी वो राजकुल में और व्याही भी गयी रघुकुल में सहचरी वो राम की बनकर 
पांचाली भी जन्मी थी राजकुल में और पाया था अर्जुन सा राजकुमार स्वयंवर में उसने 
पर वह री किस्मत ? विधि की लेखनी ने उल्टा दिया सारा का सारा किस्मत का लेखा -जोखा 
व्याही एक पति को ,और भोग्या बनी पांच पतियौं कीकुदरत का खेल निराला 
कितने ही किस्से ,कहानी भरी पड़ी है इतिहास में हमारे हर युग की वैदेही की 
रूप अनेकों पर वैदेही तो हर युग ,काल में रही है सिर्फ भोग्या ,शापित और अबला 
जब ,जैसे,जिस भी रूप में पाया है दारूण कस्ट उसने सदेव वैदेही रूप  में जनम्कर 

शनिवार, 7 जुलाई 2012

जिन्दगी की अजब कहानी




किस्मत से बढकर कुछ नहीं है मिलता देख लिया है जिन्दगी की आपा -धापी में
सब कुछ था अजमाया हमने बस समझ ये ही आया इस जिन्दगी की दौड़ा -भागी में 
सारी अक्ल ,सारी होशयारी बस रह जाती है धरी की धरी इस जिंदगानी में 
बड़े से बड़े बन्दों को देखा है मिलते खाक और मिटटी में इसी जिन्दगी में 
जो  लिखा कर आये है तकदीर अपनी वो ही पाते हैं सब सुख जिन्दगी में 
अक्सर देखा है बहुत से कर्मयोगी कर्म करते है पूरा इस जिंदगी में 
पर कुछ भी ना कर पाते हैं हासिल सारी की सारी जिंदगी में 
इस को भाग्य का लिखा कहा जाये या कहें किस्मत की बुलंदी 
बिना कुछ करे भी वो सब कुछ पा जाते हैं जिन्दगी में 
  

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

जीवन

जिन्दगी का पहिया इतनी तेज़ी से रहा था भाग
हम सोच रहे थे कि हमने तो इसको बाँध रखा है मुटठी में 
पर वो तो खिसक रहा था मुट्ठी में बंद रेत की मानिद 
कब हो गया हाथ खाली हमको पता ही न चला 
और समेट भी ना सके एक भी कण उस रेत का 
जो समय जाता है गुजर लाख चाहो तो भी न पा सकोगे ऊम्र भर 
क्योँ नहीं समझ पाया मानुस वक़्त रहते यह गणित
बस फिर बटोरता रहता है रेत के टुकडो को जीवन भर 

शनिवार, 30 जून 2012

सावन की फुहार



प्यासी धरती ,सूखे अधर ,व्याकुल तन -मन
कातर नैन किसान के है तकते आसमान 
मरणासन्न पपीहा नभ को तके आये न उसको चैन 
अतृप्त चक्षु मांगे इश्वर से बरसा दो जल दिन- रैन 
पपड़ाए अधर और बोझिल काया कहीं न पाए चैन 
धरा ,नर -नारी ,पशु -पक्षी सभी हैं आसन्न और बैचैन 
अब बरसा भी दो नेह अमृत सा और सबकी रूह पाएं चैन 

मंगलवार, 26 जून 2012

अनचाहे मेहमान

आजकल जिन्दगी में कुछ अनचाहे मेहमान आ बैठे हैं
ना कोई न्यौता ,ना कोई सन्देश बस आ बैठे हैं 
क्रोध ,जलन ,ईर्ष्या ,जैसे यह अनचाहे हैं मेहमान 
रोज इनको चाहते हैं जिन्दगी से अपनी भगाना 
पर यह पाहून हैं ऐसे ढीठ कि जिन्दगी में गए हैं रच -बस 
ना होती है इनकी कोई पूछ फिर भी ना जाना चाहते हैं 
रोज अपने अस्तित्व का एहसास भी हरदम कराते हैं 
कैसे इन मेहमानों को करू में विदा बताएं आप सब मुझको ?????????

गुरुवार, 24 मई 2012

भूले बिसरे दिन

बिसर गए वो दिन जब सब भाई बहिन होते थे इकट्ठा
सुबह से होता था जी भरकर उधम ,और हंसीठठठा
ना कोई था समर कैंमप ,ना था होम वर्क का टनटा 
दिन भर थी बस हंसी -ठिठोली और था बस मस्ती का फनडा 
कहाँ गए वो दिन ,वो खिलखिलाहटों से चहकते घर आँगन 
सब कुछ भुला दिया इस जीवन की आपाधापी ने दिन -प्रति दिन 
काश हम लौटा लौटा  पाते   न न्हे नौनिहालो का मासूम बचपन 
जहाँ घुमते वो निर्द्वंद ,लेते भरपूर छुट्टी का वो भरपूर आनंद 
बर्फ का गोला .चुस्की और कच्ची कैरी के चटकारे बड़ा देते जीवन का रंग
कभी जाते थे छत पर ,और सोते थे खुली हवा में लेकर मच्छर दानी  का आनंद 
पर अब तो हो गयी सब भूली -बिसरी बातें  और ना रहे वो आनंद 

  हम स्वतंत्रता दिवस पूरे जोशो खरोश से मना रहे हैं बेशक हम अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो गए हैं धर्म ,जाति की जंजीरों में हम बुरी तरह जक...