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बुधवार, 19 जनवरी 2011

सर्दी

सर्दी कि वो ठिठुरती रात नहीं भूलती
क्रश्काए शरीर, पड़ी झुर्रियों के साथ
जो चाहता था एक टुकड़ा कम्बल का और मुट्ठी भर धूप
हड्डियाँ जिसकी रही थी ठण्ड से चरमरा खूब
उग्र शीत वायु उड़ा कर ले जाना चाहती थी उसका अस्तित्व
पास ही क्लव में चल   रहा था नववर्ष का प्रोग्राम
जितनी भी महिलाएं थी सब थीं लगभग नि: वस्त्र
पतले झीने आबरणो में थी जो छुपा रहीं थी काया
प्रचंड ठंडी वायु उड़ा कर ले जाना चाहती थी उनका भी अस्तित्व
मन है हैरान, परेशान कि शीत ,ठंडी वायु का प्रकोप सहेगा कौन ?
काँपता ,निस्तेज परेशान वृद्ध  या वो आधुनिकाएँ
 वृद्ध चाहता था एक गज कम्बल, या थोड़ी सी गर्मी
उम्र भर भी जो न जुटा पाया था और हो गया मरणासन्न
युवतियां ,बालाएं भी सम्पूर्ण अपनी सुख सम्रद्धि के साथ
नहीं ढकना चाहती थी अपनी सुंदर काया
और सह रहीं थी ख़ुशी-ख़ुशी प्रकृति  का संताप  
जीत आखिर हुई उन युबतियों के  हौसले की
परास्त कर दिया था उन्होंने कुदरत के कहर को
पर वो बालाएं हंसती - खिलखिलाती मना रहीं थी न्यू- ईअर 
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