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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

Roshi: जिन्दगी का फलसफा

Roshi: जिन्दगी का फलसफा: सब कहते हैं की बीति बातें बिसार दो ,और आगे की सुध लो पर भूलना क्या होता है इतना आसा ? जिनको था दिल और दिमाग ने इतना चाहा एक ही झटके में ...

जिन्दगी का फलसफा


सब कहते हैं की बीति बातें बिसार दो ,और आगे की सुध लो
पर भूलना क्या होता है इतना आसा ?
जिनको था दिल और दिमाग ने इतना चाहा
एक ही झटके में टूटा पूरा का पूरा भरम का जाल
खुल गयी आंखें ,मिला जिन्दगी को सबक .और नए ख्याल
पर किससे  कहें ? क्या कहें ,बचा न था कुछ भी बाकी
स्वयंम सिर्फ स्वंयं पर ही करो भरोसा यह ही है जिन्दगी का फलसफा
माँ -बाप तो हमेशा ही रहे थे सुनाते जिन्दगी के खाए धोखे
पर हम मूर्ख समझते रहे की घुमा देंगे जादू की छड़ी
बना देंगे रिश्तों ,जिन्दगी सब को आसां
पर अब पता चला की हो ही गए थे हम फेल
हमारी किस्मत में न था समझ पाना इन रिश्तों का फलसफा
कई लोग तो बिना कुछ करे धरे भी पा जाते हैं सभी का प्यार
पर हम सब कुछ कर के भी ना पा सके मर्जी से जीने का अधिकार

मधुमास


शीत ऋतू,शीतल पवन मधुमास में भीगा तन मन
परस्पर उपजा घना विश्वास,तृप्त आत्मा और प्रमुदित हर्षित जीवन
गए थे दोनों हनीमून परविवाह के बाद नवयुगल
पर बदल ही गयी थी काया कुछ ही दिन में पाकर नव स्पंदन
प्यार का रंग भी होता है बड़ा अद्भुत और नवीन
एक दुसरे को स्वसमर्पण ,साथी को आत्मसात करना ही है प्यार
बदल्जता है इसी फलसफे से जीवन का हर रंग और ढंग

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

Roshi: माँ का आशीर्वाद

Roshi: माँ का आशीर्वाद: कब बच्चे हो जाते हैं बड़े और करने लगते हैं फैसले स्वयंपता भी न चलता है रह जाते हैं स्तब्ध हम .......... कभी उचित कभी अनुचित उठा जाते हैं वो...

माँ का आशीर्वाद

कब बच्चे हो जाते हैं बड़े और करने लगते हैं 
फैसले स्वयंपता भी न चलता है रह जाते हैं स्तब्ध हम ..........
कभी उचित कभी अनुचित उठा जाते हैं वो कदमपर हम फोरन भूल जाते हैं 
अपना गमयह ही तो होता है दिल और खून का रिश्ताजो मुआफ कर देता है 
अपने कोख जायों का हर सितममाँ तो माँ होती है औलाद

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

Roshi: भ्रम जाल

Roshi: भ्रम जाल: अवसाद गहन अवसाद में घिर गए थे हम अपनों ने ना दिया होता सहारा तो मर ही गए थे हम अपनों ने ही धकेला था हमें अवसाद की गहरी खाई मेंभ्रम...

भ्रम जाल


अवसाद गहन अवसाद में घिर गए थे हम
अपनों  ने      ना  दिया होता सहारा तो मर ही गए थे हम
अपनों ने ही धकेला था हमें अवसाद की गहरी खाई मेंभ्रम जाल
और अपनों ने ही निकाला,और नेक सलाह सुझाई
मानसिक संतुलन था गड़बड़ाया और था दिल घबराया
अँधेरा ही अँधेरा था और देता था न कुछ दिखाई
रिश्तों की गुत्थी उलझी इतनी की सिरा भी न आता पकडाई
 क्या करते जीना भी तो यही है ,मकडजाल में आत्मा भी घबरायी
हम खुद ही इसके जिम्मेदार हैं बात यह ही अब समझ आई
न करते हम अपने आसपास इतनी गंदगी इकठा करते रहते सफाई
सच्चे दोस्त,सगे ,सम्बन्धी और अपनों की इसी अवसाद ने पहचान कराई
अब न घिरेंगे इस भंवर में जीने की है कसम खाई
पर किनारे तक आते -आते पिछली सारी भूली बिसराई
फिर तेयारी कर ली थी हमने रिश्तों में उलजने की
दावानल में घिरने की ,अब फिर से है बारी आई
कोई न है विकल्प इस माया जल का बहु भांति है हम अजमाई

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

Roshi: नकली रिश्ते

Roshi: नकली रिश्ते: जिन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया हमको यक़ीनन ना रहे बहुत ज्ञानी ,ध्यानी और ना ही किया बहुत चिंतन पर धोखे ,विश्वासघात और खंजर क्या- क्या ना पाई ...

नकली रिश्ते


जिन्दगी ने बहुत कुछ सिखाया हमको यक़ीनन
ना रहे बहुत ज्ञानी ,ध्यानी और ना ही किया बहुत चिंतन
पर धोखे ,विश्वासघात और खंजर क्या- क्या ना पाई तडपन
पर अब जाकर समझ आई इन्सान की असली पहचान
जब कीड़े ,मकोड़े ना बदल सकते कुदरतन अपना स्वभाव
चोट पहुचना ,डंक मारना उनका इश्वर प्रदत्त स्वभाव
हम इन्सान होकर क्योँ भूल जाते है सबका विचित्र स्वभाव
सारी     जिन्दगी उसको स्वानुकूल बनाने में ही लगा देते हैं
और फिर हम होते हैं परेशां ,दुखी ,अवसादग्रस्त और वेचैन
क्योँ ना रहे दूर  और ना लाये होते  उसको दिल के करीब
विष वमन,कपट ,छल,द्वेष ,और जलन ये ही था उसका स्वभाव
 समझाया था दिल को वक़्त ने शायद बदला हो उसका व्यव्हार
पर व्यर्थ ,निरर्थक थी हमारी सोच जो ना देख सकी दिल के आर पार

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

दरकते रिश्ते


ये दुनिया के रिश्ते भी  bare    होते हैं अजीब
कभी रुलाते ,कभी हसाते ,होते हैं जो उनके करीब
पर लगता है कुदरत ने कुछ ज्यादा ही गम भर दिए उसके पास
क्यूँ ?आखिर क्यूँ ? जिसको भी चाहा इस कमबख्त दिल ने
पराया फ़ौरन कर दिया उन सभी उसके अपनों ने
आखिर क्यूँ नहीं ?हम समझ पाते दुनिया का फलसफा
यहाँ तो हर वक़्त चलता है जोड़ ,घटाने ,गुना और भाग का चक्कर
जब जैसे चाहा रिस्तो में भी अंक गरित का हिसाब लगाया
दिल ,रिश्ते ,सम्बन्ध सब कुछ तौल लिए तराजू पर
जो संस्कार ,प्यार ,मोहब्बत सिखाये थे माँ ने
उनकी तो अब कोई एहमियत ही न थी अब जिन्दगी में
पर अब यह तो सब पुरानी बेमानी बातें ,अब इनका न कुछ फायदा
पड़ने में ,किताबो में ,फिल्मो में ही रह गया है बस इनका अस्तित्व
मानवीयता तो दरक रही है ,यूँ कहें सिमट गयी है इस युग में

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

करवा चौथ

आया था करवा चौथ का त्यौहार 
काम बाली-बाई देख चौक गए थे उसका श्रंगार 
पिछले कई महीनो से मारपीट, चल रही थी उसके पति से लगातार 
चार दिन पहले ही थाना-कचहरी की हुई थी दरकार 
न आने का कारन पूछा तो बोली, जाना था कोतवाली रोज लगातार 
जुल्मी, शराबी को मैंने करवा दिया है बंद अब न आयेगा वो बाहर 
पर उस रोज सब भूल गई उसके जुल्म, सितम और अत्याचार 
पूरा स्साज श्रंगार, पीछे तक भरी मांग भरा पूरा था श्रंगार 
कितना मासूम और कोमल बनाया है विधाता ने नारी का दिल और दिमाग 
झट से भूल जाती हैं सभी अत्याचार और पति का हिंसक व्यव्हार 
यही तो है हमारी भारतीय परंपरा, मान्यता और हमारे अदभुत संस्कार... 
   

त्योंहरो का मौसम आया

त्योंहरो का मौसम, अदभुत भर देता है रोमांच http://i38.tinypic.com/21181vk.jpg
घर परिवार, वातावरण-सभी जगह होता है आनन्द ही आनन्द
उमंग गर्मी से मुक्ति, शरीर, मस्तिस्क सभी होता है प्रफुल्लित 
साफ़ सफाई, साज श्रंगार, नवीन वस्त्र और आभूषण सभी करते आनंदित 
शादी, लग्नो, उत्सवो की भी लग जाती है जैसे झड़ी  
जैसे सभी कर रहे थे इंतजार इस मौसम और आन्नद पर्व का 
बच्चो को भी मिलती छुट्टी, सबका घर आगमन कर रहा है आनन्दित 
दीपकों की अदभुत छठा, बिजली की लड़ी,पटाखों का शोर 
कर रहा है किसी को रोमांचित और बहुतो का दिल धड़का क्यूंकि है वो कमजोर 
दिवाली के बाद घर आंगन करता बेटिओं का इंतजार 
जो आती होंगी दूर देश से समेटें ह्रदय में भैयुं का प्यार 
माँ बाप भी तक रहें द्वार की कब आएगी लाडली पूर्ण होगा त्योंहार.... 

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

मेरे सभी ब्लॉग परिवार के मित्रो को दीपावली की ढेर सी शुभकामनाएं 

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार नाम का ज़हर तो है अंग अंग में समाया 
कब और कैसे यह भीतर समाया, कोई भी न समझ पाया 
जब हुआ नव शिशु का बीज कोख में पल्लवित साथ ही यह आया 
शिशु लड़का है या लड़की फ़ौरन ही घर में यह मसला गरमाया 
भ्रष्टाचारी डॉक्टर ने तत्काल नोटों की गद्दी थाम लिंग बताया 
गर बच गयी जान तो नवजात गर्भ से ही भ्रष्टाचार का तत्त्व लाया 
नामकरण के वक्त भी पंडित, नाई, सभी के जाल में खुद को फंसा पाया 
स्कूल जाने का जब मौका आया तो वहां भी भ्रस्टाचार का ही फन्दा फैला पाया 
ना जाने कितने दलाल, कितने डोनेशन के बाद ही  उसने ऐडमीशन पाया 
बचपन बीता, भ्रस्टाचार के दलदल में जो फंसा तो जीवन भर उबर न पाया 
बड़ा हुआ बालक तो कालेज, बिजनेस, जॉब भी इसी में लिप्त पाया 
कोख में ही था जब उसने सुनकर, समझकर था इसको अपना पाया 
नौकरी, बिजनेस सभी कुछ था इसकी नींव पर मजबूत उसने बनाया 
अपना फ्यूचर, तरक्की, शान शौकत भ्रस्टाचार  के साथ ही चमकाया 
यह तो जीवन का वोह है मजबूत हिस्सा जिससे न कोई बच पाया 
हमारे भीतर तक है नस - नस में इसका दावानल समाया 
परिवार में, समाज में, देश में सभी तरफ है इसने हाहाकार मचाया 
हम चाहें भी तो  समूल उखाड़ फेंकना इसको कोई भी न इसका मरम जान पाया 



--
Roshi Agarwal

प्रेम ,प्यार,मोहब्बत


प्रेम, प्यार, इश्क, मोहोब्बत पर क्या लिखें आज?
इस विषय पर तोह बरसों से लिखता आया है इतिहास 
हमारे ग्रन्थ, शास्त्र, गीत, कहानी और ढेरो उपन्यास
सब के सब हैं भरे पड़े इसी शब्द की महिमा से अपरम्पार 
पर क्या is प्रेम, प्यार, मोहोब्बत jaise शब्दों की व्याख्या kar पाया है कोई?
नहीं, कभी नहीं . सबने ज़्यादातर इसको परिभाषित किया, सिर्फ नर नारी के रिश्ते में. 
कभी न जाना असली मर्म, सच्चा अर्थ, इन सुन्दर शब्दों के पीछे.
प्रेम क्या सिर्फ नर नारी के बीच आपसी संबंधों का ही नाम है? 
प्रेम के तो अगणित  हैं रूप, रंग और अंदाज़.
 माँ बालक का प्यार, गुरु का शिष्य से स्नेह,
 भक्त का अपने आराध्य से प्रेम, सेवक का स्वामी से निश्छल प्रेम.
 प्रेम के नित नए रूप, नए रंग, नवीन विषय, नव प्रसंग. 
मीरा का कान्हा से प्रेम, राधा और कृष्ण का वाना रहित प्रेम, 
केवट का राम से प्रेम, सीता का पति प्रेम. भरत का भाई प्रेम. 
हमारे जीवन में हैं अद्भुत प्रेम. उन्नत, उत्कृष्ट रूपों में, 
जिनको है न कोई ग्रन्थ, इतिहास, काल, है समेट पाया अपने पन्नों में 

दीपावली


झिलमिल दीपकों की जगमगाहट, स्वर्णिम आभा से आलोकित,
कर रही है यह संपूर्ण धरा को प्रकाशित, बिखर गया है संपूर्ण उल्लास,
मन है सबके प्रफ्फुलित, नई फसल, धन-धान्य से है धरा पूर्ण, सभी के मन हैं आनंदित,
शीतल वयार का आगमन भी कर रहा है मन को स्पंदित, घर-आँगन में धरी रंगोली चौबारे भी भये सुवासित,
लक्ष्मी का आगमन भर देगा कोठे, तिजोरी और झोलियाँ, प्रमुदित मन हर्षित सब जन,
होगा अब त्यौहार पर होगा अपनों का आगमन ये ही सपना संजोये हर मन. 

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

नववर्ष


नववर्ष
यूँ तो नववर्ष मानते आये हैं हम हर बार,
हर साल नया शहर, नया परिवेश और नए रूप धारण करते हैं हर बार,
खूब धूम धड़ाका, आतिश बाजी, कॉकटेल, पार्टियाँ करते हैं हर साल ,
नए सपने नए ख्वाब, नयी खुशियों से लवरेज रहती ज़िन्दगी हर बार,
पर क्यों न मनाये नव वर्ष एक नव नूतन रूप में इस बार ,
अभी तक तो थी उलझी रही ज़िन्दगी सिर्फ में , मेरा परिवार , मेरे बच्चे और मेरे घर में ,
कभी भी न सोचा देश, समाज और नगर के बारे में,
अब जागो, तनिक सोचो जिस देश समाज से हो तुम जाते जाने और पहचाने,
उसकी कभी भी न की महसूस, ज़रा भी जिमेदारी हमने,
तनिक न सोचा अवला, दीन, दुखी और अनाथों के बारे में
"जब जागो तभी सवेरा " देर अभी भी न हुई है जागने में ,
आज ही ले लो कोई प्रण, कसम, इस नव वर्ष पर अभी से
एक भी दुखी पर की गयी दया हर लेगा सारा चिंतन ज़िन्दगी से ,
नव उर्जा, प्रफुल्लित मन भर देगा खुशियों से सारा घर आँगन




शनिवार, 24 सितंबर 2011

नव योवना

व्याह कर आई वो नव्योवना ,उतरी डोली से सजन के अंगना 
नए सपने ,नयी उम्मीदे ले कर उतरी वो पी के अंगना 
अपनी गुडिया ,सखी-सहेली ,ढेरो यादे छोड़ आयी बाबुल के अंगना 
माँ-बाप की दुआएं ,भाई -बहनों का प्यार आशीर्वाद और लाज का गहना 
बस ये ही दहेज़ था उसके दमन में और थी माँ की सीख 
सुख हो या दुःख,तुमको है उसी ससुराल में मिल कर रहना और सहना...........  

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

आतंकवाद की समस्या

अभी आज ही अखबार में छपा था, 
किया कुछ नासमझों ने धर्मग्रन्थ का अपमान 
क्यूँ नहीं करते हैं दुसरे मजहब का सम्मान 
क्यूँ दूसरे मजहब का नहीं करना चाहिए सम्मान 
हों वो चाहे हिन्दू, सिख, इसाई या मुस्लमान, 
खून उबलता है, निकाल लेते हैं फ़ौरन गैर कानूनी सामान 
क्यूँ नहीं ज़रा भी समझते की सभी धर्म हैं एक समान 
ईशवर तो एक ही है क्यूँ है बिखर गयी इसकी संतान 
सभी धर्म, हर मजहब, और पंथ बनाता तो यही है इन्सान 
क्यूँ न हम सिखाएं बच्चों को की करें वो हर धर्म का सम्मान 
गर चाहें हम तो दिखा दें विश्व को सर्व धर्म का सम्मान करता है हिंदुस्तान 
फिर क्यूँ करता है यह दंगे, तोड़ फोड़ , बर्बादी और घमासान ? 


जर्जर काया

अभी अभी गई किसी विधवा बूढी माँ की अर्थी 
जब तक जिंदा रही वो तड़पती रही सिसकती रही 
पति को जो जवानी में थी खो चुकी पर बेटे के सहारे जीती रही 
मरियल काया, सफ़ेद साड़ी, समाज के भेड़ियों के बीच जिंदा रही 
किस तरह से काटा होगा दिन और कितनी भयावह होगी उनकी रातें मैं सोचती रही 
पुत्र प्रेम में वो जीती रही, पुनः पुनः रोज़ मरती रही 
पुत्र भी न निकला कम पर अब पुत्रवधु के सपने संजोती रही
पुत्रवधु भी थी आधुनिक, उसके अपने पुत्र के साथ दम घोटती रही 
कितना दुःख विधाता ने लिखा था उसकी फूटी किस्मत में सहती रही 
पर आज हो गयी सब बंधनों से आज़ाद, आत्मा उनकी निर्वाण को प्राप्त हो गयी 

अपने पराये

सभी आये,सभी ने सराहा ,कुछ ने मन से कुछ ने बेमन से 
अब कुछ कुछ पहचानने लगे है ,चेहरे कौन अपने कौन पराये 
दिखाते है ख़ुशी ,ढकते हैं जलन पर दिख ही जाते हैं फफोले चेहरे पर 
क्यूंकि चेहरा और आँखें ही तो आइना हैं अंदरूनी 
यह कमबख्त कितना भी छुपाओ राज़ खोल ही देते हैं 
सोचो ज़रा उस भगवन का करो शुक्रिया अदा
कितनी खूबसूरती से फिट किया है लाइ डेटेक्टर 
इन्सां को भी न पता 

माखनचोर


ब्रज का दुलारा है ,सखियन का प्यारा है
यशोदा की अंखियन का तारा ,,वो है हमारा
वृषभान दुलारी का प्राण-प्रिय ,नन्द का दुलारा है
वृज का रखवारा दुष्टों का तारान्हारा है ,
किन नामो से उसको पुकारे ना जाने यह जी हमारा है?  
गोवर्धनधारी ,गिरधारी ,माखनचोर और कृष्ण मुरारी 
असंख्य नाम है उसके ,सहस्त्र्रूप्धारी 

सोमवार, 12 सितंबर 2011

आतंकवाद

बम का धमाका करना, आतंक फैलाना 
कितना आसन लगता है, हमारे नौजवानों को 
उपर बैठे उनके आका, पथ-भ्रष्ट करते इंसानों को
कितनी मांगें होती हैं सुनी, कितनी कोख उजडती 
ये रत्ती भर भी न होता है, गुमा उन बदमाशो को 
रोते- कलपते अनाथ बच्चे, अपनों को खोने का गम
हिला भी न पाता है, आत्मा और जमीर हैवानो का 
कभी भी न सोच पाते, ना ही सोच पाएंगे ये बेदर्द दरिन्दे 
इन्सान कहना भी इंसानियत की बेइज्जती करना होगा,
इन बहशियो को 
इन खूनी आतंकिओं की ना है कोई ,जात ना है बिरादरी 
ना है कोई अपना, ना माँ -बाप ना ही कोई रिश्तेदार 
इन्होने तो बस आतंक, बम, हत्या, खून से ही कर ली है नातेदारी 
अरे, बेबकूफ कभी तो बनाकर देखते किसी को अपना 
कुछ भी ना याद आता, भूल जाते कहर वरपाना-गर बना लेते सबको अपना ? 
ना होता कहर इतना, गर देखते वो भी सुंदर सपना, और किसी को कहते वो भी अपना ? 

शनिवार, 10 सितंबर 2011

दुखवा मै का से कहूँ ?

किसी ख़ुशी में भी, दर लगा रहता है 
नजर को जाती है फ़ौरन ख़ुशी भी 
जब कभी पंख लगाकर उड़ना चाह हमने 
आसमा में ढेरो गिद्द-बाज मडराते नजर आये 
फ़ौरन उड़ना भूल घोसले में बसेरा कर लिया 
जब कभी चाहा पाकछिओं की तरह हमने चह-चाहना   
गंदे- भद्दे अनर्गल भाषण सुने की बोलना भूल गए 
जब कभी चाहा स्वच्छंद विचरण यहाँ और वहां 
इतनी बंदिशे, इतनी यंत्रनाये मिली की चलना भूल गए 
जब चाहा खुल कर हँसना, बोलना बतियाना 
बंद कर दी गई, जुबान  की शब्दों का अर्थ भूल गए....
आखिर लड़की को ही इतनी बंदिसे क्यूँ ? 
क्यूँ  आज भी समाज उनकी खुशियों पर अंकुश 
लगता है चाहे बह महिला हो या पुरुष लेकिन 
आज भी सबाल है स्त्री जीवन ? 

मन की बेचैनी

मन पता नहीं कहाँ रहता है ? 
हर बक्त कुछ दूंडता रहता है 
अबूझे सवाल पूछता रहता है 
हर पल आशंकाओ में घिरा रहता है 
कुछ बुरा न हो इसी दर में जीता रहता है 
क्यूंकि हो चुका है सब कुछ घटित बुरा उसके साथ 
अब और कुछ न हो इसी में डूबा रहता है 
क्या करे वो, कैसे संभाले इस दिल को 
कुछ भी न होता जबाब है उसके पास 
ये तो बस डरता रहता है, परेशा करता रहता है ..


हरियाली तीज

Pakistani Mehndi Designs
प्यासी धरती, झुलसा तन 
शीतलता देता है बरसता सावन 
हरियाली तीज आने को है सन्देश देता  है सावन
दूर देश बैठी बेटी का आने को है बेक़रार मन 
भैया को पीहर जाकर बांधुंगी राखी है यह मन 
जो न जा सकीं पीहर, ससुराल में हैं तड़पता उनका मन 
माँ भी संजोती सपने और जोहती है बाँट हर छड 
आती होगी लाडो, झूलेगी झूला, रचेगी मेहंदी 
और आने से बेटीयों  के गुलजार होगा सूना घर आँगन..... 




























































मंगलवार, 6 सितंबर 2011

समय चक्र

जीवन के पचास वर्ष पूरे कर लिए सोंच कर होती है हैरानी 
समय चक्र कितनी तेजी से घूमता है बदल देता है जिन्दगी की रवानी 
जिन्दगी में -भी पचास वर्षो में बदला बयां करनी है अपनी जुवानी 
कब बचपन गुजरा बन गए माँ फिर सास और बन गए अब नानी 
हमारी जिन्दगी में आयीं दो नन्ही परियां उनको 
पाला-पोसा होती है हैरानी 
फिर आया हमारा लाडला राघव, सिखाई जिसने हमको जीने की नई कहानी 
विगत दस- पंद्रह बर्षो में उलट- पलट गई जिन्दगी की साडी रवानी 
माँ को खोया, बीमारी, डिप्रेशन और मुसीबतों ने भुला दी थी जिन्दगी की कहानी 
पहले था माँ का साया, तो कभी भी न महसूस होने दी उन्होंने कोई परेशानी 
सबको सब सुख होते नहीं नसीब यही है  हमारी जिन्दगी की एक छोटी सी कहानी 
हमारा साथ दिया पापा ने बहन दोस्तों ने और बच्चो ने 
थाम कर जिनका हाथ कभी भी न रुकी हमारी जिंदगानी 
आगे समंदर था गहरा पर हमारी कश्ती में भी थी पूरी रवानी 
धीरे- धीरे, रफ्ता-रफ्ता किनारे की ओर बढ रही है हमारी जिंदगानी 

मेरे दोस्त तेरे नाम

५० का आंकड़ा कर लिया है तुमने भी पार 
ईश्वर को यूँ ही दया बनी रहे तुम पर अपार 
हम दोनों को शायद इश्वेर ने एक साथ ही दिया होगा आकर 
कई समानताएं कई बातें आती रहीं हैं बार- बार
मै और तुम दोनों यहीं खेले और पले- बढें और सुख पाए 
माँ- पिता की छत्र-छाया और जो सुख चाहा वो सभी पाए 
किस्मत में था एक शहर में रहना साथ दोनों का वो भी निभाएं 
हम दोनों ने ही ईश्वर प्रदत्त, एक- एक होनहार पुत्र रत्न पाए 
माँ भी हम दोनों की जो घर से निकली, दुर्घटनावस् लौट ना पायीं 
पर आज हम दोनों पर ही ईश्वर ने छोड़ी जिम्मेदारिया- जो हम जा रहें हैं निभाए 
मै पापा के पास और तुम्हारे पास पापा देखो है कितनी समानतायें 
ईश्वर नवाजे तुम्हें ढेर सी खुशियाँ, और दूर करे सारी बिप्दायें 
कुदरत ने दी हैं हम दोनों की जिन्दगी में बहुत सी समानतायें 
इन्सान कुछ भी न कर सकता है मंगते है हम यही दुआएं 
जैसे अब तक निभाया है यह रिश्ता वैसे आगे भी हम-तुम निभाएं 
जितनी भी जिन्दगी काटी अच्छी कटी और आगे भी सुंदर सजाएँ ...

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

रीतिरिवाज

जब हुए विवाह के लायक तो भी रीतिरिवाज न बदले 
क्यूंकि तब सुना था माँ के मुह की लड़की के हालात न बदले
वही दान, वही दहेज़, माँ बाप को चाहिए और लड़के को रंग गोरा 
पहले न था शिक्षा पर इतना जोर पर व्याह पर खर्च था पूरा 
लड़की को दिखाना, उसकी नुमाइस सभी कुछ भी न था बदला 
पसंद आ गई तो रिश्ता पक्का वरना खाया पिया और चले 
लड़की के दिल दिमाग में जरा भी झांक कर न देखा की उस पर किया गुजरी 
बेचारी कितनी तकलीफ मानसिक व्यंग से वह है गुजरी
पर लड़के, उसके सम्बन्धी , माता पिता उनका इससे किया वास्ता 
लड़का तो ऊँचे दाम पर बिक ही जायेगा आज नहीं तो कल कोई दाम
दे ही जायेगा. 
हालात आज भी बही है बिल्कुल भी न बदले
बाप को चाहियें रुपया, बेटे को रंग गोरा और पड़ी लिखी 
नुमाइस पहले भी होती थी आज भी होती है और होती रहेगी 
आए खाया पिया, देखा और चले जरा भी न दिल धड़का 
बेचारी लड़की आज भी बहीं है उसी लीक पर चल रही है
उस मासूम के लिए क्यूँ नहीं दर्द उपजा ? क्यूँ, क्या कभी उपजेगा ? 
नहीं शायद कभी नहीं क्यूंकि वो तो यहीं यातनाये 
कवच झेलने के लिए जन्मी हैं इस संसार में और 
यह समाज न बदला न ही कभी बदलेगा 
क्या नहीं बदल पायेगा ये समाज ?
जो था कल बही है आज क्या इसको कहते है हम समाज


गुरुवार, 1 सितंबर 2011

अर्धशतक किया है आज मैंने पूरा

जीवन का अर्धशतक किया है आज मैंने पूरा 
लगता नहीं है की पचास का आंकड़ा छू लिया है पूरा
पीछे मुड़कर देखा तो पाया, कि अभी तो हम बच्चे थे 
क्यूंकि हर वक्त माँ पिता का वरद हस्त था हम पर पूरा
माँ तो हमेशा बना कर रखती थीं ,अपना बच्चा हमको पूरा
फिर जिन्दगी उलझ गई छोटे- छोटे बच्चों को पालने पोसने में 
उनकी शिक्षा, उनकी जिन्दगी के अहम् फैसलों को किया पूरा
दो बेटिओं के बाद पाया राघव (बेटा) को जिसने जीवन को हमारे संवारा  
फिर खोया माँ को, लगा जिंदगी को खुशिओं का साथ न था गवारा 
जिन्दगी फिर दौड़ाने लगी पटरी पर क्यूंकि जाने बाले के साथ न जाया जाता 
समय चक्र का पहिया दौड़ रहा था और हमको तनिक न पता चला 
जब पता चला तो पाया कि हम आधी से ज्यादा यात्रा कर आये 
अब थोडा जीवन बाकी है आशा है सुख से कट जाये 
हम वो छडं न भूल पाएंगी जब प्रभु ने दिया एक अनुपम उपहार 
आन्या (नातिन) से पाया मैंने नव निर्मल रिश्तो का संसार 
पचासवी तो मना रही हूँ सबके साथ 75 वी0 भी शायद मना ले आप लोगो के साथ
ये सब कुछ है अब परम पूज्य ठाकुर जी के हाथ ....

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

रात का सन्नाटा

रात का सन्नाटा था पसरा हुआ
चाँद भी था अपने पुरे शबाब पर 
समुद्र की लहरें करती थी अठखेलियाँ 
पर मन पर न था उसका कुछ बस 
यादें अच्छी बुरी न लेने दे रही थी चैन उसको 
दिल को सुकून देने का था तमाम बंदोबस्त वहां 
पर दिमाग को था न जरा भी चैन वहां 
उसके अनगिनत घाव थे और आत्मा थी लहुलोहान 
सबको मौसम रहा था लुभा और था बहुत हसीन
पर जो बबंडर दिल में उठ रहा है उसका क्या ? 
मन को ना आये खुबसूरत चाँद और उठती समुद्र की लहरें 
क्यूंकि विदार्ण आत्मा ने तो बना दिया हर जख्म सूल 
बहती बयार सुंदर समां कुछ भी न खुश कर सका उसको 
बस ये सब था उसके मन के लिए एक धूल.. 

























मंगलवार, 26 जुलाई 2011

इंतजार

यह इंतजार भी कितनी खुबसूरत चीज है 
जन्म से मृत्यु तक हर इंसा के दिल को अजीज है 
बहु के पाँव भरी होने से शुरू होता है इंतजार 
पोता या पोती, दादा- दादी, नाना-नानी को रहता है इंतजार 
नवागत का आगमन कर देता है घर को गुलजार 
कब चलेगा, कब बोलेगा, कब बैठेगा अब है यह इंतजार 
कौन सा स्कूल, कौन सा कालेज क्या करियर होगा तब-तक 
युबाओं में अब जागी है अपने प्रियतम से मिलन का इंतजार 
माँ को भी होता बहु और दामाद का घर आगमन का इंतजार 
रिश्ता तय हुआ, शुरू होता अब विबाह ही बेला का इंतजार 
है न कितनी खूबसूरत यह इंतजार नाम की बला 
कट जाती है पूरी जिन्दगी इंतजार ही इंतजार में .
ख़तम न होता यह जीवन में एक बार .....


आया सावन झूम के

सावन की गिरती बूंदे
भिगो जाती हैं सर्वस्व तन- मन
तृप्त कर जाती हैं धरती की प्यास
और पपीहे की धड़कन
बड़ा जाती हैं सजनी की आस
पिया मिलन को धड़कता मन
प्यासे खेत में टपकती बूंदों को देख
लरजता है किसान का मन
सावन के अंधे को हरा ही दिखता है ,
चरितार्थ करता है यह सावन
गाव में झूले, भरते ताल तलैया
हुलस-हुलस उठता है मन
नीम और अमुआ पे पड़े झूले
उमंग से भर देते बालको का मन
पशु -पक्षी , नर नारी सम्पूर्ण धरा भी नाच उठती
है पाकर सावन का संग .......


रविवार, 24 जुलाई 2011

नातिन का स्कूल का पहला दिन

नातिन का स्कूल का पहला दिन 
अगली पीड़ी के पहले बच्चे का, पहला दिन  
याद आ गया फ़ौरन जब उसकी माँ गई थी स्कूल 
ख़ुशी थी रोमांच था और बच्ची भी थी बहुत कूल
पूरे बक्त ह्रदय  में रही हूक दिल में थे डेरों शूल 
काश उस नन्ही जान को समेट लेतीं आंचल में 
ना भेजती स्कूल 
पर कहाँ था यह संभव बच्ची को तो जाना ही था स्कूल 
आज गई है उसकी भी बेटी- वो भी है वैसी ही कूल 
कहानी फिर बहीं से शुरू  होती है पर बदल गया है स्कूल 
सुंदर बाताबरण ए.सी रूम नये- नाज नखरे पर है तो 
वो भी स्कूल 
बेटी बोली माँ बच्ची रोती है देखते ही अपना स्कूल 
बड़ा दिल घबराता है जब मेड ले जाती है स्कूल 
मई बोली मेरा भी दिल घबराया था जब भेजा था तुमको स्कूल 
कितनी हो गई थी मई भी बेचैन घर में 
मस्तिस्क था शून्य जब तुम भी गई थीं स्कूल 
समय चक्र तेजी से घूमता है चाहें हो बह कूल या प्रति-कूल 
इतिहास स्वयं ही दोहराता है हो चाहें हमारे अनुकूल या प्रति-कूल.






बिकता है इन्सान

आज के युग में सब कुछ बिकता है इंसा खरीदता है 
अस्मत बिकती है आबरू बिकती है और बिकता है इन्सान 
कही लड़की बिकती , कहीं बच्चा बिकता खरीदता है सारा जहान

रिश्ते बिकते, परम्पराये बिकती, बिकता है मान और सम्मान 
पति- पत्नी , भाई-बहन , चाचा- ताऊ, साली- जीजा 
सारे रिश्ते है बिकते, जैसे बिकता है अख़बार 

माँ -बच्चा, बेटी- पिता, सरीखे रिश्ते भी हैं बिकते 
कितनी गर्त में जा रहे हैं हम, इसको क्यूँ न समझ सकते 
जिन्दगी की आपाधापी में प्यार संस्कार सब हैं बेकार 

नेता, अफसर, समाजसेवी और नर- नारी 
गर न चेते तो क्या दे पाएंगे एक सुंदर संसार ?
देखो जरा निगाहों से कैसे बिकता है इन्सान ?

दरकते रिश्ते गिरता सामाजिक ढांचा, क्या अभी न इसको रोक सकते 
क्या सही रास्ता अपनाना इतना कठिन है आज क्यूँ बिकता है इन्सान ?

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

बेटी की समझदारी

बेटियां होती हैं कितनी मासूम, कोमल और समझदार
पैदा होती हैं तो शायद सबको रुलाती हैं हर बार
पर उम्र बढने के साथ ही हो जाती हैं होशियार

घर-परिवार , माँ बाप की इज्जत की होती है दरकार
कोई भी लक्षमण रेखा पार करने से पहले सोचती है दस- बार
खुद काँटों से लहू लोहान होती हैं पर माँ बाप को बचाती हैं हर बार
बचपन से ही भाईयों की ढाल बनती रही हैं हर बार
यही त्याग, सयम और प्यार बचपन से सीखती बुनती आई है
आपने जीवन के हर रूप में नवीन श्रंगार ...........

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

दर्द इतना क्यूँ ?

छोड़ दिया है आब दिल पर पड़ी गर्द झाड़ना भी
क्यूंकि उसके साथ- साथ नासूर भी हो जाते हैं
फिर देते हैं टीस , कर जाते हैं घायल रूह को
तो सोचा क्यूँ हटाऊं इस गर्द को मई भी
मरहम का काम इससे ज्यादा न कर सकेगा कोई भी
दब जाते हैं इसके नीचे सभी जख्म और घाव
अनगिनत है जो शायद गिन भी न सकेगा कोई भी ....

एक चेहरे पे कई चेहरे

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग
क्या खूब कहा है किसी ने सच में होते हैं ऐसे लोग
सामने कुछ और,पीछे कुछ बाते बनाते ही रहते हैं लोग
मन भर उठता है जब देखते हैं रोज ऐसे १०-२० लोग
क्या दुनिया में अपना कोई नहीं पूछता है मन हमसे रोज
इस मन को कैसे समझाएँ की होते नहीं हैं सब अपने लोग
सामने दुआए पीछे बददुआएं पल पल रंग बदलते लोग
दिल करता चीत्कार , आत्मा हाहाकार देखकर आसपास ऐसे लोग
पर क्या करें दुनिया- दारी तो न छोड़ी जाएगी चाहें कुछ भी करे लोग
दिल की न सुनकर दिमाग से ही पहचाने जाते हैं ऐसे लोग
कितना भी मजबूत रक्खें पर दिल फिसल ही जाता है देखते ही ऐसे लोग
चिकनी चुपड़ी, निज प्रशंशा सुनने को मन ढूंडता है ऐसे लोग .........

सोमवार, 11 जुलाई 2011

हाय-हाय गर्मी

उफ़ यह गर्मी का मौसम खूब रुलाता है

मौसम के साथ- साथ बिजली कटौती का दुःख सताता है
बिजली कटौती के साथ जनरेटर की आवाज से दम निकलता है
जनरेटर के साथ रात में मचछरो का संगीत सबको जगाता है
रात में संगीत और दिन में बदहजमी का दर्द सताता है
बदहजमी के साथ डायरिया, वायरल किलीनिक के चक्कर कटबाता है
किलीनिक के चक्करों के साथ-साथ फोड़े- फुंसी और घमौरिओं का आतंक रुलाता है

हर तकलीफ परेशानी झेल कर भी ये मौसम
हर साल अपना का इंतजार करता है
हर साल यह मौसम आम,खुमानी,लीची
भी भरपूर संग अपने लाता है
वर्फ का गोला,चुस्की,कुल्फी, फालूदा भी
यही मौसम खिलबाता है .. ...

रविवार, 3 जुलाई 2011

पितृ दिवस

पितृ दिवस पर किया लिखूं पिता के बारे में
हम दो बहिनों का बचपन से जीवन सवांरा उन्होंने 
नहीं याद ऐसी कोई चाहत जो रही हो अधूरी 
हर कोशिश, यथाशक्ति से जो न की हो उन्होंने पूरी 
भाई न था तो बेटीयों को पाला बेटों से बढकर 
कभी न किया भेदभाव हमको लड़की समझकर 
हर यकीं के साथ भेजा बाहर हमको बढ-चढकर
ना रहने दी कोई कमी -कभी ,शादी व्याह और घर पर 
खाली पितृ दिवस पर याद करने-
बधाई देने पर होता न मकसद पूरा 
मकसद होगा उनके बताये उसूल, रास्तो पर चलकर 
उनके अनुभव और तजुर्वों से  कुछ सीखकर 
गर कर सके हम उन सपनो को पूरा 
तो यही होगा सच्चा प्यार और होगा सबका जीवन सुनहरा ....

मंगलवार, 21 जून 2011

कोमल अहसास

15th June 
आज है बेटे का जन्म दिन 
प्रफुल्लित है, आह्वावादित है तनमन 
जन्म दिन के साथ ही याद आता है मासूम क्रदन

प्रथम स्पर्श,उस मासूम का कोमल स्पंदन 
छू छूकर देखा था बार- बार उस नन्ही सी जान को 
और पाया था अदभुत, आत्मिक, संतोष तनमन को 

वो नवजात शिशु का टकटकी लगा कर देखना 
भिगो गया था सर्वस्व आत्मा को, प्रत्येक छण 
किसी भी चीज की अदभुत चाह और उसको पाना 

न कर सकती हूँ वयां क्यूंकि यह जिसने चाह उसी ने है जाना 
की कैसे हो सकता वयां ....


मंगलवार, 7 जून 2011

Roshi: Roshi: बेटियां ही कियूं सहती हैं

Roshi: Roshi: बेटियां ही कियूं सहती हैं: "Roshi: बेटियां ही कियूं सहती हैं : 'बेटियां जब कोख में आती हैं तब भी दुःख देती हैं पैदा जब होती हैं, इस घिनौने संसार में तब भी दुःख देती है..."

हर युग की कहानी नारी की जुबानी

बरसो से हम बात करते रहे हैं समानता की 
पर नारी को ही छलते आये  हैं इसकी दुहाई दे-देकर

हर युग में ही भोग्या बनती आई है नारी 
कभी सखा, कभी प्रयेसी और कभी पत्नी बनकर

रघुकुल में भी भोगा है दारुण दुःख सीता और उर्मिला ने 
एक ने काटा बनबास अरण्य में, दूसरी ने राज कुल में

यदुवंश में भी राधा ने ही काटा अपना जीवन प्रभु प्रेम में 
सनेत्र बांधी पट्टी गांधारी ने और पाया अंधत्व का दारुण दुःख

बांटी गई पांचाली पांच पतियों में जो व्याही गयी सिर्फ अर्जुन को 
कांप उठती है आत्मा जब भी सोंचती हूँ इन सबके दुःख को 

पुरुष ने तो हमेशा ही भोगा त्यागा और कष्ट दिया इन सबको 
अग्नि परीक्षा तो दी है सदैव नारी और अबला ने

कष्ट, दुःख,  विरह-वेदना सबको झेला है हर युग में उसने 
ना ही कोई युग बदला , ना ही बदली हमारी सोंच

हम कितना आधुनिक युग में चाहे जी ले पर 
त्याग बलिदान आज भी है हिस्से में तो नारी के कांधो पर..  

मेरी दुनिया

ग़मों से तो बहुत पुराना नाता रहा है हमारा 
होश संभाला तो लड़का न होने का मलाल करते पाया 
कुछ बड़े हुए तो रंग सांवला होने का ज़माने ने लगाया ताना 
जैसे-तैसे व्याह हुआ तो ना मिला वहां भी कोई हमारा
ना देखता गुणों को कोई वस अपबाद बताते सारा  

फिर  जन्मी बेटियां , वो भी दिया दोष हमारा  
बेटियां लातीं इनाम और पिता की सारी तकलीफों
सारा हिस्सा था हमारा 
पर कहते है न की घूरे के भी दिन बहुरते हैं ?  
हमारा भी समय चक्र पलटा और पाया बच्चो अपने बच्चो का सहारा 
बेटियों ने किया नाम रोशन और जगमग हुआ आज संसार हमारा ..

मेरे अपने

कुछ लोग ऐसे मिल जाते हैं जिन्दगी में 
कि जुड़ जाते है वो जीवन चक्र कि धारा में 
पास रहकर कर जाते हैं वो आत्मा त्रप्त 
और दूर रहकर भी उनकी दुआएं करती हैं संतप्त 
दिल से दी गई दुआ का भी असर दिखता फ़ौरन 
हर मुश्किल घडी कटती है ऐसे जैसे शेर को देखकर भागे हिरन 
दिल हमारा भी देता है दुआ उनको कि रहे हमेशा उनकी हम पर नज़र 
पाएं वो भी सारे जहाँ की खुशियाँ और कुदरत का न हो उन पर कहर ..

शनिवार, 4 जून 2011

परउपदेश, कुशल बहुतेरे

बहुत है आसां है दूसरों को सीख देना 
पर कर गुजरना है बहुत मुश्किल 
कहना तो बहुत आसां है दरिया में कूद जाओ 
पर साथ ही खुद करके दिखाना है बा मुश्किल 
दूसरो को सीख भी तभी दो जब हिम्मत दिखाओ खुद कूदने की 
कुछ कर गुजरेंगे, जब ऐसा जमाना भी करेगा कद्र जज्बे की...

शुक्रवार, 3 जून 2011

Roshi: बेटियां ही कियूं सहती हैं

Roshi: बेटियां ही कियूं सहती हैं: "बेटियां जब कोख में आती हैं तब भी दुःख देती हैं पैदा जब होती हैं, इस घिनौने संसार में तब भी दुःख देती है बड़ी जब होती हैं शोहदे छेड़ते हैं ..."

बेटियां ही कियूं सहती हैं

बेटियां जब कोख में आती हैं तब भी दुःख देती हैं 
पैदा जब होती हैं, इस घिनौने संसार में तब भी दुःख देती है 
बड़ी जब होती हैं शोहदे छेड़ते हैं तब भी दुःख देती हैं 
ब्याह कर जाती हैं ससुराल और झेलती हैं पीड़ा तब भी दुःख देती हैं 

छुपाती हैं ठेरों गम, तकलीफे अपने दामन में तब भी दुःख देती है 
जब कभी झेलती हैं पुरुष का दम और दर्श तब भी दुःख देती है 
सास- ससुर , देवर नन्द के कटाक्छ हंसकर झेलती हैं तब भी दुःख देती हैं 
रखती हैं कदम जब मातृत्व की ओर और उठती है तकलीफें तब भी  देती दुःख हैं 

झेलती हैं मातृत्व पीड़ा का दारुण दुःख तब भी दुःख देती हैं 
और जब वो बनती हैं बेटी की मां और सहती हैं अत्याचार 
पारिवारिक क्लेश , पति का आतंक तब भी दुःख देती हैं 
आखिर ये सब बेटियां ही कियूं सहती हैं. ? 

रिश्ता वफ़ा का

एक विकलांग पुरुष चड़ा दुकान पर धीरे- धीरे 
माँगा उसने पत्नी के लिए नाक का फूल  
दिखाए थे उसको कई डिज़ाइन पर न एक भी कर पाया पसंद 
बाइक पर बैठी थी बाहर पत्नी , ले जाकर दिखाता था उसको बार- बार 
खीझ कर हमने कहा क्यूँ नहीं पत्नी को बुलाते हो एक बार 
फ़ौरन बोला वो नहीं आ सकती है वो बीमार  
शक हुआ , बाहर झाका गौर से देखा उसको एक बार 
उसी पैर से विकलांग पुरुष की पत्नी भी थी विकलांग 
नाक का फूल खरीदकर गया वो पत्नी के पास हंसकर 
दोनों विकलांग पति -पत्नी का हौसला देखकर 
मन दे रहा था उनको ठेरों दुआएं बार- बार 
काश ऐसा की होता हम सब का जीवन -संसार
जिसमे होता प्यार और विश्वास भरा उल्लास ...


मायने ख़ुशी के

अपनों का मिलना क्या यही है मायना ख़ुशी का ?
शेयर बाजार में अर्जित धन यही है मायना ख़ुशी का ? 
या जमीन जायदाद में हो रहा मुनाफा मायना है ख़ुशी का ? 
धन संपत्ति में होता भरी उछाल क्या मायना है ख़ुशी का ?
ठेरों सोना, चाँदी बैंक बैलेंस है मायना ख़ुशी का ?
हाँ है, यह भी है मायना ख़ुशी का पर है यह किसका 
आन्तरिक आनंद , स्वस्थ काया, मानसिक संतोष ध्येय हो जिसका 
पाया है दुनिया का हर सुख उसने, बाल भी बांका न हो सकता उसका  .......
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शुक्रवार, 27 मई 2011

Roshi: नारी जीवन एक प्रश्न

Roshi: नारी जीवन एक प्रश्न: "बरसो बाद आज मिली वो मुझे बीमार, असहाय , मानसिक अवसाद से त्रस्त थी वो हँसना, मुस्काना खिलखिलाना गई थी वो भूल बुत सरीखी प्रतिमा लग रही थी ..."

Roshi: जिन्दगी

Roshi: जिन्दगी: "जिन्दगी ने दी ठेरों खुशियों और नवाजा अनेको सुखो से पर थोड़े से दुखो में ही रही उलझी और ना सामना हुआ उनसे हम क्यूँ ना देख पाते हैं वो खुशिय..."

गुरुवार, 26 मई 2011

मासूम परी

वो है मासूम परी, इतनी कोमल जैसे मिश्री की डाली 
उसका मन निर्मल, स्वभाव शांत और 
कियूं कर ईश्वर ने बनाया उसको ऐसा ? 
थी वो कोई इश्वेर्ये वरदान जो मिली थी उसको वो लली 

आत्मा भी थी उसकी शुद्ध, न थी कोई तामसी ब्रती वहां 
आज की युग में भी कोई बालक हो सकता है कहाँ ? 

न थी उसको कोई जेवर, कपडे और किसी भी उत्पात की चाह
बस सदा जीवन उच्च विचार ही था उसकी राह

कभी भी , कहीं भी , किसी भी चीज को ना थी उसको जरुरत 
किया ईश्वर ने बनाया था उसका स्वभाव या उसने खुद बना ली थी फितरत 

दूसरो को ही देना, कभी खुद कुछ न लेना ऐसा था उसका स्वभाव 
कहना आसन लगता है पर निभाना है मुश्किल ऐसा वर्ताब 

माँ होकर भी हरदम सोचती कियूं न उसको कभी भी मन न चलता 
कितना सयंम , था उसको मन पर यह कभी भी दूसरे को ना पता चलता ...


सुनो दोस्तों

विधाता ने तो दिया ऐसा सुंदर मानव रूप हमको 

दिए हमको गम तो बक्श दी ठेरों इनायतें हम पर 

कभी स्याह , कभी सफ़ेद दिखा दिए सब सपने हमको 

अगर रहता स्याह रंग से सरोबर जीवन हमारा 

तो सफ़ेद रंग का ना देख पते हम अदभुत नज़ारा 

जो भी ख़ुशी मिले जियो सदैव हंस के मेरे दोस्तों 

और मिले जो कभी गम तो उसे भी लगा लो गले दोस्तों 

दुःख देती तकलीफे

बहुत दुःख होता है अपनों को देखना तकलीफ में 
पर सोचने से किया होता है 
जब भी आती है बच्चो को तकलीफ 
तड़प उठता है मन होती है बहुत टीस
पर अपने- अपने हिस्से की तकलीफ तो उठानी होती है सबको 
बरना तो माँ उठा लेती है अपने कन्धो पर दुःख का सारा बोझ 
और तिनका भर भी दुःख ना आने देती पास वो बच्चो के 
उसकी दुनिया तो घुमती है उसके नैनिहालो के पास 
पर बालको का तड़पना कर देता है व्यथित उसको 
देखकर उसकी तकलीफ होती हूँ हर- पल परेश: ....

बुधवार, 25 मई 2011

क्या उम्मीदें होंगी पूरी

आँचल में सारा प्यार भरकर उडेलना चाहती है माँ 
पर कुछ बन्धनों में बेडिओं में जकड़ी है वो माँ 
चाह कर भी कभी कुछ ना कर पाने का मलाल करती है माँ 

सर्वस्व न्योछाबर करने को हरदम तैयार रहती है माँ 
बिना कभी भी यह जाने की औलाद किया करेगी ना सोचती माँ 
जब आंखे होंगी कमजोर तो किया सहारा बनेंगी औलाद ?
जब शरीर थकेगा तो किया हाथ पकड़ेगी औलाद सोचती है हरदम माँ ?
जब होगी वृद्ध , असहाय तो किया बोझ उठाएगी औलाद 
सोचती है माँ ?

जिन्दगी

जिन्दगी ने दी ठेरों खुशियों और नवाजा अनेको सुखो से 
पर थोड़े से दुखो में ही रही उलझी और ना सामना हुआ उनसे 
हम क्यूँ ना देख पाते हैं वो खुशियाँ, सपने और उल्लास 
रह जाते हैं यूँ ही मसरूफ अपने दुखो, तकलीफों में ही हर साँस 
विधाता ने तो दिया ऐसा सुन्दर मानव रूप हमको 
दिए हमको गम तो बक्श दिन ठेरों इनायतें हम पर 
कभी स्याह कभी सफ़ेद दिखा दिए सब सपने हमको 
अगर रहता स्याह रंग से सरोवर जीवन हमारा 
तो सफ़ेद रंग का ना देख पते हम अदभुत नज़ारा 
जो भी ख़ुशी मिले जियो सदैव हंस के मेरे दोस्तों 
और मिले जो कभी गम तो उसे भी लगा तो गले दोस्तों ......

नारी जीवन एक प्रश्न

बरसो बाद आज मिली वो मुझे 
बीमार, असहाय , मानसिक अवसाद से त्रस्त थी वो 
हँसना, मुस्काना खिलखिलाना गई थी वो भूल 

बुत सरीखी प्रतिमा लग रही थी वो मुझे 

स्वर्थी, शराबी, पति को गई थी वो व्याही 
बच्चो का जीवन संवारने में ही जिंदगी जीना गई थी भूल 
किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में संकोच होता था उसको 
नारी जाति पर हो रहे अत्याचारों  का साक्षात् नमूना थी वो 

जी रही थी पर बगैर साँस के , चल रही थी बगैर आस के 
घर, परिवार की इज्जत बचाए जी रही थी संग वो अपनी सास के......