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गुरुवार, 22 सितंबर 2011

आतंकवाद की समस्या

अभी आज ही अखबार में छपा था, 
किया कुछ नासमझों ने धर्मग्रन्थ का अपमान 
क्यूँ नहीं करते हैं दुसरे मजहब का सम्मान 
क्यूँ दूसरे मजहब का नहीं करना चाहिए सम्मान 
हों वो चाहे हिन्दू, सिख, इसाई या मुस्लमान, 
खून उबलता है, निकाल लेते हैं फ़ौरन गैर कानूनी सामान 
क्यूँ नहीं ज़रा भी समझते की सभी धर्म हैं एक समान 
ईशवर तो एक ही है क्यूँ है बिखर गयी इसकी संतान 
सभी धर्म, हर मजहब, और पंथ बनाता तो यही है इन्सान 
क्यूँ न हम सिखाएं बच्चों को की करें वो हर धर्म का सम्मान 
गर चाहें हम तो दिखा दें विश्व को सर्व धर्म का सम्मान करता है हिंदुस्तान 
फिर क्यूँ करता है यह दंगे, तोड़ फोड़ , बर्बादी और घमासान ? 


जर्जर काया

अभी अभी गई किसी विधवा बूढी माँ की अर्थी 
जब तक जिंदा रही वो तड़पती रही सिसकती रही 
पति को जो जवानी में थी खो चुकी पर बेटे के सहारे जीती रही 
मरियल काया, सफ़ेद साड़ी, समाज के भेड़ियों के बीच जिंदा रही 
किस तरह से काटा होगा दिन और कितनी भयावह होगी उनकी रातें मैं सोचती रही 
पुत्र प्रेम में वो जीती रही, पुनः पुनः रोज़ मरती रही 
पुत्र भी न निकला कम पर अब पुत्रवधु के सपने संजोती रही
पुत्रवधु भी थी आधुनिक, उसके अपने पुत्र के साथ दम घोटती रही 
कितना दुःख विधाता ने लिखा था उसकी फूटी किस्मत में सहती रही 
पर आज हो गयी सब बंधनों से आज़ाद, आत्मा उनकी निर्वाण को प्राप्त हो गयी 

अपने पराये

सभी आये,सभी ने सराहा ,कुछ ने मन से कुछ ने बेमन से 
अब कुछ कुछ पहचानने लगे है ,चेहरे कौन अपने कौन पराये 
दिखाते है ख़ुशी ,ढकते हैं जलन पर दिख ही जाते हैं फफोले चेहरे पर 
क्यूंकि चेहरा और आँखें ही तो आइना हैं अंदरूनी 
यह कमबख्त कितना भी छुपाओ राज़ खोल ही देते हैं 
सोचो ज़रा उस भगवन का करो शुक्रिया अदा
कितनी खूबसूरती से फिट किया है लाइ डेटेक्टर 
इन्सां को भी न पता 

माखनचोर


ब्रज का दुलारा है ,सखियन का प्यारा है
यशोदा की अंखियन का तारा ,,वो है हमारा
वृषभान दुलारी का प्राण-प्रिय ,नन्द का दुलारा है
वृज का रखवारा दुष्टों का तारान्हारा है ,
किन नामो से उसको पुकारे ना जाने यह जी हमारा है?  
गोवर्धनधारी ,गिरधारी ,माखनचोर और कृष्ण मुरारी 
असंख्य नाम है उसके ,सहस्त्र्रूप्धारी