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शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

Roshi: Roshi: वाघ ,चीता ,सियार सभी हैं जंगली हिंसक प्राणी...

Roshi: Roshi: वाघ ,चीता ,सियार सभी हैं जंगली हिंसक प्राणी...: Roshi: वाघ ,चीता ,सियार सभी हैं जंगली हिंसक प्राणीबाल्याव... : वाघ ,चीता ,सियार सभी हैं जंगली हिंसक प्राणी बाल्यावस्था से सुनते ,समझते औ...

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

Roshi: वाघ ,चीता ,सियार सभी हैं जंगली हिंसक प्राणीबाल्याव...

Roshi: वाघ ,चीता ,सियार सभी हैं जंगली हिंसक प्राणीबाल्याव...: वाघ ,चीता ,सियार सभी हैं जंगली हिंसक प्राणी बाल्यावस्था से सुनते ,समझते और गुनतेआये हैं सभी क्या कभी अपने नौनिहाल , प्रियेजन को...
वाघ ,चीता ,सियार सभी हैं जंगली हिंसक प्राणी
बाल्यावस्था से सुनते ,समझते और गुनतेआये हैं सभी
क्या कभी अपने नौनिहाल , प्रियेजन को सौंपा है इन वनचरों के समीप
ना किसी ने बताया ना किसी ने हमको समझाया है कि खतरा है बहुत इनके करीब
बस हमको पता है ,क्या सही है और क्या अनुचित है
हमने यह पाठ अपने बालकों को भी समझाया है
पर्याप्त दूरी ,मेलजोल ,संपर्क सब कुछ अनुचित बताया है
फिर क्योँ ,आखिर क्योँ हम अपने नौनिहालों को जानतेसमझते
सौंप देते है ,आसाराम ,रामरहीम ,जैसे बनेलों के करीब
,आँखे ,आत्मा सबको ताक पर रखकर अपने तथाकथित इश्वर के करीब
कभी ना पलटते ,देखते अपनी उन मासूम कलियों को ,ना जाते उनकी आत्मा के करीब
बताई गर कोई तकलीफ तो फिर फेंक देते वापिस उसी बाड़े में
जनावर का तो धर्म हैः नोचना ,चीरना फाड़ना,जो भी है उसके बाड़े में
गलती तो हम रोज़ करते क्यूंकि पैदा कर देते हैं हर रोज़ एक नया व्याघ
उसकी खुराक ,तृष्णा ,इच्छा ,अपने नौनिहालों को सौंपकर

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

Roshi: जियो अपने लिए ,हंसो अपने लिए सोचो सिर्फ अपनी ही भू...

Roshi: जियो अपने लिए ,हंसो अपने लिए सोचो सिर्फ अपनी ही भू...: जियो अपने लिए ,हंसो अपने लिए सोचो सिर्फ अपनी ही भूलों के लिए ख़ुशी महसूस करो अपना आत्मचिंतन कर अवसाद के चंद लम्हे गुजारो अत्मि...
जियो अपने लिए ,हंसो अपने लिए
सोचो सिर्फ अपनी ही भूलों के लिए
ख़ुशी महसूस करो अपना आत्मचिंतन कर
अवसाद के चंद लम्हे गुजारो अत्मिश्लेशन कर
जीवन गुजारो निज आत्मा को शुद्ध करके
जैसे घर को बुहारते हो नित्य साफ़ -सफाई करके
जीवनकाल तो इतना सूक्षम है निज मंथन के लिए
बाल्यावस्था से वृधावस्था तक ना किया कुछ स्व विकास के लिए

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

Roshi: गिरगिट सरीखे रंग बदलना कबूतर मानिद आँख मूँद लेना ग...

Roshi: गिरगिट सरीखे रंग बदलना कबूतर मानिद आँख मूँद लेना ग...: गिरगिट सरीखे रंग बदलना  कबूतर मानिद आँख मूँद लेना  गीध सी तेज नज़र ,बहुत कुछ है सीखना  जिन्दगी जीना है अगर तो पड़ेगा जरूर सीखना  लोमड़ी सी मौक...
गिरगिट सरीखे रंग बदलना 
कबूतर मानिद आँख मूँद लेना 
गीध सी तेज नज़र ,बहुत कुछ है सीखना 
जिन्दगी जीना है अगर तो पड़ेगा जरूर सीखना 
लोमड़ी सी मौकापरस्ती ,इन जानवरों से सीखो जीना
देखे हैं हमने ढेरों पारंगत इन विविध कलाओं में
सीको दोस्तों इनसे कुछ बरना मुस्किल हो जायेगा जीना

Roshi: मदद करो और भूल जाओ सिखाया था माँ ने हमको इससे आगे ...

Roshi: मदद करो और भूल जाओ सिखाया था माँ ने हमको इससे आगे ...: मदद करो और भूल जाओ सिखाया था माँ ने हमको  इससे आगे का पाठ ना पदाया था माँ ने हमको  राहे जिन्दगी ने सिखाया नया आध्याए हमको  अपनी खुशियाँ ,उस...
कितने चतुर ,और कितने काबिल 
उम्दा वीर और महान बलशाली 
देखे और सुने हैं धराशायी होते हमने 
आँखों से भरभराते साम्राज्य को देहते हमने 
और जब चला ऊपरवाले का रहमोकरम 
चींटी को भी तमाम कायनात सम्हाले देखा हमने

Roshi: मदद करो और भूल जाओ सिखाया था माँ ने हमको इससे आगे ...

Roshi: मदद करो और भूल जाओ सिखाया था माँ ने हमको इससे आगे ...: मदद करो और भूल जाओ सिखाया था माँ ने हमको  इससे आगे का पाठ ना पदाया था माँ ने हमको  राहे जिन्दगी ने सिखाया नया आध्याए हमको  अपनी खुशियाँ ,उस...

Roshi: शिकायतें ,रिवायतें ,निभाते चले गए रस्मों ,रिवाजों ...

Roshi: शिकायतें ,रिवायतें ,निभाते चले गए रस्मों ,रिवाजों ...: शिकायतें ,रिवायतें ,निभाते चले गए  रस्मों ,रिवाजों के मकड़जाल को सुलझाते चले गए  ना कुछ हासिल कर सके ,ना ही कुछ बदल सके  हम सब ही ढोल चाहे आ...

Roshi: कितने चतुर ,और कितने काबिल उम्दा वीर और महान बलशाल...

Roshi: कितने चतुर ,और कितने काबिल उम्दा वीर और महान बलशाल...: कितने चतुर ,और कितने काबिल  उम्दा वीर और महान बलशाली  देखे और सुने हैं धराशायी होते हमने  आँखों से भरभराते साम्राज्य को देहते हमने  और जब च...
कितने चतुर ,और कितने काबिल 
उम्दा वीर और महान बलशाली 
देखे और सुने हैं धराशायी होते हमने 
आँखों से भरभराते साम्राज्य को देहते हमने 
और जब चला ऊपरवाले का रहमोकरम 
चींटी को भी तमाम कायनात सम्हाले देखा हमने
शिकायतें ,रिवायतें ,निभाते चले गए 
रस्मों ,रिवाजों के मकड़जाल को सुलझाते चले गए 
ना कुछ हासिल कर सके ,ना ही कुछ बदल सके 
हम सब ही ढोल चाहे आधुनिकता का कितना ही पीटते रहे 
जंजीरें कुछ यूं समां गयीं हमारे वजूद में ,हम खुद ही उनमें लिपटते चले गए
मदद करो और भूल जाओ सिखाया था माँ ने हमको 
इससे आगे का पाठ ना पदाया था माँ ने हमको 
राहे जिन्दगी ने सिखाया नया आध्याए हमको 
अपनी खुशियाँ ,उसूल ,जिन्दगी को दरकिनार कर 
ना करो मदद दोस्तों तजुर्बे ने सिखाया हमको

शनिवार, 28 जनवरी 2017

Roshi: आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा चौदह वर्ष...

Roshi: आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा चौदह वर्ष...: आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा चौदह वर्ष कैसे गुजारे होंगे सती ने उन पिशाचों के बीच ना कोई ख़त न था कोई सन्देश परस्पर प...
आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा
चौदह वर्ष कैसे गुजारे होंगे सती ने उन पिशाचों के बीच
ना कोई ख़त न था कोई सन्देश परस्पर पति -पत्नी के बीच
इंतजार भी खतम हुआ उस निर्मोही का ,भेज दिए थे जिसने दूत
छुद्र मानसिकता का जिसने दिया था अपना सबूत
वनगमन को जाते ना सोचा कदापि उस नववधु उर्मिला के वास्ते
कर दिया उसके सपनों पर तुषारापात ,अँधेरे कर दिए थे उसके दिन और रात
काश दिखाया होता बद्दप्पन ,ना छुड़ाया होता उर्मिला से लच्छमन का साथ
उसकी पीड़ा का नहीं है कंही इतिहास में कोई पन्ना
नामुमकिन है उर्मिला सरीखा जीवन जीना
काश राजा राम ने दिखाया होता थोडा सा भी बद्दप्पन
निज आदर्शों को त्याग कुछ सोच होता उपर उठकर
तो दोनों बहनों की ताक़त ,त्याग ,को जमाना देखता कुछ हटकर

व्यथा

आधुनिक परिवेश में सीता ,उर्मिला की व्यथा
चौदह वर्ष कैसे गुजारे होंगे सती ने उन पिशाचों के बीच
ना कोई ख़त न था कोई सन्देश परस्पर पति -पत्नी के बीच
इंतजार भी खतम हुआ उस निर्मोही का ,भेज दिए थे जिसने दूत
छुद्र मानसिकता का जिसने दिया था अपना सबूत
वनगमन को जाते ना सोचा कदापि उस नववधु उर्मिला के वास्ते
कर दिया उसके सपनों पर तुषारापात ,अँधेरे कर दिए थे उसके दिन और रात
काश दिखाया होता बद्दप्पन ,ना छुड़ाया होता उर्मिला से लच्छमन का साथ
उसकी पीड़ा का नहीं है कंही इतिहास में कोई पन्ना
नामुमकिन है उर्मिला सरीखा जीवन जीना
काश राजा राम ने दिखाया होता थोडा सा भी बद्दप्पन
निज आदर्शों को त्याग कुछ सोच होता उपर उठकर
तो दोनों बहनों की ताक़त ,त्याग ,को जमाना देखता कुछ हटकर

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

Roshi: अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल मे...

Roshi: अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल मे...: अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल में पड़ते थे उनको लेने छोड़ने जाना होता था तो वो जो पीड़ा होती थी उसका दर्द बहुत महसूस होता ...
अरसे बाद नैनीताल जाना हुआ और वहां बच्चे हॉस्टल में पड़ते थे उनको लेने छोड़ने जाना होता था तो वो जो पीड़ा होती थी उसका दर्द बहुत महसूस होता है आजतक .......मन किया कुछ लिखूं


वही थी राह ,वही था समां ,और थी वही मंजिल
दिल की धड़कन भी थी सही ,बाहर मौसम भी था खुशगवार
लुफ्त उठा रहे थे नजारों का ,आकाश और हिम आच्छादित पर्वत
दे रहे थे मन को सुकूं और मन भी था आल्हादित
सफ़र पर जाने से मन था पूर्णतया रोमांचित
यादें रह -रह कर ले जा रही थीं भूतकाल में बरबस
बड़ा ही मुश्किल ,नीरस ,अकल्पनीय ,सफ़र था तय किया मैंने
जब जाती थी इन राहों पर अपने नौनिहालों को सिसकते -बिलखते लेकर
हॉस्टल में भेजना शायद तब थी मेरी मजबूरी और जरूरत
वक़्त के मरहूम ने भर दिए थे सारे जख्म ,,,,गुजरे जब उन राहों से
बरबस पीड़ा दे गयीं वो यादें और लिकने बैठ गए हम