शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

बीती बात



संत कहते हैं,बीती ताहि बिसर दे आगे कि सुध ले ,
पर क्या यह संभव हो पाया खुद उनसे
दिल कि चोट को क्या भूल पाए देव ,मानुस ,नर या किन्नर
ज़ख्म भले भर गया  पर नासूर तो टीसता रहा है सदेव
 चाहे राम हो या रावण ,कृष्ण हो या कंस
वक्त का फायदा उठाया सबने और पुराने ज़ख्मों का भी हिसाब चुकाया
द्रोपदी ने भी लिया अपने अत्याचार का बदला
अंधे का पुत्र अंधा कहकर हिसाब था उसने चुकाया
जब किसी का बस नहीं है पुराने ज़ख्म भूल पाने पर
तो कैसे हम इंसान बिसराएँ पुराणी यादों को 

  जिन्दगी बहुत बेशकीमती है ,उसका भरपूर लुफ्त उठाओ कल का पता नहीं तो आज ही क्योँ ना भरपूर दिल से जी लो जिन्दगी एक जुआ बन कर रह गयी है हर दिन ...