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शुक्रवार, 21 मार्च 2014

Roshi: मेरा भारत महान

Roshi: मेरा भारत महान: अभी कुछ दिन पहले विवाह समारोह में सम्मलित होने जयपुर गए थे रास्ते में लंच के लिए डीग (भरतपुर) के( the bagh) रिसोर्ट में रुके ,लंच किया तभी ...

मेरा भारत महान

अभी कुछ दिन पहले विवाह समारोह में सम्मलित होने जयपुर गए थे रास्ते में लंच के लिए डीग (भरतपुर) के( the bagh) रिसोर्ट में रुके ,लंच किया तभी होटल का स्टाफ पूछने आया कि खाना कैसा लगा ?हमने कहा कि बहुत फीका ,कम नमक-मिर्च  ,बिना मसाले का था सुनकर फ़ौरन स्टाफ बोला आप बता देते क्यूंकि हम खाना विदेशी सैलानीयों के हिसाब से बनाते हैं ......(देख तेरे हिन्दुस्तान कि हालत क्या हो गयी भगवान ?)    मेरा भारत महान )हम विदेश में जाकर अगर हिन्दुस्तानी स्वादानुसार भोजन ना पायें तब बात समझ आती है पर अपने ही देश में हमारी मानसिकता क्या हो गयी है ,यह समझ से परे है 

मंगलवार, 11 मार्च 2014

Roshi: परिस्थिति चाहे कितनी भी जटिल और दुरूह हो,हिम्मत और...

Roshi: परिस्थिति चाहे कितनी भी जटिल और दुरूह हो,हिम्मत और...: परिस्थिति चाहे कितनी भी जटिल और दुरूह हो,हिम्मत और उम्मीद का दमन ना छोडो......रात कितनी भी काली और अन्धयारी हो रौशनी की एक मामूली सी किरणभी...
परिस्थिति चाहे कितनी भी जटिल और दुरूह हो,हिम्मत और उम्मीद का दमन ना छोडो......रात कितनी भी काली और अन्धयारी हो रौशनी की एक मामूली सी किरणभी बहुत काफी होती है उस अंधयारे को दूर करने के लिए .........

शनिवार, 8 मार्च 2014

Roshi: अपने -पराये

Roshi: अपने -पराये: यह जिंदगी के चक्र का अजीब फलसफा है कभी यह शीर्ष पर तो कभी गर्त में गिराता है शीर्ष पर सुख और गर्त में घनघोर सताता है काश ,हो जाये कुछ ऐस...

अपने -पराये

यह जिंदगी के चक्र का अजीब फलसफा है
कभी यह शीर्ष पर तो कभी गर्त में गिराता है
शीर्ष पर सुख और गर्त में घनघोर सताता है
काश ,हो जाये कुछ ऐसा कि चले मनमाफिक वक्त का पहिया
अपनों और गैरों की पहचान यह वक्त का पहिया ही कराता है
यूं तो सब अपना दिखाने का करते हैं हर वक्त ढकोसला
पर रंगें सियारों की पहचान तो यह ही कराता है

गुरुवार, 6 मार्च 2014

Roshi: नवयुगल

Roshi: नवयुगल: यात्रा में मिला एक नवयुगल ,प्रेमरस से जो था सरोबार पूरे रास्ते जो खींच रहा था सबका ध्यान अपनी ओर बार -बार अभी- अभी जो लौट रहे थे शायद हनी...

नवयुगल

यात्रा में मिला एक नवयुगल ,प्रेमरस से जो था सरोबार
पूरे रास्ते जो खींच रहा था सबका ध्यान अपनी ओर बार -बार
अभी- अभी जो लौट रहे थे शायद हनीमून से अपने घर- बार
ट्रेन में सारे रास्ते करते जा रहे थे असभ्यता बार -बार
यूं सारे राह ना उनका स्नेह प्रदर्शन भा रहा था किसी भी सहयात्री को 
जैसे ही निकट आया उनका स्टेशन पत्नी के रंग बदले बार -बार
पति पर चीखी की उतारो सूटकेस और निकालो सामान तत्काल
नौकर की भांति लपका वो और रखा सूटकेस उसके चरणों में तत्काल
निकला चूड़ी का डिब्बा और पहना चूडा ,सजा ली कलाई उसने
दी सिन्दूर की डिब्बी पति के हाथ ,हुकुम साथ भरने को गहरी मांग
लगाने को कहा बिंदिया माथे पर ,ना था कोई शीशा उसके पास
पर्स से निकाले बिछिया , और नेलपालिश सजाने को हाथ -पाँव
झट तैयार हो गयी वो नव व्याहता .देखे सबने उसके रंग हजार
क्या वो बिच्या ,मांग सब पति प्रेम का प्रदर्शन था?
या सास का डर उसको कर रहा था मजबूर इस नाटक को करने को
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