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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

रात का सन्नाटा

रात का सन्नाटा था पसरा हुआ
चाँद भी था अपने पुरे शबाब पर 
समुद्र की लहरें करती थी अठखेलियाँ 
पर मन पर न था उसका कुछ बस 
यादें अच्छी बुरी न लेने दे रही थी चैन उसको 
दिल को सुकून देने का था तमाम बंदोबस्त वहां 
पर दिमाग को था न जरा भी चैन वहां 
उसके अनगिनत घाव थे और आत्मा थी लहुलोहान 
सबको मौसम रहा था लुभा और था बहुत हसीन
पर जो बबंडर दिल में उठ रहा है उसका क्या ? 
मन को ना आये खुबसूरत चाँद और उठती समुद्र की लहरें 
क्यूंकि विदार्ण आत्मा ने तो बना दिया हर जख्म सूल 
बहती बयार सुंदर समां कुछ भी न खुश कर सका उसको 
बस ये सब था उसके मन के लिए एक धूल.. 

























मंगलवार, 26 जुलाई 2011

इंतजार

यह इंतजार भी कितनी खुबसूरत चीज है 
जन्म से मृत्यु तक हर इंसा के दिल को अजीज है 
बहु के पाँव भरी होने से शुरू होता है इंतजार 
पोता या पोती, दादा- दादी, नाना-नानी को रहता है इंतजार 
नवागत का आगमन कर देता है घर को गुलजार 
कब चलेगा, कब बोलेगा, कब बैठेगा अब है यह इंतजार 
कौन सा स्कूल, कौन सा कालेज क्या करियर होगा तब-तक 
युबाओं में अब जागी है अपने प्रियतम से मिलन का इंतजार 
माँ को भी होता बहु और दामाद का घर आगमन का इंतजार 
रिश्ता तय हुआ, शुरू होता अब विबाह ही बेला का इंतजार 
है न कितनी खूबसूरत यह इंतजार नाम की बला 
कट जाती है पूरी जिन्दगी इंतजार ही इंतजार में .
ख़तम न होता यह जीवन में एक बार .....


आया सावन झूम के

सावन की गिरती बूंदे
भिगो जाती हैं सर्वस्व तन- मन
तृप्त कर जाती हैं धरती की प्यास
और पपीहे की धड़कन
बड़ा जाती हैं सजनी की आस
पिया मिलन को धड़कता मन
प्यासे खेत में टपकती बूंदों को देख
लरजता है किसान का मन
सावन के अंधे को हरा ही दिखता है ,
चरितार्थ करता है यह सावन
गाव में झूले, भरते ताल तलैया
हुलस-हुलस उठता है मन
नीम और अमुआ पे पड़े झूले
उमंग से भर देते बालको का मन
पशु -पक्षी , नर नारी सम्पूर्ण धरा भी नाच उठती
है पाकर सावन का संग .......


रविवार, 24 जुलाई 2011

नातिन का स्कूल का पहला दिन

नातिन का स्कूल का पहला दिन 
अगली पीड़ी के पहले बच्चे का, पहला दिन  
याद आ गया फ़ौरन जब उसकी माँ गई थी स्कूल 
ख़ुशी थी रोमांच था और बच्ची भी थी बहुत कूल
पूरे बक्त ह्रदय  में रही हूक दिल में थे डेरों शूल 
काश उस नन्ही जान को समेट लेतीं आंचल में 
ना भेजती स्कूल 
पर कहाँ था यह संभव बच्ची को तो जाना ही था स्कूल 
आज गई है उसकी भी बेटी- वो भी है वैसी ही कूल 
कहानी फिर बहीं से शुरू  होती है पर बदल गया है स्कूल 
सुंदर बाताबरण ए.सी रूम नये- नाज नखरे पर है तो 
वो भी स्कूल 
बेटी बोली माँ बच्ची रोती है देखते ही अपना स्कूल 
बड़ा दिल घबराता है जब मेड ले जाती है स्कूल 
मई बोली मेरा भी दिल घबराया था जब भेजा था तुमको स्कूल 
कितनी हो गई थी मई भी बेचैन घर में 
मस्तिस्क था शून्य जब तुम भी गई थीं स्कूल 
समय चक्र तेजी से घूमता है चाहें हो बह कूल या प्रति-कूल 
इतिहास स्वयं ही दोहराता है हो चाहें हमारे अनुकूल या प्रति-कूल.






बिकता है इन्सान

आज के युग में सब कुछ बिकता है इंसा खरीदता है 
अस्मत बिकती है आबरू बिकती है और बिकता है इन्सान 
कही लड़की बिकती , कहीं बच्चा बिकता खरीदता है सारा जहान

रिश्ते बिकते, परम्पराये बिकती, बिकता है मान और सम्मान 
पति- पत्नी , भाई-बहन , चाचा- ताऊ, साली- जीजा 
सारे रिश्ते है बिकते, जैसे बिकता है अख़बार 

माँ -बच्चा, बेटी- पिता, सरीखे रिश्ते भी हैं बिकते 
कितनी गर्त में जा रहे हैं हम, इसको क्यूँ न समझ सकते 
जिन्दगी की आपाधापी में प्यार संस्कार सब हैं बेकार 

नेता, अफसर, समाजसेवी और नर- नारी 
गर न चेते तो क्या दे पाएंगे एक सुंदर संसार ?
देखो जरा निगाहों से कैसे बिकता है इन्सान ?

दरकते रिश्ते गिरता सामाजिक ढांचा, क्या अभी न इसको रोक सकते 
क्या सही रास्ता अपनाना इतना कठिन है आज क्यूँ बिकता है इन्सान ?

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

बेटी की समझदारी

बेटियां होती हैं कितनी मासूम, कोमल और समझदार
पैदा होती हैं तो शायद सबको रुलाती हैं हर बार
पर उम्र बढने के साथ ही हो जाती हैं होशियार

घर-परिवार , माँ बाप की इज्जत की होती है दरकार
कोई भी लक्षमण रेखा पार करने से पहले सोचती है दस- बार
खुद काँटों से लहू लोहान होती हैं पर माँ बाप को बचाती हैं हर बार
बचपन से ही भाईयों की ढाल बनती रही हैं हर बार
यही त्याग, सयम और प्यार बचपन से सीखती बुनती आई है
आपने जीवन के हर रूप में नवीन श्रंगार ...........

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

दर्द इतना क्यूँ ?

छोड़ दिया है आब दिल पर पड़ी गर्द झाड़ना भी
क्यूंकि उसके साथ- साथ नासूर भी हो जाते हैं
फिर देते हैं टीस , कर जाते हैं घायल रूह को
तो सोचा क्यूँ हटाऊं इस गर्द को मई भी
मरहम का काम इससे ज्यादा न कर सकेगा कोई भी
दब जाते हैं इसके नीचे सभी जख्म और घाव
अनगिनत है जो शायद गिन भी न सकेगा कोई भी ....

एक चेहरे पे कई चेहरे

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग
क्या खूब कहा है किसी ने सच में होते हैं ऐसे लोग
सामने कुछ और,पीछे कुछ बाते बनाते ही रहते हैं लोग
मन भर उठता है जब देखते हैं रोज ऐसे १०-२० लोग
क्या दुनिया में अपना कोई नहीं पूछता है मन हमसे रोज
इस मन को कैसे समझाएँ की होते नहीं हैं सब अपने लोग
सामने दुआए पीछे बददुआएं पल पल रंग बदलते लोग
दिल करता चीत्कार , आत्मा हाहाकार देखकर आसपास ऐसे लोग
पर क्या करें दुनिया- दारी तो न छोड़ी जाएगी चाहें कुछ भी करे लोग
दिल की न सुनकर दिमाग से ही पहचाने जाते हैं ऐसे लोग
कितना भी मजबूत रक्खें पर दिल फिसल ही जाता है देखते ही ऐसे लोग
चिकनी चुपड़ी, निज प्रशंशा सुनने को मन ढूंडता है ऐसे लोग .........

सोमवार, 11 जुलाई 2011

हाय-हाय गर्मी

उफ़ यह गर्मी का मौसम खूब रुलाता है

मौसम के साथ- साथ बिजली कटौती का दुःख सताता है
बिजली कटौती के साथ जनरेटर की आवाज से दम निकलता है
जनरेटर के साथ रात में मचछरो का संगीत सबको जगाता है
रात में संगीत और दिन में बदहजमी का दर्द सताता है
बदहजमी के साथ डायरिया, वायरल किलीनिक के चक्कर कटबाता है
किलीनिक के चक्करों के साथ-साथ फोड़े- फुंसी और घमौरिओं का आतंक रुलाता है

हर तकलीफ परेशानी झेल कर भी ये मौसम
हर साल अपना का इंतजार करता है
हर साल यह मौसम आम,खुमानी,लीची
भी भरपूर संग अपने लाता है
वर्फ का गोला,चुस्की,कुल्फी, फालूदा भी
यही मौसम खिलबाता है .. ...

रविवार, 3 जुलाई 2011

पितृ दिवस

पितृ दिवस पर किया लिखूं पिता के बारे में
हम दो बहिनों का बचपन से जीवन सवांरा उन्होंने 
नहीं याद ऐसी कोई चाहत जो रही हो अधूरी 
हर कोशिश, यथाशक्ति से जो न की हो उन्होंने पूरी 
भाई न था तो बेटीयों को पाला बेटों से बढकर 
कभी न किया भेदभाव हमको लड़की समझकर 
हर यकीं के साथ भेजा बाहर हमको बढ-चढकर
ना रहने दी कोई कमी -कभी ,शादी व्याह और घर पर 
खाली पितृ दिवस पर याद करने-
बधाई देने पर होता न मकसद पूरा 
मकसद होगा उनके बताये उसूल, रास्तो पर चलकर 
उनके अनुभव और तजुर्वों से  कुछ सीखकर 
गर कर सके हम उन सपनो को पूरा 
तो यही होगा सच्चा प्यार और होगा सबका जीवन सुनहरा ....