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सोमवार, 22 नवंबर 2010

नन्हे महमान

ओ नन्हे मेहमान, तेरे वास्ते हैं हम सब परेशान
तेरी सलामती और सेहत के लिए मन है बेचैन
हर घडी हर पल है नई आशाएं, नए सपने
नए रिश्ते जुड़ने की, सुगबुगाहट, नई कल्पनाये
हर पल बढती है धड़कन दिल की मन होता है, बेचैन
हरदम सोचती हूँ उस प्रसब पीड़ा की वेदना, पर
तत्काल ही आँखों में आ जाती है सूरत उस छोटी जान की
पागल मन डूबने लगता है उसके प्रेम और नई पहचान में ...

नव शिशु आगमन 2

मन बेचैन है, परेशांन है, आकुल है हैरान है
नवागत के आगमन पर उमंगें है उल्लास है
साथ ही मन मैं है भय उस दर्द  का
नव जीवन के आगमन पर होने वाली असहनीय पीड़ा
कैसे सह पायेगी लाडली  उस मर्मान्तक पीड़ा को
मन कांप उठता है हृदय घबरा उढ़ता है नींद जाती है उड़   
रूह कांप जाती है , याद कर माँ की उस पल को
क्या करे ? गुजरी है माँ भी इसी तकलीफ से
और जन्मी थी यही लाडली उसी शरीर से
प्राकर्तिक का यह  नियम चलता रहेगा  इसी तरह
शाश्वत , सदैव , निरंतर और अनवरत .

नव शिशु आगमन 1

नवागत के आगमन से मन है प्रफुल्लित, उत्साहित
निरंतर हूँ करती एहसास उस कोमल स्पंदन का
नर्म है हथेली कोमल तलवा, निरंतर है जो सहलाता
हर घडी, हर शै है यह अहसास दिलाता है मन
की वह यही है, यहीं कहीं है मेरे दिल के आसपास
महसूस करती हूँ उसकी  धड़कन, आवाज उसके रुदन की
टकराती है दिल से और हिला जाती है मेरी रूह को
नर्म, अदभुत, निष्पाप, सुंदर रूप है दिखता स्वप्न में
मुझको उसके कोमल स्पर्श का अहसास देता है, अनमोल सुकून
नींद में जगाती है उसकी अठखेलियाँ, करती है जो नवनित ठिठोलियाँ
कब आयेगा वह नवागत, भर देगा जिंदगी  में नूतन किलकारियां ?

जीवन की राह

कभी कभी जीवन में आ जाते हैं
अचानक ऐसे मोड़
जहाँ पर आप, सिर्फ आप
रह जाते हैं अकेले
घर, परिवार, पिता, बहन सब है आसपास
पर मन है निशब्द, मौन और है मद्विम साँस
भीड़ से दूर, एकांत, शांत, अकेलापन
है पत्तियों की सरसराहट, झींगुरो की आहट
मन को हैं सब यही कुछ लुभाते, बहलाते
और मै इन सबको अपने बीच में पाकर
हूँ अत्यंत खुश और यही है मन लुभाते
कियूँ की यह सब साथ ही हैं जख्मो को सहलाते
फूल, पल्लव, हरियाली यही है मेरा जीवन
नित नव जीवन, यही देता है 'साकेत' का घर आँगन .......

बुधवार, 17 नवंबर 2010

कल्पना

बंद खिड़की का पट खुला
मानो जीवन को मिली नई उडान
क्यूंकि उसका शरीर था निष्क्रिय
उस की कल्पना को मिले नए रंग
अम्बर नीला, बादल सफ़ेद और थे कई रंग
कैसा अम्बर ? कैसे बादल और कैसा इन्द्र धनुष का रंग
सोचता ही रहा , इतने बरसो से लेता हुआ और सक्रिय.

शनिवार, 13 नवंबर 2010

अहसास

जीवन एक नवजीवन का
चक्र है यह अदभुत इश्वेर का
स्रष्टि ने है फिर से दोहराया  इतिहास
बेटी की कोख में पल रही है एक आस
याद आते हैं बो लम्हे जब हुआ था जन्म लाडली का
छोटी सी नाजुक सी गुडिया छाया था  सर्वत्र उल्लास
कब पली, बड़ी और था उस पर यौवन छाया
माँ का आँचल छोड़ कब चल पड़ी वह काया
पिया का अपने पाने को साथ
आज वही नन्ही कलि एक पुष्प बनी
और खुद चल पड़ी मातृत्व के नाजुक पल की ओर
कल जिससे गुजारी थी माँ उसी अहसास की ओर
याद आता है हरपल वो लम्हा जो गुजरा था मैंने
एक हकीकत के साथ .

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

नारी की व्यथा ?

जीवन के अतीत में झांकने बैठी मै
पायी वहां दर्दनाक  यादें और रह गयी स्तब्ध मै
समूचा अतीत था घोर निराशा और अवसाद में लींन
कुछ भी न था वहां खुशनुमा बन गई जिंदगी उत्साह हीन
बदरंग हो चुके थे सपने जीवन पथ था शब्दहीन
बच्चे भर रहे थे नए रंग, भबिष्य ने बुने सपने
यादें कर दी धूमिल सजा दिए रंग जीवन में अपने
मै आज तक ढो रहीं थी उन लाशो का गट्ठर
तिल तिल कर जी रही प्रतिदिन मर मरकर
शर्म और हया का उतार फेंका झीना आवरण
बच्चो ने था ठहराया सही यही मेरी तपस्या का है फल
किसी बक्त भी अगर गिर जाती थी मै नजरो में संतान की
जी न पाती उन  लाशों के भी कई गुना बोझ से
आज सर उठा कर जीती हूँ पाती हूँ उस दर्द से मुक्ति
नारीं जीवन की यही त्रासदी, फिर भी है वो दुर्गा शक्ति
पहले कुचली गई अपनों से, फिर सहा संतापं
यहाँ दबकर जमाना भी देता है कभी कभी घातक सा ताप
बरसो से यही है नारी की पीड़ा, भोगा इसको कभी सीता ने
सीता ने दी अग्नि परीक्षा, और अंतिम बेला पाया ढेर तिरस्कार
चली आ रही है यही परीक्षा, तिरस्कार और संताप
पाई न इससे कभी मुक्ति नारी हो तुम कैसी शक्ति
पूजी जाती अम्बा, दुर्गा और कहलाती पूर्ण शक्ति
कयूं नहीं मिलता नारी को सम्मान कियूं होता हर पथ पर तिरस्कार ??????????